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मंगल साधना

सामायिक का अभिनव प्रयोग

वेश—भूषा—सादगी प्रधान हो । महिलाओं में भी सफेद परिधान हो तो अच्छा रहे ।

उपकरण—आसन, मुखवस्त्रिका, सफेद चद्दर ।

आसन—सबका एक रहे । पद्‍मासन, सुखासन आदि में इस प्रकार पंक्तिबद्ध बैठा जाए जिससे एक—दूसरे का स्पर्श न हो । (पंक्तिबद्धता के लिए आगे—पीछे व बगल में भी देखना चाहिए ।)

विधि—सर्वप्रथम त्रिपदी1 वंदना करें ।

सामूहिक णमोक्कार मंत्र का उच्चारण करते हुए सामायिक—(सामायिक पाठ) संकल्प करें ।

सामायिक स्वीकार करते ही एक लोगस्स का कायोत्सर्ग करें । (एक श्‍वासोच्छ्वास में लोगस्स के एक पद का उच्चारण हो, इस रूप में सम्पूर्ण लोगस्स का कायोत्सर्ग किया जाए) कायोत्सर्ग के बाद सामायिक को चार भागों में विभक्त किया जाए ।

1. जपयोग का प्रयोग—समय दस मिनट। ध्यान की मुद्रा में ‘अ. सि. आ. उ. सा.’ मंत्र का एक स्वर से उच्चारण किया जाए । अ. सि. आ. उ. सा.—अरहंत, सिद्ध, आयरिय, उवज्झाय, साहू—पंच परमेष्‍ठी के प्रथम—प्रथम अक्षरों से निर्मित पंचाक्षरी मंत्र है । पंचाक्षरी मंत्र के उच्चारण में प्रत्येक अक्षर के लिए निर्धारित स्थान ध्यान में रहे । परमेष्‍ठी के पांच स्थान हैं—

अरहन्त का स्थान—सिर का मध्यभाग

सिद्ध का स्थान ललाट का मध्यभाग

आचार्य का स्थान—कण्ठ का मध्यभाग

उपाध्याय का स्थान हृदय

साधु का स्थान—नाभि

(जपयोग करते समय प्रत्येक अक्षर के उच्चारण के साथ मन उस—उस स्थान पर केन्द्रित रहे)

2. ध्यान—योग का प्रयोग—समय दस मिनट । रीढ़ की हड्डी एवं गर्दन को सीधा रखते हुए बिना किसी अकड़न के श्‍वास को लम्बा, गहरा और मन्द, आसानी से जितना लिया जा सके, लें एवं उसी रूप में छोड़ें । श्‍वास लेते समय मन को नासाग्र पर टिकाएं । आते—जाते प्रत्येक श्‍वास को देखें । साथ—साथ यह भी अनुभव करें कि श्‍वास लेते समय पेट फूलता है । और छोड़ते समय सिकुड़ता है ।

3. स्वाध्याय योग का प्रयोग—समय पन्द्रह मिनट ।

स्वाध्याय योग में वाचन ऐसा हो, जिसमें सबका मन लगे । उदाहरण के रूप में चौबीसी के भजनों का संगान, जैन तत्त्व विद्या का वाचन, णमोक्कार मंत्र का अर्थ आदि किए जा सकते हैं ।

4. त्रिगुप्ति साधना का प्रयोग—समय आसानी से जितना हो सके, तीन से पांच मिनट । इसमें मन से सोचे नहीं, वचन से बोले नहीं और शरीर से हिले—डुलें नहीं ।

परमेष्‍ठी वन्दना का सामूहिक एक लय में संगान करें ।

पुनः त्रिपदी वन्दना करें ।

सामायिक व्रत की आलोचना करें ।1

मंगल पाठ के उच्चारण के साथ सामायिक सम्पन्‍न की जाए ।2

1. विधि—वन्दना की मुद्रा (घुटनों के बल पर बैठे, दोनों हाथ जुड़े रहें) त्रिपदी वन्दना कराने वाला ॐ ह्रीं श्रीं—इन तीनों शब्दों का उच्चारण करता है । ॐ का उच्चारण हो तब सबके सब एक साथ हाथ जोड़कर घुटनों के बल वन्दना की मुद्रा में स्थिर हो जाएं और ‘वंदे शब्द का उच्चारण करें । ह्रीं का उच्चारण होते ही सबके सब एक साथ ‘अर्हम्’ कहते हुए जमीन तक मस्तक को झुकाएं और तब तक झुकाए रखें जब तक श्रीं का उच्चारण न हो जाए । श्रीं का उच्चारण होते ही मस्तक को ऊपर उठाते हुए पुनः वन्दना की मुद्रा में लौट आएं । इसी तरह दूसरी बार ‘वंदे गुरुवरम्’ एवं तीसरी बार ‘वंदे सच्चे’ का उच्चारण किया जाए ।

1. देखें सामायिक पारने का पाठ ।

2. सामायिक का अभिनव प्रयोग उसकी विधि के ज्ञाता और अनुभवी के सान्‍निध्य में करना चाहिए ।