भाव शुद्धि
सामायिक विचारों की शुद्धता तथा स्वयं को बंधनों से मुक्त रखने के लिए की जाती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया, घृणा, द्वेष आदि भावनाओं से दूर रहकर ही शुद्ध सामायिक करना संभव है। शान्त चित्त और पूर्ण जागरूकता के साथ की गई उपासना सफल सामायिक का मनोरथ सिद्ध कर सकती है।
Q 1. सामायिक का सम्बन्ध आन्तरिक पवित्रता से है फिर सामायिक के लिए कोट-कमीज आदि उतारकर चद्दर धारण करना क्यों जरूरी है?
वेश का अपना महत्व है। व्यावहारिक जगत् में देखते हैं—अलग-अलग स्थानों में जाने की अलग-अलग वेशभूषा होती है। विवाह आदि उत्सवों में जाने का वेश अलग होता है और शोक समारोह में जाने का वेश अलग होता है। यद्यपि वेशभूषा में न शोक है, न हर्ष है पर वेश एक पहचान देता है। ठीक इसी तरह सामायिक की वेशभूषा भी पहचान बनाती है। मैं सामायिक में हूं इसकी निरन्तर स्मृति के लिए तथा दूसरे को यह प्रतीति हो कि अभी यह व्यक्ति सामायिक कर रहा है—इन दोनों ही दृष्टियों से वेश धारण की अपनी उपयोगिता है। साधु की तरह वेश स्वीकार करने से श्रावक साधु तो नहीं बन जाता पर स्वयं के संस्कारों को पुष्ट करने के लिए एवं भावी पीढ़ी में सामायिक के संस्कार संक्रान्त करने की दृष्टि से भी वेश का अपना महत्व है। हम देखते हैं—छोटे-छोटे बच्चे जब अपने बड़े बुजुर्गों को सामायिक करते देखते हैं तो वे भी उनके पास बैठकर सामायिक का अभिनय करते हैं। यह अभिनय उनमें संस्कार निर्माण की भूमिका बना सकता है।
Q 2. सामायिक के कितने अतिचार हैं?
सामायिक के पांच अतिचार हैं— १. मन से सावद्य प्रवृत्ति करना। २. वचन से सावद्य प्रवृत्ति करना। ३. शरीर से सावद्य प्रवृत्ति करना। ४. सामायिक करते समय सामायिक की स्मृति न रहना। ५. निश्चित समय से पूर्व सामायिक को पूरा करना।
Q 3. सामायिक में मन, वचन व काया से कौन-कौनसे दोष हो सकते हैं, विस्तार से समझाएं?
सामायिक के अतिचारों को विस्तार देते हुए बत्तीस प्रकार के दोषों का विवेचन किया गया है—दस मन के दोष, दस वचन के दोष, बारह काया के दोष।
Q 4. मन के दस दोष कौनसे हैं?
१.अविवेक दोष—सामायिक के स्वरूप को न समझते हुए सामायिक स्वीकार कर लेना। २.यश: कीर्ति दोष—लोग मुझे धर्मात्मा कहेंगे, मेरी प्रशंसा करेंगे—इस भावना से सामायिक करना। ३. लाभार्थ दोष—भौतिक लाभ की कामना से सामायिक करना। ४. गर्व दोष—मैं सबसे अधिक सामायिक करने वाला हूं, इस भावना से सामायिक करना। ५.भय दोष—राज्य, लेनदार आदि के भय से अथवा सामायिक न करूंगा तो बाप, दादा क्या कहेंगे इस भावना से सामायिक करना। ६.निदान दोष—भौतिक-सिद्धि, स्वर्ग सुख आदि की कामना से सामायिक करना। ७.संशय दोष—सामायिक का फल मुझे मिलेगा या नहीं, इस सन्देह के साथ सामायिक करना। ८.रोष-दोष—किसी के साथ कलह हो जाने पर रुष्ट होकर सामायिक करना। ९. अविनय दोष—सामायिक के प्रति बहुमान न रखना अथवा सामायिक में देव, गुरु, धर्म की आशातना करना। १०.अविनय दोष—सामायिक के प्रति बहुमान न रखना अथवा सामायिक में देव, गुरु, धर्म की आशातना करना।
Q 5. वचन के दस दोष कौनसे हैं?
१.अलीक दोष—असत्य बोलना। २.कुवचन दोष—सामायिक में अश्लील, भद्दे शब्दों का प्रयोग करना। ३.हसाकार दोष—बिना विचारे बोलना। ४.स्वच्छन्द दोष—कामोत्तेजक गीत आदि गाना। ५.संक्षेप दोष—सामायिक पाठ को संक्षिप्त कर बोलना। ६.कलह दोष—सामायिक में कलहकारी वचनों का प्रयोग करना। ७. विकथा दोष—निरुद्देश्य राजकथा, भोजन कथा आदि करना। ८.हास्य दोष—सामायिक में हंसी-मजाक करना। ९.अशुद्ध दोष—सामायिक पाठ अशुद्ध बोलना। १०.निरपेक्ष दोष—सामायिक के नियमों की अवहेलना करते हुए मात्र गुनगुनाना
Q 6. काय के बारह दोष-कौनसे हैं?
१.कुआसन दोष—सामायिक में समुचित आसन में न बैठना। २.चलासन दोष—सामायिक में बार-बार आसन बदलना। ३.चलदृष्टि दोष—दृष्टि को स्थिर न रखकर इधर-उधर घुमाते रहना। ४.क्रिया दोष—सावद्य प्रवृत्ति करना, जैसे बच्चों को गोद में लेना, खिलाना, पिलाना आदि। ५.आलम्बन दोष—विशेष कारण के अतिरिक्त सहारा लेकर बैठना। ६.आकुंचन-प्रसारण दोष—बिना प्रयोजन हाथ-पैर फैलाना, संकुचित करना आदि। ७.आलस्य दोष—सामायिक में आलस्य करना। ८.मोडन दोष—हाथ-पांव की अंगुलियों को चटकाते रहना, कटका निकालना आदि। ९.मल दोष—सामायिक में शरीर का मैल उतारना। १०.विमासन दोष—शोकसंतप्त की तरह बैठना, बिना पूंजे शरीर खुजलाना, अनावश्यक इधर-उधर घूमना आदि। ११.निद्रा दोष—सामायिक में नींद लेना। १२.वैयावृत्त्य दोष—सामायिक में वैयावृत्त्य/सेवा करना आदि।
Q 7. इस प्रकार दोषों से रहित सामायिक करना तो बहुत कठिन है। अत: सदोष सामायिक करने की अपेक्षा क्या सामायिक न करना अच्छा नहीं है?
निर्दोष सामायिक कठिन अवश्य है पर असंभव नहीं। जो व्यक्ति अपने मन, वचन व शरीर पर नियंत्रण रख सकता है उसके लिए निर्दोष सामायिक करना कठिन नहीं है। कदाचित् निर्दोष सामायिक न हो सके तो सामायिक करना ही नहीं, यह चिन्तन ठीक नहीं है। जितना गुड़ डाले उतना ही मीठा। जितना लाभ मिले उतना ही अच्छा। कोई व्यक्ति व्यापार करता है पूरा लाभ नहीं मिलता तो क्या वह व्यापार करना छोड़ देता है? नहीं, प्रयत्न चालू रखता है। प्रयत्न करते-करते कभी पूरा लाभ भी मिल सकता है। कोई व्यक्ति तैरना सीखता है, वह एक दिन में ही सफल तैराक नहीं बन सकता। लम्बा अभ्यास चाहिए। वैसे ही निर्दोष सामायिक न हो तो सामायिक करना नहीं छोड़ना चाहिए। दोष लगने पर उसका प्रायश्चित्त किया जा सकता है। अभ्यास करते-करते निर्दोष सामायिक भी सम्भव है।
Q 8. सामायिक में मन स्थिर नहीं रहता, फिर सामायिक से लाभ क्या?
प्रवृत्ति के तीन आधार हैं—मन, वचन व काया। ये तीनों ही कर्म बन्धन के निमित्त हैं। माना कि मन पर नियंत्रण नहीं रहता है, पर वचन व शरीर पर नियंत्रण रखना तो सहज है। सामायिक स्वीकार करने के बाद कोई किसी को अपशब्द नहीं बोलता। सावद्य व्यापार नहीं करता। घर गृहस्थी के धंधे में नहीं लगता। अब बात रही मन की। मन को अपनी रुचि के अनुसार स्वाध्याय, ध्यान, जप आदि किसी एक आलम्बन पर टिकाकर एकाग्र करने का प्रयत्न किया जा सकता है।
Q 9. एक गृहस्थ दिन भर सपाप प्रवृत्तियों में लगा रहता है। वैसी स्थिति में एक सामायिक प्रतिदिन कर भी ले तो उससे क्या विशेष लाभ होगा?
जीवन का कौनसा क्षण कब समूचे जीवन की दिशा बदल दे, कहा नहीं जा सकता। पतंग उड़ाने वाले सारी डोर को ढीली छोड़कर थोड़ी सी डोर हाथ में पकड़े रहते हैं। उसके सहारे पतंग आकाश में उड़ती रहती है। कुएं से पानी निकालते समय सारी रस्सी कुएं में डाल दो जाती है, मात्र थोड़ी-सी हाथ में रहती है। उसी के सहारे पानी कुएं से निकल आता है। भोजन करते समय लगभग दस-बारह मिनट का समय लगता है। उसके प्रभाव से चार-पांच घण्टे भूख नहीं सताती। ठीक वैसे ही जीवन-रूपी डोरी को एक दो घड़ी भी यदि पकड़कर संभालकर रखा जाता है तो दिनभर उसका असर रहे इसमें आश्चर्य क्या है। पवित्र भावधारा के साथ की गई एक भी सामायिक कभी-कभी समूचे जीवन की दिशा प्रशस्त कर सकती है। शस्त्रकारों ने कहा है—जो व्यक्ति प्रतिदिन एक शुद्ध सामायिक करता है वह अनन्त कमो की निर्जरा करता है।
Q 10. सामायिक में सामायिक ली जा सकती है क्या?
सामायिक में सामायिक ली जा सकती है और सामायिक एक साथ भी जितनी चाहे स्वीकार की जा सकती है। एक सामायिक का काल पूर्ण होने पर सामायिक पारण विधि बोलनी चाहिए। यदि एक साथ दो-तीन सामायिक ग्रहण की हैं तो सामायिक पारण विधि बीच में नहीं बोली जाती। सब सामायिक पूर्ण होने के बाद ही बोली जाती है।
Q 11. सामायिक का कालमान समाप्त होने पर सामायिक स्वत: ही पूर्ण हो जानी चाहिए। सामायिक पारण विधि बोलना क्यों आवश्यक है?
सामायिक पारण विधि बोलने का अर्थ सामायिक को पूर्ण करना नहीं है। सामायिक तो कालमान समाप्त होने पर स्वत: पूर्ण हो गई। सामायिक पारण विधि बोलने का तात्पर्य है सामायिक में लगे अतिचारों/दोषों की आलोचना करना। आलोचना विधि को ही सामायिक पारण विधि कहा गया है।
Q 12. क्या पौषध पूर्ण होने से पूर्व सामायिक स्वीकार की जा सकती है?
सामायिक तो पौषध में ग्रहण की जा सकती है पर उसका कालमान पौषध का कालमान पूर्ण होने के बाद गिना जायेगा।
Q 13. एक सामायिक का कया फल होता है?
सामायिक में समता की साधना और शुद्धता दोनों का अनुभव होता है। इसका सबसे पहला और महत्वपूर्ण फल है चित्तसमाधि। चित्तसमाधि से एकाग्रता बढ़ती है, तनाव-मुक्ति होती है, कर्मजा शक्ति का विकास होता है। योग के दो प्रकार हैं—सावद्ययोग, निरवद्ययोग। सामायिक में सावद्ययोग की निवृत्ति होती है जिससे पाप कर्म रुकते हैं और निरवद्ययोग की प्रवृत्ति होती है जिससे पूर्व संचित पापकर्मा की निर्जरा होती है। पूणिया श्रावक का उदाहरण प्रसिद्ध है। सम्राट श्रेणिक ने जब पूणिया की एक सामायिक को खरीदना चाहा तो भगवान महावीर ने उसे सम्बोध देते हुए कहा—श्रेणिक! एक सामायिक की दलाली करने का मूल्य तुम्हारे राज्य के समग्र वैभव से कई गुना अधिक है। तब सामायिक का मूल्य क्या हो सकता है, तू स्वयं अंकन कर। सम्बोधसत्तरी के अनुसार लाखों-लाख खंडी (बीस मन की एक खण्डी होती है) जितने स्वर्ण को लाख वर्ष पर्यन्त दान करने वाले व्यक्ति के दान का फल एक शुद्ध सामायिक के फल की भी बराबरी नहीं कर सकता।
Q 14. सामायिक और संवर में क्या अन्तर है?
सामायिक और संवर में त्याग की दृष्टि से कोई अन्तर नहीं है। अन्तर है समय का। सामायिक का समय ४८ मिनट का होता है। संवर का समय निश्चित नहीं। जितनी इच्छा हो, किया जा सकता है।
Q 15. श्रावक कौन होता है?
श्रावक शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—श्रृंणोतीति श्रावक:। जो सुनने वाला है वह श्रावक है। वैसे तो जिसके श्रोत्रेन्द्रिय कान हैं वह हर व्यक्ति सुन सकता है, पर सभी सुनने वाले श्रावक नहीं कहलाते। श्रावक उसे कहा जाता है जो तत्त्व को सुनता है। श्रावक शब्द तीन अक्षरों से बना है। इनके आधार पर श्रावक को इस रूप में भी व्याख्यायित किया गया है— श्रा—जिनभाषित तत्व में श्रद्धा रखने वाला। व—विवेकपूर्वक क्रिया करने वाला। क—कर्मरजों को दूर करने वाला। इन तीन विशेषताओं से सम्पन्न व्यक्ति श्रावक कहलाता है।
Q 16. श्रावक के लिए श्रमणोपासक शब्द का प्रयोग भी किया जाता है, उसका क्या तात्पर्य है?
श्रावक का ही दूसरा नाम श्रमणोपासक है। वह श्रमण की उपासना करता है, उसके पास बैठता है इसलिए उसको श्रमणीपासक कहा जाता है। उपासना का अर्थ है—पास में बैठना। जो जैन श्रमणों के पास बैठता है वह जैन श्रमणोपासक कहलाता है। तत्त्व श्रवण श्रमण की उपासना करने से ही प्राप्त होता है। इस दृष्टि से इस नाम की अपनी सार्थकता है।
Q 17. श्रमण की उपासना से क्या-क्या लाभ होते हैं?
श्रमण की उपासना के दस लाभ बताए गए हैं, जिनका अन्तिम फल मोक्ष है— १. श्रवण—अपूर्व तत्त्व सुनने को मिलता है। २. ज्ञान—श्रवण से ज्ञान चेतना का जागरण होता है। ३. विज्ञान—विशिष्ट ज्ञान का नाम है विज्ञान। ज्ञान चेतना के जागरण से हेय, उपादेय का सम्यग बोध होता है। ४. प्रत्याख्यान—हेय, उपादेय का सम्यग् बोध होने के बाद हेय अपने आप छूटने लगता है। इससे प्रत्याख्यान की चेतना जाग जाती है। ५.संयम-संयम अर्थात् प्रवृत्ति निरोध। इससे ज्ञाता-द्रष्टा भाव का विकास होता है। ६.अनाश्रव—संवर-संयम साधना है, उसकी सिद्धि है—संवर। जितना-जितना संयम बढ़ता है, उतना ही संवर का विकास होता जाता है। ७. तप—संवर सधने से तप की चेतना का जागरण होता है। इससे ऊर्जा विकसित होती है और भीतर जमे संस्कार प्रकम्पित होते हैं। ८. व्यवदान—तप की निष्पत्ति है निर्जरण। तप के द्वारा प्रकम्पित संस्कार विलग होने शुरू हो जाते हैं। यही व्यवदान या निर्जरा है। ९. अक्रिया—विजातीय तत्त्व विलग होने से अकर्म की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। चंचलता'प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है। १०. सिद्धि-सिद्धि अर्थात् सफलता या श्रेय की प्राप्ति। इस स्थिति को प्राप्त हो जाने के बाद जन्म-मरण की परम्परा छूट जाती है और आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाती है।
Q 18. श्रावक को कितनी श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है?
सामान्यत: श्रावक की दो श्रेणियां हैं—सम्यक्त्वी आवक, देशव्रती श्रावक।
Q 19. सम्यकत्वी श्रावक की क्या पहचान है?
सम्यक्त्व प्राप्त होता है अनन्तानुबंधी क्रोध, मान, माया और लोभ के उपशम, क्षय और क्षयोपशम से। व्यवहार में देव, गुरु और धर्म के प्रति संपूर्ण आस्था रखने वाला व्यक्ति सम्यक्त्वी कहलाता है। सम्यक्त्वी उपासक का पहला संकल्प होता है—अर्हत् मेरे देव हैं, पांच महाव्रतों का पालन करने वाले मुनि मेरे गुरु हैं और अर्हतों के द्वारा प्ररूपित तत्त्व मेरा धर्म है।
Q 20. सम्यक्त्व का क्या महत्व है, उसकी सुरक्षा के लिए किन दोषों से बचना चाहिए?
सम्यक्त्व साधना का आदि बिन्दु है। यह एक प्रकार से मोक्ष का आरक्षण पत्र है। किसी भी जीवन में यदि एक बार भी सम्यक्त्व का स्पर्श हो जाए तो प्राणी की मुक्ति निश्चित है। इस दृष्टि से सम्यक्त्व की सुरक्षा बहुत बड़ी सुरक्षा है। आगम साहित्य में सम्यक्त्व की सुरक्षा में मुख्य रूप से पांच बाधाएं बताई गई हैं। वे इस प्रकार हैं— १. शंका—स्वीकृत तत्त्व दर्शन में संदेह होना। २. कांक्षा—विपरीत तत्त्व दर्शन के प्रति आकर्षण होना। ३. विचिकित्सा—साधना के फल में संदेह होना। ४. परपाषंड प्रशंसा—मिथ्यादृष्टि व व्रतभ्रष्ट पुरुषों की प्रशंसा करना। ५. परपाषंड परिचय—मिथ्यादृष्टि व व्रतभ्रष्ट पुरुषों का संसर्ग करना।
Q 21. देशव्रती श्रावक कौन होता है?
जो श्रावक के बारह व्रतों को स्वीकार करता है, वह देशव्रती श्रावक कहलाता है।
Q 22. भावक के बारह व्रत कौनसे हैं?
१. अहिंसा अणुव्रत, २. सत्य अणुव्रत, ३. अचौर्यं अणुव्रत, ४. स्वदार/स्वपति संतोष अणुव्रत, ५. इच्छापरिमाण अणुव्रत, ६. दिग्व्रत अणुव्रत, ७. उपभोग परिभोग परिमाण व्रत, ८. अनर्थदण्डविरति, ९. सामायिक, १०. देशावकाशिक, ११. पौषधोपवास, १२. अतिथि-संविभाग।
Q 23. क्या जो श्रावक होता है उसके लिए सभी व्रतों को एक साथ स्वीकार करना जरूरी है? अथवा इच्छानुसार व्रतों को ग्रहण किया जा सकता है?
जो बारहव्रती श्रावक बनता है उसके लिए सब व्रतों को एक साथ स्वीकार करना अनिवार्य है, सबके लिए नहीं। यथाशक्ति जितना व्रत ग्रहण किया जाता है वह धर्म है/संयम है।
Q 24. बिना त्याग किए ही हिंसा आदि से बचा जा सकता है। व्रत स्वीकार करना क्यों जरूरी है?
अहिंसा आदि का सम्बन्ध आन्तरिक पवित्रता से है, संकल्प की दृढ़ता से है। आन्तरिक पवित्रता जितनी होगी उतना ही अहिंसा आदि का आचरण संभव होगा। पर त्याग का अपना मूल्य है। भगवान महावीर ने दो प्रकार के धर्म का निरूपण किया—संवर धर्म और निर्जरा धर्म। निर्जरा धर्म त्याग किये बिना भी हो सकता है पर संवर धर्म बिना त्याग-भाव के नहीं हो सकता। व्यावहारिक दृष्टि से त्याग जहां औरों की प्रतीति का निमित्त बनता है, वहां स्वयं के संकल्प को शिथिल न होने देने में भी सहायक बनता है। त्याग को प्रहरी के तुल्य माना गया है। जैसे प्रहरी की उपस्थिति में कोई भी गैर व्यक्ति घर में प्रवेश नहीं कर सकता वैसे ही त्याग किसी बुराई को भीतर प्रवेश करने से रोकता है।
Q 25. व्रत टूटने की संभावना बनी रहती है। यह भी कहा जाता है कि व्रत को ग्रहण कर उसे तोड़ने से अधिक पाप लगता है। ऐसी स्थिति में व्रत का ग्रहण क्यों करना चाहिए?
स्वीकृत व्रत के टूटने की आशंका को इन्कार नहीं किया जा सकता है, पर इस आशंका से व्रत का ग्रहण ही न हो, यह उचित नहीं। व्यापार करने वाले के व्यापार में घाटा भी हो सकता है, भोजन करने वाले को कभी अजीर्ण भी हो सकता है, चलने वाले को ठोकर भी लग सकती है, पर क्या घाटा लगने के भय से व्यापार को, अजीर्ण होने के भय से भोजन को और ठोकर लगने के भय से चलने को छोड़ा जा सकता है? नहीं। ठीक इसी तरह व्रत-भंग के भय से कभी व्रत स्वीकार न करने की बात नहीं सोचनी चाहिए। व्रत भंग हो जाए तो प्रायश्चित्त लेकर आत्मा की शुद्धि की जा सकती है और भविष्य के लिए विशेष जागरूकता रखी जा सकती है।
Q 26. क्या श्रावक के और भी कोई विभाग होते हैं?
रुचि, क्षमता और विकास के आधार पर श्रावक के चार विभाग होते हैं। वे हैं— १.सुलभबोधि श्रावक—जिनमें सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान एवं व्रतादि नहीं होते पर धर्म सुनने में जिनकी रुचि है, दृष्टिकोण ऋजु है, वे सुलभबोधि श्रावक कहे जाते हैं। २.सम्यग् दृष्टि श्रावक—ये वे श्रावक हैं जो व्रत स्वीकार नहीं कर सकते पर जिनके दर्शन और ज्ञान सम्यक् होते हैं। ३.व्रती श्रावक—सम्यक् दर्शन व सम्यक् ज्ञान के साथ जो व्रत ग्रहण भी करते हैं वे व्रती श्रावक हैं। ४.प्रतिमाधारी श्रावक—प्रतिमा अर्थात् साधना का विशिष्ट प्रयोग। व्रती श्रावक के लिए ग्यारह प्रकार की प्रतिमाओं का उल्लेख आता है। जब श्रावक के मन में साधना का विशिष्ट भाव जागता है तब वे प्रतिमाओं को स्वीकार करते हैं। वे प्रतिमाधारी श्रावक कहलाते हैं। ग्यारहवीं प्रतिमा में श्रावक की साधना एक दृष्टि से श्रमण के तुल्य हो जाती है, इस दृष्टि से उस प्रतिमा का नाम भी श्रमणभूत प्रतिमा है।
Q 27. श्रावक जन्म से होता है या कर्म से?
व्यवहार में श्रावक कुल में जन्म लेने वाले को श्रावक कह देते हैं पर वस्तुत: सच्चा श्रावक वह होता है जो श्रावक के व्रतों को अंगीकार करे। जैसे बिना पढ़े डॉक्टर का बेटा डॉक्टर नहीं कहलाता, वकील का बेटा वकील नहीं बनता वैसे ही बिना श्रावक व्रत अंगीकार किए एवं उसका यथोचित पालन किए कोई भी श्रावक कैसे बन सकता है। इसलिए आवश्यक है जन्म से कोई श्रावक हो या नहीं, कर्म से श्रावक अवश्य बने।
Q 28. गहस्थ जीवन में रहता हुआ श्रावक हिंसा से विरत कैसे हो सकता है?
भगवान महावीर ने हिंसा के तीन प्रकार बताए हैं— १. आरम्भजा हिंसा २. विरोधजा हिंसा ३. संकल्पजा हिंसा। आरम्भजा हिंसा—खेती, व्यवसाय आदि में होने वाली हिंसा। विरोधजा हिंसा—किसी के द्वारा आक्रमण किए जाने पर अपनी सुरक्षा के लिए की जाने वाली हिंसा। विरोधजा हिंसा—किसी के द्वारा आक्रमण किए जाने पर अपनी सुरक्षा के लिए की जाने वाली हिंसा। आरम्भजा हिंसा और विरोधजा हिंसा से श्रावक बच नहीं सकता। पर संकल्पजा हिंसा से वह अवश्य बच सकता है। इस हिंसा का न कोई प्रयोजन होता है न उद्देश्य। मुझे इसका प्राणवध करना है, इस प्रकार संकल्पपूर्वक प्राणवध का नाम संकल्पजा हिंसा है। कुछ व्यक्ति बिना किसी प्रयोजन राह चलते को मार देते हैं, उससे छेड़छाड़ कर लेते हैं। शान्त/चुपचाप खड़े पशु पर आक्रमण कर देते हैं। यह संकल्पजा हिंसा है। श्रावक के लिए यह हिंसा सर्वथा त्याज्य है। इस प्रकार की हिंसा करनेवाला श्रावक अपने अहिंसाव्रत को सुरक्षित नहीं रख सकता। अहिंसा अणुव्रत में चलने-फिरने वाले निरपराध त्रस प्राणियों की संकल्पपूर्वक हिंसा न करने का संकल्प होता है। समूची आतंकवाद की समस्या इस संकल्पजा हिंसा की ही देन है। प्रत्येक व्यक्ति यदि अहिंसा अणुव्रत को स्वीकार कर ले तो आतंकवाद की समस्या स्वयं समाहित हो जाए।
Q 29. क्या श्रावक स्थावर जीवों की हिंसा से बच सकता है?
श्रावक स्थावर जीवों की हिंसा से सर्वथा नहीं बच सकता, पर एक सीमा तक उससे भी बच सकता है। जैसे पृथ्वी खोदने, मकान बनवाने, खेती करने, बाग लगाने, आग जलाने, खाना बनाने, यात्रा करने आदि गृहस्थोचित सभी प्रवृत्तियों में होने वाली हिंसा से वह सर्वथा बच नहीं सकता पर यहां भी यदि विवेक रखे तो बहुत अंशों तक बच सकता है। बिना प्रयोजन मकान आदि बनवाते रहना, पानी का दुरुपयोग करना, नल, पंखा, बिजली आदि को खुला छोड़ देना, वनस्पति का छेदन-भेदन करना, उसे पैरों से रौंदते हुए चलना—यह अनावश्यक स्थावर जीवों की हिंसा है। इससे आसानी से बचा जा सकता है।
Q 30. श्रावक सर्वथा अपरिग्रही नहीं हो सकता, ऐसी स्थिति में उसके लिए अपरिग्रह की सीमा रेखा क्या है?
जैन शस्त्रों में श्रावक के लिए कहीं भी सर्वथा अपरिग्रही बनने की बात नहीं कही गई। भगवान महावीर व्यवहार की भूमिका से परिचित थे। वे इस बात को भली-भांति जानते थे कि व्यापार उसके अपने एवं कुटुम्ब पोषण का साधन है तथा राष्ट्र की आर्थिक स्थिति को संतुलित एवं सुदृढ़ रखने का साधन है। पैसे के बिना उसका काम नहीं चल सकता। इस दृष्टि को ध्यान में रखते हुए उन्होंने श्रावक के लिए बारह व्रतों में एक व्रत दिया जिसका नाम है—उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत। इस व्रत के अन्तर्गत उसके अपरिग्रह अणुव्रत की सीमा स्वत: स्पष्ट हो जाती है। श्रावक को चाहिए कि वह गलत/अन्नैतिक तरीकों से धन का अर्जन न करे, व्यक्तिगत जीवन में सही तरीके से अर्जित सम्पत्ति के उपभोग की सीमा करे। वार्षिक आय की सीमा का निर्धारण करे एवं प्राप्त सम्पत्ति के स्वामित्व का विसर्जन करे। इससे आकांक्षाएं स्वत: सीमित हो जाती हैं। महावीर युग के श्रावकों का वर्णन हमें उपलब्ध है। वे अपार सम्पत्ति के मालिक भी थे पर उन्होंने व्यक्तिगत रूप से सम्पत्ति के उपभोग की सीमा कर अपरिग्रह की दिशा में आदर्श उपस्थित किया। इस संबंध में राजा प्रदेशी का उदाहरण मननीय है।
Q 31. राजा प्रदेशी कौन था?
राजा प्रदेशी शवेतविका नगर का क्रूर, आततायी और अत्याचारी शासक था। धर्म कर्म, आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नरक में उसका कोई विश्वास नहीं था। वह घोर नास्तिक था। कुमारश्रमण केशी के सम्पर्क से उसने जैन तत्त्व को समझा, हृदयंगम किया। श्रावक के बारह व्रत स्वीकार किये। उसने अपने परिग्रह की सीमा के लिए अपनी सम्पत्ति को चार भागों में विभक्त किया। एक भाग सेना के लिए, एक भाग भंडार के लिए, एक भाग अन्त:पुर के लिए और एक भाग कूटागारशाला के लिए सुरक्षित रखा, जहां वेतन भोजी अनेक कर्मचारियों द्वारा विपुल अशन, पान, खाद्य, स्वाद्य तैयार होता, बहुत से श्रमणों, माहणों, भिक्षुओं और राहगीरों को भोजन वितरित होता।
Q 32. राजा प्रदेशी ने सम्पत्ति की व्यवस्था की। क्या यह व्यवस्था करना धर्म है?
इस संबंध में आचार्य भिक्षु ने स्पष्ट दृष्टिकोण दिया है। उन्होंने कहा—स्वामित्व-विसर्जन धर्म है। उपभोग परिभोग की सीमा करना धर्म है किन्तु सम्पत्ति की व्यवस्था के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। जब स्वामित्व का विसर्जन ही करना है तो यह चिन्ता ही क्यों हो कि इसका उपयोग क्या होगा। यदि चिन्ता है तो मानना होगा कि अभी तक उसके प्रति मूर्च्छा है, ममत्व हटा नहीं है। प्रश्न होगा फिर श्रावक विसर्जन के साथ व्यवस्था की बात क्यों सोचता है? व्यवस्था और विसर्जन दोनों अलग-अलग हैं। विसर्जन का अर्थ है ममत्व का हटना। मूर्च्छा हटी कि धर्म हुआ, विसर्जन हुआ। व्यवस्था करना तो मात्र एक कर्त्तव्य/दायित्व है। दायित्व का चिन्तन अनावश्यक नहीं है। सम्पत्ति गलत हाथों में न चली जाए, उसका दुरुपयोग न हो इसलिए व्यवस्था की जाती है। श्रावक व्यवस्था को कभी भी धर्म के साथ नहीं जोड़ता।
Q 33. श्रावक का बारहवां व्रत है यथासंविभाग। बारहवें व्रत का संबंध संयमी आत्मा से है। उन्हें शुद्ध दान देकर ही बारहवां व्रत निपजाया जाता है। जहां साधु-संत नहीं जाते, तो वहां रहने वाले श्रावकों के बारहवां व्रत कैसे निपजता है?
व्रत का संबंध दान देने के साथ-साथ भावना से जुड़ा है। प्रतिदिन भोजन से पूर्व भोजन पात्र को सामने रखकर श्रावक यह चिन्तन करे कि कितना अच्छा हो अभी कोई संयमी आत्मा मेरे घर आये और मेरे हाथ से भोजन का कुछ हिस्सा ग्रहण करे। मुनि घर आये न आए, भिक्षा ले न ले, किन्तु इस भावना से चित्त को भावित करना श्रावकचर्या का अंग है। इससे उसके बारहवें प्रत का पालन हो सकता है। डॉ. हर्बर्ट वारेन इंग्लैण्ड निवासी जैन-श्रावक थे। एक प्रसंग में डॉ. हर्बर्ट ने अपने को बारहव्रती श्रावक बतलाया। उनसे पूछा गया—आप इंग्लैण्ड में रहते हैं। जैन-साधु वहां नहीं हैं। फिर आपके बारहवें व्रत का पालन कैसे होता है? साधुओं को दान कैसे देते हैं? उन्होंने बताया—मैं भोजन करने से पूर्व प्रतिदिन यह भावना करता हूं कि साधु मेरे घर आए और मुझसे कुछ लें—इस प्रकार मैं बारहवें व्रत का पालन भावना से करता हूं।
Q 34. क्या श्रावक लौकिक देवों, कुल देवों अथवा अन्य मत के देवों की पूजा करता है? वन्दना नमस्कार करता है?
मूलत: तो सबसे बड़े देव आत्मा के आदर्श अर्हत् वीतराग हैं। उनसे बढ़कर कोई देव नहीं है। फिर भी कुछ श्रावक मानसिक दुर्बलता अथवा कुलपरम्परा से मान्य लौकिक देवों की पूजा करते हैं, पर धर्मबुद्धि से नहीं करते। आगमों में आनंद आदि ऐसे श्रावकों का वर्णन भी आता है जिनकी आस्था जिन-शासन में इतनी प्रगाढ़ थी कि वे छह आगार (छूट) के अतिरिक्त कठिन से कठिन परिस्थिति में भी दूसरे देवों की सहायता की कामना नहीं करते थे। वे छह आगार इस प्रकार हैं—१. राजा की आज्ञा, २. समाज की आज्ञा, ३. बलशाली व्यक्ति का दबाव, ४. दैवयोग, ५. माता-पिता एवं गुरुजनों का आग्रह, ६. देश-काल परिस्थितिवश जीवन-निर्वाह न होने की स्थिति।
Q 35. श्रमणोपासक की जीवनशैली कैसी होनी चाहिए?
आचार्य हेमचंद्र ने योगशस्त्र में श्रमणोपासक की जीवनशैली का एक बहुत सुंदर चित्र खींचा है। वह प्रत्येक श्रावक के लिए मननीय और अनुकरणीय है। उसके अनुसार श्रावक का स्वरूप निम्नोक्त है— श्रावक न्याय से अर्जित वैभव से सम्पन्न होता है। शिष्टजन सम्मत आचार का प्रशंसक होता है। समान कुल और शील वाले अन्य गोत्र में उत्पन्न व्यक्ति के साथ विवाह संबंध स्थापित करता है। पापभीरू होता है। प्रसिद्ध देशाचार का पालन करता है। किसी का अवर्णवाद (निन्दा) नहीं बोलता। राजा आदि विशिष्ट व्यक्तियों का अवर्णवाद तो वह बोलता ही नहीं। वह ऐसे स्थान में रहता है जो न अधिक गुप्त हो, न अधिक खुला हो तथा जिसका पड़ौस अच्छा हो। उसके निवास स्थान में आने-जाने के द्वार अधिक नहीं होते। वह सदाचारी व्यक्तियों के साथ रहता है। माता-पिता और गुरुजनों का आदर करता है। वह ऐसे स्थान का त्याग कर देता है जहां साधना में बाधा उपस्थित होती रहती है। वह गर्हित कार्य में प्रवृत्त नहीं होता। आय से अधिक व्यय नहीं करता। घर की स्थिति के अनुसार वेशभूषा रखता है। शुश्रुषा, श्रवण, ग्रहण, धारणा आदि बुद्धि के आठ गुणों से युक्त होता है। निरन्तर धर्मोपदेश सुनने के लिए उत्सुक रहता है। खाद्य-संयम का अभ्यास करता है। समय पर एकाग्रता के साथ भोजन करता है। परस्पर बिना किसी अवरोध के औचित्य के साथ धर्मादि की साधना करता है। साधुओं को दान देने के लिए तत्पर रहता हुआ अतिथि सत्कार में भी जागरूक रहता है। वह कभी अभिनिवेश (आग्रह) नहीं करता। गुणों का पक्षपाती होता है। देश और काल से विपरीत चर्या से दूर रहता है। अपनी क्षमता और अक्षमता से परिचित रहता है। आचारवान होता है। छल ज्ञानवृद्ध व्यक्ति के प्रति पूज्थभाव रखता है। अपने अश्रितों का पोषण करता है। दीर्घदर्शी होता है। विशेषज्ञ होता है। कृत उपकार को समझता है। लोकप्रिय होता है। लज्जालु, सदय, सौम्य और परोपकार-निपुण होता है। लज्जालु, सदय, सौम्य और परोपकार-निपुण होता है। अपनी पांचों इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखता है।
Q 36. श्रमणोपासक की धार्मिक दिनचर्या कैसी होनी चाहिए?
प्रत्येक व्यक्ति की चर्या नियमित हो यह आवश्यक है। धार्मिक व्यक्ति के लिए तो यह नितान्त जरूरी है। नियमित चर्या शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टि से लाभप्रद है। श्रावक अपनी अन्यान्य चर्या के साथ धार्मिक दृष्टि से भी करणीय कार्यों के प्रति सजग रहे यह आवश्यक है। श्रावक को चाहिए कि प्रात:काल बिछौने से उठते ही अपने इष्ट का स्मरण या जप करे। उसके बाद यथासंभव ध्यान व सामायिक का अभ्यास करे। सामायिक न हो सके तो कम से कम दस-पन्द्रह मिनट ध्यान व स्वाध्याय का क्रम रहे। समय अपनी सुविधानुसार रखा जा सकता है। गांव में यदि साधु-साध्वियों की उपस्थिति हो तो उनकी उपासना भी चर्या का एक अंग रहना चाहिए। स्वल्पकालिक उपासना में सन्तदर्शन और दीर्घकालिक उपासना में प्रवचन श्रवण या धर्म चर्चा की जा सकती है। रात्रि में सोने से पूर्व कुछ क्षणों के लिए आत्मचिन्तन करना, करणीय व अकरणीय का विचार करना भी श्रमणोपासक की चर्या का एक अंग बनता है।
Q 37. सम्यक्त्वी श्रावक में कौनसा गुणस्थान पाता है?
चौथा।
Q 38. देशव्रती श्रावक में कौनसा गुणस्थान पाता है?
पांचवां।
Q 39. ठाणं सूत्र में श्रमणोपासक के तीन मनोरथ बताए गए हैं, वे कौनसे हैं और उनका क्या प्रयोजन है?
मनोरथ अर्थात् मानसिक शुभसंकल्प। मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य मन की कल्पना में जैसा चित्र बनाता है उसी के अनुरूप उसके व्यक्तित्व का निर्माण हो जाता है। जैन साहित्य में श्रमणोपासक के निम्नलिखित तीन मनोरथ हैं १. मुझे अल्पल्य और बहुमूल्य परिग्रह के स्वामित्व से मुक्त होना है। २. मुझे गृहस्य जीवन को छोड़कर मुनि धर्म का पालन करना है। ३. मुझे अपने जीवन के सांध्यकाल में सब प्रकार की आशा-वांछा से मुक्त होकर अनशन पूर्वक समाधिस्थ होना है। ये संकल्प एक प्रकार का भावनायोग है। इस भावना से भावित श्रावक अपरिग्रह की दिशा में प्रस्थान करता हुआ अपनी मंजिल को निकट कर सकता है।
Q 40. पहले रात्रि में अंधेरा होता था इसलिए रात्रि-भोजन का निषेध किया गया। पर आज तो प्रकाश सुलभ है फिर रात्रि-भोजन निषिद्ध क्यों?
रात्रि-भोजन के निषेध के पीछे अहिंसा का विचार तो मुख्य रूप से है ही किन्तु उसके साथ स्वास्थ्य की दृष्टि भी जुड़ी हुई है। आज यह तथ्य विज्ञानसम्मत हो चुका है कि सूर्य के प्रकाश में, सूर्य की साक्षी में किये गये भोजन का जो परिपाक होता है वह रात्रि में किए गए भोजन का नहीं होता। रात्रि में किया गया भोजन वायु-प्रधान बन जाता है, जो अनेक बीमारियों को निमंत्रण देने वाला होता है।
Q 41. प्रतिक्रमण शब्द का क्या अर्थ है?
प्रतिक्रमण का शाब्दिक अर्थ है—पीछे लौटना। तात्पर्य है—अशुभ प्रवृत्ति से शुभ प्रवृत्ति में,आना। हरिभद्र सूरि ने कहा है— स्वस्थानात् यत् परस्थानं प्रमादस्य वशाद् गत:। तत्रैव क्रमणं भूय: प्रतिक्रमणमुच्यते।। व्यक्ति प्रमादवश अन्तर्मुखता से हटकर बहिर्मुख बन जाता है। पुन: संभलकर अन्तर्मुख होने का नाम है प्रतिक्रमण। सीधे शब्दों में कहा जाए तो प्रतिक्रमण का अर्थ है—अपनी भूलों को देखना और उनका प्रायश्चित्त करना।
Q 42. प्रतिक्रमण से क्या लाभ होता है?
गौतम स्वामी ने भगवान महावीर से प्रश्न किया—भंते! प्रतिक्रमण करने से क्या प्राप्त होता है? भगवान ने कहा—गौतम! अशुभ प्रवृत्ति से व्रतों में छिद्र हो जाता है। प्रतिक्रमण व्रतों में होने वाले छिद्रों को ढकता है। प्रतिक्रमण एक प्रकार का स्नान है। जैसे स्नान करने से शरीर स्वच्छ होता है वैसे ही दोषों का प्रतिक्रमण करने से आत्मा निर्मल होती है।
Q 43. प्रतिक्रमण किस सूत्र का अंग है?
आवश्यक सूत्र का।
Q 44. आवश्यक सूत्र कितने अंग वाला है?
आवश्यक सूत्र के छह अंग हैं—सामायिक, चउवीसत्थव, वंदना, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग, प्रत्याख्यान।
Q 45. आवश्यक का क्या अर्थ है?
अवश्यकरणीय कार्य।
Q 46. प्रतिक्रमण आवश्यक सूत्र का ही एक अंग है फिर आवश्यक के स्थान पर प्रतिक्रमण शब्द अधिक प्रचलित कैसे हुआ?
इस प्रश्न के उत्तर पर हमें छहों आवश्यकों के प्रतिपाद्य पर विचार करना होगा। सामायिक आवश्यक में समता की साधना का संकल्प है। चउवीसत्थव आवश्यक में तीर्थंकरों की स्तुति है। वंदना आवश्यक में गुरु वन्दन है। कायोत्सर्ग आवश्यक में स्थूल रूप से शारीरिक, मानसिक व वाचिक क्रिया का विसर्जन है और प्रत्याख्यान आवश्यक में भविष्य में न करने का संकल्प है। एक प्रतिक्रमण आवश्यक ऐसा है जिसमें स्वीकृत व्रतों की स्मृति और उनमें होने वाली भूलों की आलोचना की जाती है। संभव है इस दृष्टि से प्रतिक्रमण शब्द अधिक प्रचलित हुआ हो।
Q 47. प्रतिक्रमण के कितने प्रकार हैं?
दो-साधु प्रतिक्रमण व श्रावक प्रतिक्रमण।
Q 48. साधु व श्रावक प्रतिक्रमण में क्या अन्तर है?
साधु प्रतिक्रमण महाव्रतों व समिति-गुप्ति की आलोचना पर आधारित है। श्रावक प्रतिक्रमण बारह व्रतों की आलोचना पर आधारित है।
Q 49. दैवसिक, रात्रिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक व सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में क्या अन्तर है?
दैवसिक प्रतिक्रमण में दिवस सम्बन्धी, रात्रिक प्रतिक्रमण में रात्रि सम्बन्धी, पाक्षिक प्रतिक्रमण में पक्ष सम्बन्धी, चातुर्मासिक प्रतिक्रमण में चार मास सम्बन्धी व सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में एक वर्ष सम्बन्धी दोषों की आलोचना की जाती है। दैवसिक व रात्रिक प्रतिक्रमण में चार लोगस्स का, पाक्षिक प्रतिक्रमण में बारह लोगस्स का, चातुर्मासिक प्रतिक्रमण में बीस लोगस्स का एवं सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में चालीस लोगस्स का ध्यान किया जाता है। 'तस्स मिच्छामि दुक्कड' पाठ बोलने से पूर्व दैवसिक प्रतिक्रमण में देवसिओ अइयारो कओ, पश्चिम रात्रि में राइओ अइयारो कओ, पाक्षिक प्रतिक्रमण में देवसिओ पक्खिओ अझयारो कओ, चातुर्मासिक प्रतिक्रमण में देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ अइयारो कओ, सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में देवसिओ संवच्छरिओ अइयारो कओ का उच्चारण होता है।
Q 50. प्रतिक्रमण का समय कौनसा है?
सायंकालीन प्रतिक्रमण का समय सूर्यास्त से लेकर एक मुहूर्त्त यानी ४८ मिनट का है और प्रात:कालीन प्रतिक्रमण का समय सूर्योदय से पूर्व का एक मुहूर्त्त है।
Q 51. प्रतिक्रमण का समय एक मुहूर्त्त ही क्यों?
आगम साहित्य में प्रतिक्रमण का कालमान कहीं भी निर्दिष्ट नहीं है। उत्तरवर्ती ग्रन्थों में उसका कालमान एक मुहूर्त्त बताया गया है। इसके पीछे मुख्य रूप से दो हेतु दिये गए हैं— १. छद्मस्थ व्यक्ति की मानसिक एकाग्रता की स्थिति अन्तर्मुहूर्त्त से अधिक नहीं रह सकती। प्रतिक्रमण करने वाला एकाग्रता की स्थिति में अपने दोषों की आलोचना कर सके इस दृष्टि से प्रतिक्रमण का कालमान एक मुहूर्त्त का है। २. जिस प्रवृत्ति के लिए आगम में कालमान का निर्देश नहीं है उसका कालमान एक मुहूर्त्त का समझना चाहिए। जैसे नवकारसी और सामायिक का समझा जाता है। इनका काल भी आगम में निर्दिष्ट नहीं है।
Q 52. क्या सभी तीर्थंकरों के युग में प्रतिक्रमण दोनों समय किया जाता था?
पहले व अन्तिम तीर्थंकरों के साधु-साध्वियों के लिए दोनों समय प्रतिक्रमण करने की अनिवार्यता है। मध्यवर्ती बावीस तीर्थंकरों के साधु- साध्वियों के लिए प्रतिक्रमण का निश्चित समय नहीं है। वे जब दोष लगता, तभी उसकी आलोचना कर लेते।
Q 53. क्या श्रावक प्रतिक्रमण श्रावक को ही करना चाहिए?
कुछ लोगों का विचार है प्रतिक्रमण उन्हीं को करना चाहिए जिनके बारहव्रत ग्रहण किये हुए हों। जिनके त्याग ही नहीं उनके प्रायश्चित्त कैसा? पर यह दृष्टिकोण समुचित प्रतीत नहीं होता। प्रतिक्रमण कोई भी व्यक्ति कर सकता है। व्रतों में स्खलना हुई हो तो उसकी शुद्धि हो जाती है। व्रत स्वीकार किये बिना प्रतिक्रमण किया जाता है तो प्रतिक्रमण करने वाले को आत्मनिरीक्षण का मौका मिलता है, मन और वाणी की शुद्ध प्रवृत्ति होती है, स्वाध्याय होता है, कायोत्सर्ग होता है और त्याग की भावना जागृत होती है। ♦