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मंगल साधना

अर्हत् वन्दना

1. णमो अरहंताणं,

णमो सिद्धाणं,

णमो आयरियाणं,

णमो उवज्झायाणं,

णमो लोए सव्वसाहूणं,

नमन हमारा अरहन्तों को, सिद्धों को, आचार्यों को ।

आगम पुरुष उपाध्यायों को, और लोक के सब सन्तों को ।।

2. एसो पंच णमुक्कारो, सव्व पावपणासणो ।

मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं ।।

नमस्कार—पंचक यह पावन, करता सब पापों का नाश ।

सभी मंगलों में प्रधान है, प्रकटे भीतर दिव्य प्रकाश ।।

3. जे य बुद्धा अइक्कंता, जे य बुद्धा अणागया ।

संती तेसिं पइट्ठाणं, भूयाणं जगई जहा ।।

जितने अर्हत् हुए लोक में, होंगे जितने फिर अरहन्त ।

उन सबका आधार शान्ति है, जीवों का जैसे यह जगती ।।

4. से सुयं च मे, अज्झत्थियं च मे—

बंधपमोक्खो तुज्झ अज्झत्थेव ।

मैंने सुना और आत्म—अनुभव से जाना,

बन्धन मुक्ति तुम्हारे अपने ही भीतर है ।।

5. पुरिसा ! तुममेव तुमं मित्तं

किं बहिया मित्तमिच्छसि ?

पुरुष ! स्वयं का मित्र स्वयं तू,

फिर क्या बाहर मित्र खोजता ?

6. पुरिसा ! अत्ताणमेव अभिणिगिज्झ,

एवं दुक्खा पमोक्खसि ।

पुरुष ! स्वयं का ही निग्रह कर,

ऐसे दुःख मुक्त होगा तू ।

7. पुरिसा ! तुमंसि नाम सच्चेव,

जं ‘हंतव्वं’ ति मन्‍नसि ।

पुरुष ! जिसे हंतव्य मानता,

वह तू ही है, केवल तू ही ।।

8. सव्वे पाणा ण हेतव्वा—

एस धम्मे धुवे, णिइए सासए ।

वध्य नहीं है कोई भी प्राणी इस जग का ।

यही अहिंसा धर्म नित्य है, शाश्‍वत, ध्रुव है ।

9. पुरिसा ! सच्चमेव समभिजाणाहि ।

पुरुष ! सत्य का ही अनुचिन्तन अनुशीलन कर ।

10. सच्चे भयवं ।

सत्य स्वयं भगवान रूप है ।

11. सच्चं लोयम्मि सारभूयं ।

सत्य लोक में सारभूत है ।

12. इणमेव णिग्गंथं पावयणं सच्चं ।

निर्ग्रन्थों का यह प्रवचन ही परम सत्य है ।

13. उटि्ठए णो पमायए ।

जाग गए हो, अब मत करना कभी प्रमाद ।

14. सव्वतो पमत्तस्स भयं,

सव्वतो अप्पमत्तस्स पत्थि भयं ।

जो प्रमत्त है, उसको सभी ओर से भय है ।

अप्रमत्त को किसी ओर से भय न सताता ।

15. समया धम्म मुदाहरे मुणी ।

समता धर्म बताया मुनि ने ।

16. लाभालाभे सुहे—दुक्खे, जीविए—मरणे तहा ।।

समो निंदा—पसंसासु, तहा माणावमाणओ ।

लाभ—अलाभ, दुःख—सुख में सम, जीवन—मरण मान—अपमान ।

स्तुति—निन्दा—इन सब द्वन्द्वों में, सम रहता मुनि प्रज्ञावान ।।

17. अणिस्सिओ इहं लोए, परलोए अणिस्सिओ ।

वासीचंदणकप्पो य, असणे अणसणे तहा ।

ऐहिक और पारलौकिक विषयों से रहे अनिश्रित ।

कोई करे प्रहार वसौले से या चन्दन—चरश्‍चित ।।

मिले मनोगत भोजन, भूखा रहना पड़े किसी क्षण ।

इन सबमें सम रहना ही समता का लक्षण ।।

18. अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य ।

अप्पा मित्तममित्तं च, दुप्पट्ठिय सुपट्ठिओ ।।

आत्मा ही अपने सुख—दुःख की कर्ता और विकर्ता ।

वही मित्र जो सुप्रवृत्त है, दुष्प्रवृत्त रिपु बनती ।

19. अप्पा गई वेयरणी, अप्पा मे कूड़सामली ।

अप्पा कामदुहा घेणू, अप्पा मे नंदणं वर्ण ।।

वैतरणी सरिता आत्मा ही, आत्मा ही है कूट शाल्मली ।

है आत्मा ही कामधेनु, यह आत्मा ही नन्दन वन है ।

20. जो सहस्सं सहस्साणं, संगामे दुज्जए जिणे ।

एगं जिणेज्ज अप्पाणं, एस से परमो जओ ।।

जो दस लाख शत्रुओं पर भी, रण में विजय प्राप्त कर लेता ।

एक जीतता निज आत्मा को, परम विजय उसकी कहलाती ।।

21. खामेमि सव्वजीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे ।

मित्ती मे सव्वभूएसु, वेर मज्झ न केणई ।।

क्षमादान देता हूं सबको, क्षमा मुझे दे सारे जीव ।

सब जीवों से मैत्री मेरी, नहीं किसी से मेरा वैर ।।

22. अरहंता मंगलं, सिद्धा मंगल, साहू मंगलं,

केवलि—पपणत्तो धम्मो मंगल ।

मंगलमय मंगल हैं अर्हत्, सिद्ध साधु जन हैं मंगल ।

धर्म केवली—भाषित मंगल, ये चारों ही हैं मंगल ।।

23. अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा,

केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो ।

परमोत्तम लोकोत्तम अर्हत्, सिद्ध साधुजन लोकोत्तम ।

धर्म केवली—भाषित उत्तम, ये चारों ही लोकोत्तम ।

24. अरहंते सरणं पवज्जामि, सिद्धे सरणं पवज्जामि, साहू

सरणं पवज्जामि, केवलि—पण्णत्तं धम्म सरणं पवज्जामि ।

अर्हतों की और सिद्धों, साधुओं की शरण में ।

जा रहा हूँ केवली—भाषित धर्म की शरण में ।।

स्वस्थ मन से और वाणी, कर्म से अभिवन्दना ।

करूं मैं नित अर्हतों की भावभीनी वन्दना ।।

वन्दना

भाव—भीनी वन्दना भगवान चरणों में चढ़ाएं ।

शुद्ध ज्योतिर्मय निरामय रूप अपने आप पाएं ।।

1. ज्ञान से निज को निहारें, दृष्‍टि से निज को निखारें ।

आचरण की उर्वरा में, लक्ष्य तरुवर लहलहाए ।।

2. सत्य में आस्था अचल हो, चित्त संशय से न चल हो ।

सिद्ध कर आत्मानुशासन, विजय का संगान गाएं ।।

3. बिन्दु भी हम सिन्धु भी हैं, भक्त भी भगवान भी हैं ।

छिन्‍न कर सब ग्रन्थियों को, सुप्त चेतन को जगाएं ।।

4. धर्म है समता हमारा, कर्म समतामय हमारा ।

साम्य योगी बन हृदय में, स्रोत समता का बहाएं ।।*

*लय : लक्ष्य है ऊंचा हमारा