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जैन धर्म परिचय

सम्राट् चन्द्रगुप्त के सोलह स्वप्‍न

सम्राट चन्द्रगुप्त के सोलह स्वप्‍न

पाटली पुत्र के महाराज चन्द्रगुप्त की महारानी का नाम प्रियदर्शना था । राजा धर्मनिष्‍ठ था । एक दिन पौषध में सोलह स्वप्‍न देखे । स्वप्‍न देखकर मन में आश्‍चर्य, भय तथा कौतूहल भी हुआ कि इनका क्या फल होगा । उन दिनों भद्रबाहु स्वामी जो कि चौदह पूर्व के ज्ञाता थे, वे वहां पधारे । अवसर देखकर राजा ने इनसे अर्थ पूछना चाहा । आचार्यश्री ने जो अर्थ बताया, उस आधार पर बने ग्रंथ का नाम ‘व्यवहार चूलिका’ है । उसमें वर्णित स्वप्‍नार्थ यों हैं—

प्रथम स्वप्‍न—कल्पवृक्ष की शाखा टूटी हुई देखी ।

अर्थ—राजा लोग संयम नहीं लेंगे ।

दूसरा स्वप्‍न—असमय सूर्य को अस्त होते देखा ।

अर्थ—वर्तमान में जन्में लोगों को केवलज्ञान प्राप्ति नहीं होगी ।

तीसरा स्वप्‍न—चन्द्रमा चालनी बन गया ।

अर्थ—जैन शासन विभिन्‍न सम्प्रदायों तथा समाचारियों में विभाजित हो जायेगा ।

चौथा स्वप्‍न—अट्टहास करते भूत—भूतिनी को नाचते देखा ।

अर्थ—स्वच्छन्दताचारी व ढोंगी साधुओं का सम्मान बढ़ेगा ।

पांचवां स्वप्‍न—बारह फन वाला काला सर्प देखा ।

अर्थ—बारह वर्ष का दुष्काल पड़ेगा । साधुओं को आहार मिलना दुष्प्राप्य हो जायेगा । ऐसी स्थिति में स्वाध्याय के अभाव से ज्ञान विलुप्त हो जायेगा ।

छठा स्वप्‍न—देवताओं का विमान लौटते देखा ।

अर्थ—विशिष्‍ट लब्धियां विलुप्त हो जायेंगी ।

सातवां स्वप्‍न—कचरे के ढेर पर कमल खिला हुआ देखा ।

अर्थ—जैन शासन की बागडोर ऐसे व्यक्तियों के हाथ में आ जायेगी जो उसमें सौदेबाजी चलाएंगे ।

आठवां स्वप्‍न—पतंगियों को उद्योत करते देखा ।

अर्थ—धर्म आडम्बरों में ही शेष रह जायेगा ।

नवां स्वप्‍न—तीन दिशाओं में समुद्र सूखा हुआ है । केवल दक्षिण दिशा में थोड़ा सा जल है, वह भी मटमैला सा ।

अर्थ—तीर्थंकरों का विहार हुआ है, वहां प्रायः धर्म का ह्रास होगा केवल दक्षिण में धर्म प्रचार होगा ।

दसवां स्वप्‍न—सोने के थाल में कुत्ता खीर खा रहा था ।

अर्थ—उत्तम श्रीहीन होंगे । पापाचारी आनन्द करेंगे ।

ग्यारहवां स्वप्‍न—हाथी पर बन्दर बैठा देखा ।

अर्थ—लौकिक और लोकोत्तर पक्षों में अधर्मी और आचारहीन व्यक्तियों को सम्मान व उच्च पद मिलेगा ।

बारहवां स्वप्‍न—समुद्र मर्यादा छोड़कर भागा जा रहा था ।

अर्थ—उत्तम व्यक्ति भी पेट पालने के लिए मर्यादाहीन हो जाएंगे ।

तेरहवां स्वप्‍न—एक विशाल रथ में छोटे—छोटे बछड़े जुते हुए थे ।

अर्थ—छोटे—छोटे बालक संयम के रथ को खींचेंगे ।

चौदहवां स्वप्‍न—महामूल्य रत्‍न को तेजहीन देखा ।

अर्थ—साधुओं का परस्पर कलह, अविनय आदि के कारण चरित्र का तेज घट जाएगा ।

पन्द्रहवां स्वप्‍न—राजकुमार को बैल की पीठ पर चढ़ा देखा ।

अर्थ—क्षत्रिय आदि विशिष्‍ट वर्ग जिन—धर्म छोड़कर मिथ्यात्व के पीछे लगेंगे, दुर्जनों का विश्‍वास करेंगे ।

सोलहवां स्वप्‍न—दो काले हाथियों को युद्ध करते देखा ।

अर्थ—पिता—पुत्र और गुरु—शिष्य परस्पर विग्रह करेंगे । अतिवृष्‍टि और अनावृष्‍टि होगी ।