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‹ Agam Kathas
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अर्हन्नक

अर्हन्नक एक धर्मनिष्ठ श्रावक था। उसने धर्म का आशय समझा था। अत: उसके लिए धर्म ही सब कुछ था। एक बार वह व्यापार के लिए जलपोत द्वारा समुद्र-यात्रा कर रहा था। जब उसका पोत समुद्र के मध्य पहुंच गया, तब उसके सामने एक देव उपस्थित हुआ। उसका रूप बहुत उद्धत और विकराल लग रहा था। उसने अर्हन्नक से कहा—'तुम धर्म को छोड़ दो। अगर नहीं छोड़ोगे तो मैं तुम्हारे पोत को समुद्र में डुबो दूंगा।'

अर्हन्नक इस अकल्पित घटना से आश्‍चर्य में डूब गया। किंतु उसके मन में कोई प्रकम्पन पैदा नहीं हुआ। वह जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझ चुका था। उसने बहुत ही धीर गम्भीर स्वर में, कहा—'देव! मैं धर्म को नहीं छोड़ सकता। वह छोड़ने की वस्तु है ही नहीं। मैं धर्म से अभिन्न हूं, फिर मैं उसे छोड़ भी कैसे सकता हूं?

देव ने क्रुद्ध स्वर में कहा—'मैं इन सब बातों को नहीं जानता। मैं तो एक ही बात कहता हूं कि तुम धर्म को छोड़ दो। अगर नहीं छोड़ोगे तो इस पोत को समुद्र में डुबो दूंगा।'

देवता की क्रूर चेतावनी से पोत के सारे यात्री कांपने लगे। वे करुण स्वर में बोले—'हम सब धर्म को छोड़ देंगे। तुम हमें शरण दो और इस पोत को मत डुबोओ।' उन्होंने अहन्नक से कहा—'तुम इतनी जिद क्यों करते हो? एक बार कह दो कि मैंने धर्म छोड़ दिया। इसमें तुम्हारा क्या बिगइता है? हम सबके प्राण बच जाएंगे और तुम अपनी जिद्द पर अड़े रहोंगे तो पोत के सारे यात्री मारे जाएंगे!

अर्हन्नक बड़ी मुसीबत में फंस गया। वह अपने साथियों को समझाने लगा—धर्म इस प्रकार छोड़ने या स्वीकार करने की वस्तु नहीं होती। जीवन में अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां आती रहती हैं। जो लोग धर्म में दृढ़ रहते हैं वे सब स्थितियों का पार पा जाते हैं। मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप थोड़े से संकट से घबराएं नहीं और धर्म छोड़ने की बात न करें। धर्म की शरण में रहते हुए कुछ हो भी गया तो भी हमारा कोई अहित होने वाला नहीं है। मैं एक क्षण के लिए भी धर्म को छोड़ने की बात नहीं सोच सकता।

अर्हन्नक की इस दृढ़ प्रतिज्ञा ने देव को और अधिक कुपित कर दिया। उसने पोत आकाश में उठा लिया और बोला—'अर्हन्नक! अब भी तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो सब मारे जाओगे।' अर्हन्नक फिर भी विचलित नहीं हुआ। देव ने उसके अन्त:करण में प्रविष्ट होकर देखा कि वह अब भी वैसे ही अभय और धर्मनिष्ठ है। देव का हृदय बदल गया। जलपोत समुद्र के तट पर जा लगा। देव अर्हन्नक के समक्ष उपस्थित हुआ। मुक्त भाव से उसकी प्रशंसा की। उसे एक कुण्डलयुगल समर्पित किया और यह कहते हुए स्वर्ग में चला गया कि इन्द्र ने देव-सभा में तुम्हारी धर्मनिष्ठा की प्रशंसा की थी। मैं तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए आया था। तू अपनी परीक्षा में पूर्ण उत्तीर्ण हुआ है। सब लोग इस दृश्य को आश्‍चर्यपूर्ण आंखों से देखते रहे।

जो व्यक्ति धर्म में दृढ़ रहता है, उसे कोई भी शक्ति विचलित नहीं कर सकती। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म में दृढ़ रहना चाहिए।