1अहो प्रभु ! तुम ही दायक शिवपंथ नां । अहो प्रभु ! अजित जिनेश्वर आपरो, ध्याऊं ध्यान हमेश हो । अहो प्रभु ! अशरण शरण तू ही सही, मेटण सकल कलेश हो ।। १ ।।
प्रभो ! अर्हत् अजित ! मैं प्रतिदिन तुम्हारा ध्यान करता हूं । तुम्हीं अशरण के शरण हो और तुम्हीं हो सब संक्लशों को दूर करने वाले ।
2अहो प्रभु ! उपशम रस भरि आपरी, वाणी सरस विशाल हो । अहो प्रभु ! मुगति-निसरणी मनोहरू, सुण्यां मिटै भ्रम जाल हो ।। २ ।।
प्रभो ! तुम्हारी वाणी उपशम रस से भरी हुई, सरस और व्यापक है । वह मुक्ति जाने के लिए मनोहर निसैनी है । उसके श्रवण मात्र से भ्रम-जाल टूट जाता है ।
3अहो प्रभु ! उभय बंधण आप आखिया, राग-द्वेष विकराल हो । अहो प्रभु ! हेतु ए नरक निगोद नां, राच्या मूरख बाल हो ।। ३ ।।
प्रभो ! तुमने दो प्रकार के बंधन बताये हैं—राग और द्वेष । ये दोनों ही भयावह तथा नरक और निगोद के हेतु हैं, फिर भी नासमझ और अज्ञानी लोग इनमें रचे-पचे रहते हैं ।
4अहो प्रभु ! रमणी राखसणी कही, विषबेली मोहजाल हो । अहो प्रभु ! काम-भोग किम्पाक-सा, दाख्या दीन-दयाल हो ।। ४ ।।
प्रभो ! तुमने कहा है—वासना२ राक्षसी, विष-वल्ली और मोहजाल है । हे दीनदयाल ! तुमने काम-भोग को किम्पाक फल के समान बताया है ।
5अहो प्रभु ! विविध उपदेश देई करी, तें तार्या नरनार हो । अहो प्रभु ! भव-सिन्धु-पोत तूं ही सही, तूं ही जगत-आधार हो ।। ५ ।।
प्रभो ! तुमने विविध प्रकार से उपदेश देकर जनता को तृष्णा के पार पहुंचाया है । तुम्हीं भव-सिन्धु में जलपोत हो और तुम्हीं जगत् के आधार हो ।
6अहो प्रभु ! शरण आयो तुझ साहिबा ! बस रह्या हीया मांय हो । अहो प्रभु ! आगम-वयण अङ्गीकरी, रह्यो ध्यान तुझ ध्याय हो ।। ६ ।।
प्रभो ! मैं तुम्हारा शरणागत हूं । तुम मेरे अन्तःकरण में बसे हुए हो । मैंने तुम्हें कभी देखा नहीं, पर मैं आगम-वचन को प्रमाण मानकर तुम्हारा ध्यान कर रहा हूं ।
7अहो प्रभु ! संवत उगणीसै भाद्रवै, दसमी आदितवार हो । अहो प्रभु ! आप तणा गुण गाविया, वर्त्या जै जै कार हो ।। ७ ।।
प्रभो ! मैंने तुम्हारे गुणों का संगान किया । इससे मेरे जीवन में जय जयकार हो रहा है ।