बालक संगम की खीर
गरीब मां का इकलौता पुत्र संगम बच्चा ही था। न खाने को पूरी रोटी मिलती थी, न पीने को पूरा पानी। एक दिन किसी पड़ोस के बच्चे को खीर खाते देख लिया। मां के पास आकर रोने लगा—'मां, मैं भी आज खीर खाऊंगा!'
मां ने कहा—'बेटा, खीर कहां से लाऊं? बड़ी मुश्किल से दूसरों के घर चक्की चलाकर दोनों का पेट पालती हूं!
बाल हठ बलवान होता है। संग ने कहा—'कुछ भी हो, खीर खाए बिना नहीं रहूंगा।' कहते-कहते बच्चा रो पड़ा।
पड़ोसिन ने बच्चे के रोने का कारण पूछा।
मां ने कहा—'मैं तंग आ गई इसे समझाते-समझाते। इसने जिद्द पकड़ रखी है, खीर खाने की। कहां से लाऊं खीर, जबकि रोटी ही पूरी नसीब नहीं है।
पड़ोसिन बहुत भली थी। उसने सोचा—बच्चे का मन नहीं तोड़ना चाहिए। उसने खीर बनाने की सामग्री-दूध, चीनी, चावल बच्चे की मां को दे दी।
मां ने खीर बनाकर बालक को आवाज दी—'आओ बेटे! खीर खाओ। बालक तो प्रतीक्षा कर ही रहा था। तत्काल दौड़ता हुआ आया। मां ने खीर से थाली भर दी और कहा—'बेटा, जी भरकर खीर खा लो। मैं पानी लेने बाहर जाती हूं।'
मां चली गई। बच्चा बैठा है। खीर की थाली सामने पड़ी है। ज्यों ही बच्चा खाने को उद्यत होता है, सामने एक तपस्वी मुनि आते हुए दिखाई दिए। मुनि के मासखमण की तपस्या थी। वे झोली हाथ में लिये भिक्षा के लिए निकले थे। न जाने बच्चे के मन में क्या भावना जगी, सोचने लगा—कितना अच्छा हो यदि यह खीर तपस्वी मुनि को अपने हाथ से दूं। संयोग की बात। मुनि भिक्षा के लिए घूमते हुए उसी झोपड़ी के पास आ गए।
बालक संगम खुशी से झूम उठा। मुनिवर से निवेदन करने लगा—'मुनिवर! मेरी कुटिया में पधारें और मेरे हाथ से खीर लेकर मुझे कृतार्थ करें। खीर शुद्ध है, मेरे खाने के लिए बनी है, आप ग्रहण करें!
मुनि उसकी बलवती भावधारा को पढ़ रहे थे। उन्होंने कहा—'अपनी मां से पूछा है कि नहीं?'
'मां से क्या पूछूं? खीर तो मेरे लिए बनी है। आप इसकी चिन्ता न करें। जल्दी से पात्र निकालें।' मुनि ने ज्योंही पात्र निकाला, बालक ने आग्रह-पूर्वक सारी खीर पात्र में उडेल दी। कितने ऊंचे परिणाम! और कितने ऊंचे अध्यवसाय! जन्म-जन्मान्तर के सोये संस्कार जग गए। सोचने लगा—'मैं आज तर गया। ये मुनि संसार-समुद्र से पार पहुंचाने वाली नौका हैं। मैं कितना सौभाग्यशाली हूं। आज सचमुच मैं कृतार्थ हो गया।'
मुनि भिक्षा लेकर चले गये, इधर मां आई। उसने देखा, पुत्र थाली चाट रहा है। मां की आंखों में आंसू आ गए। वह सोचने लगी—मैं कितनी अभागिन हूं। मेरा पुत्र इतनी खीर खाकर भी अभी थाली चाट रहा है। इसका अर्थ हुआ कि मैं इसे प्रतिदिन भूखा रखती हूं।
बालक संगम ने नहीं कहा कि मैंने खीर सन्त के पात्र में डाली है। उसे प्रदर्शन नहीं करना था।
यही बालक संगम अपने इस महान् त्याग से अगले जन्म में असीम वैभव का मालिक कुमार शालिभद्र होता है।