शालिभद्र
मगध प्रदेश के राजगृह नगर में रत्न कम्बलों का व्यापार करने वाले कुछ व्यापारी आये। वे दिन भर राजगृह में घूमे, एक भी कम्बल बिका नहीं। निराश होकर वे वापस लौट रहे थे और रास्ते में चलते हुए मगध और राजगृह की आक्षेपात्मक आलोचना कर रहे थे। वे एक सप्तभौम प्रासाद के नीचे से गुजरे। ऊपर उस घर की स्वामिनी स्वर्गीय श्रेष्ठी गोभद्र की पली भद्रा बैठी थी। उसने व्यापारियों की बात सुनी।
उसे यह बात बहुत बुरी लगी कि कुछ बाहर से आए हुए व्यापारी उसके समृद्ध राज्य मगध की दरिद्रता का बखान कर रहे हैं। वह जानती थी, कि मगध के खजाने में कितना धन है। किन्तु सम्पन्नता का अर्थ यह तो नहीं कि विलासिता के साधन खरीदने में उसका अपव्यय किया जाए। उसने अपने वैभव का प्रदर्शन करने के लिए नहीं पर व्यापारियों का मुंह बन्द करने के लिए उन्हें ऊपर बुलाया। पूछा—आप लोग क्या बेचना चाहते हैं?
व्यापारियों का संक्षिप्त सा उत्तर था—रत्न कम्बल। 'कितने रत्न कम्बल हैं? भद्रा ने अगला प्रश्न किया।
'सोलह रत्न कम्बल।'
'बस, सोलह कम्बल ही। सोलह कम्बल से कैसे क्या व्यवस्था बैठेगी। मेरे बत्तीस बहुएं हैं। किसे दूं किसे न दूं। आप ऐसा कीजिए-एक-एक कम्बल के दो-दो टुकड़े कर दीजिए। बत्तीस कम्बल होने से मेरी प्रत्येक बहू की एक-एक कम्बल मिल जाएगा।
व्यापारी भद्रा का मुंह देखने लगे। वे आश्चर्य के साथ बोले—मांजी! आप जानती हैं एक-एक कम्बल की कितनी कीमत है? आपके देश का राजा एक कम्बल भी नहीं खरीद सका और आप उन सब कम्बलों के टुकड़े करवा रही हैं। शायद आपको इनकी कीमत अभी तक ज्ञात नहीं है। मांजी! एक-एक कम्बल की कीमत सवा लाख स्वर्ण मुद्राएं हैं। यदि आप एक भी कम्बल खरीद लेगीं तो हम समझेंगे कि इस देश में सम्पन्न लोग निवास कर रहे हैं।
अपने मुनीम की ओर मुखातिब होते हुए भद्रां ने कहा—मुनीमजी! व्यापारियों को भय है कि उनके माल के पैसे उन्हें मिलेंगे कि नहीं। आप इन्हें साथ ले जाइए और भण्डार दिखाकर निश्चिन्त कर दीजिए।
भद्रा के निर्देशानुसार मुनीमजी ने व्यापारियों को भण्डार दिखाया। भण्डार देखते ही व्यापारियों की आंखें चुंधिया गई। वे कुछ भी बोल न सके। उन्हें यह कल्पना ही नहीं थी कि एक मनुष्य के पास इतना अपार वैभव हो सकता है।
इधर सम्राट श्रेणिक की महारानी चेलना ने रत्न कम्बल प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। श्रेणिक ने व्यापारियों का पता लगाया तो जानकारी मिली कि व्यापारी चले गये हैं और वे सारे कम्बल भद्रा ने खरीद लिये हैं। सम्राट ने भद्रा का परिचय जानना चाहा। भद्रा राज्य सभा में उपस्थित हुई। उसने सम्राट को अपने घर आने के लिए आमन्त्रित किया।
सम्राट ने उसका आमन्त्रण स्वीकार कर लिया। अब राजगृह में जन-जन के मुख पर भद्रा और उसके पुत्र शालिभद्र का नाम था। सम्राट, भद्रा का घर और उसका वैभव देखकर आश्चर्यचकित रह गये। उन्होंने शालिभद्र से मिलना चाहा। भद्रा पुत्र के पास पहुंचकर बोली—'वत्स! चलो राजा आये हैं।
शालिभद्र ने कहा—'मां मैं क्या करूंगा? मुनीम से कह दो, वह खरीद लेगा।'
पुत्र की अज्ञान-भरी बात सुनकर भद्रा ने उसको समझाया—'बेटा! राजा खरीदने की चीज नहीं है। वह तो हमारा स्वामी है।
'स्वामी' शब्द ने शालिभद्र की अंतरात्मा को झकझोर दिया। वह इसी शब्द पर सोचता हुआ भद्रा के निर्देशानुसार नीचे आया और राजा से मिलकर पुन: ऊपर चला गया। अब तक वह दिव्य वैभव में अनुरक्त था। पर आज अनुराग का बन्धन टूट गया। विराग के वैभव में पहुंचकर उसने स्वयं का स्वामी बनने की दिशा प्राप्त की।
शालिभद्र ने गृह-जीवन छोड़कर साधुत्व स्वीकार करने का निर्णय ले लिया। इस निर्णय की क्रियान्विति हेतु वह प्रतिदिन अपनी एक-एक पत्नी को प्रतिबोध देकर उससे अपना सम्बन्ध-विच्छेद करने लगा।
शालिभद्र की बहन सुभद्रा अपने भाई की विरक्ति का संवाद पाकर खिन्न हो उठी।
सुभद्रा के पति धन्यकुमार ने उसकी खिन्नता का कारण पूछकर कहा—'सुभद्रे! तुम्हारा भाई कायर है। साधु ही बनना है तो फिर एक साथ ही सारे बन्धन क्यों नहीं तोड़ देता?'
सुभद्रा बोली—'कहना सरल है, करके देखो तब पता चले।' सुभद्रा के वचन धन्यकुमार के लग गये। वह उसी समय बिलखती हुई पत्नी को छोड़कर, शालिभद्र को सम्बोधित करने गया।
शालिभद्र ने धन्यकुमार की प्रेरणा पाते ही नीचे आकर माता भद्रा से दीक्षित होने की आज्ञा प्राप्त की साला-बहनोई दोनों साथ-साथ भगवान् महावीर के समवसरण में पहुंचकर मुनिधर्म में दीक्षित हो गये।