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प्रेक्षा और अनुप्रेक्षा

आनन्द भावना

आनन्दो मे वर्षति वर्षति —मेरे अन्तःकरण में आनन्द बरस रहा है ।

नो मे दुखं, नो मे दुःखम् —मुझे कोई दुःख नहीं है, कोई दुःख नहीं है ।

शांतं चित्तं लब्धं लब्धम्—चित्त शान्त हो गया है, शान्त हो गया है ।

नो मे तापः, नो मे तापः—कोई ताप नहीं है, कोई ताप नहीं है ।

शक्ति—स्रोतः प्रादुर्भूतम्—भीतर में शक्ति का स्रोत फूट गया है ।

नो मे दैन्यं, नो मे दैन्यम्—दीनता मिट गई है, दीनता मिट गई है ।

अंतश्‍चक्षुः लब्धं लब्धम्—अन्तःचक्षु खुल गया है, खुल गया है ।

नो मे रात्रिः, नो मे रात्रिः—अब मेरे सामने रात या अन्धकार नहीं है ।

नो मे दुःखं, नो मे तापः—मुझे न दुःख है, न ताप ।

नो मे दैन्यं, नो में रात्रिः—अब न दीनता है, न रात ।

शांतः क्रोधः, शांतं मानम्—क्रोध भी शान्त है, मान भी शान्त ।

शांता माया, शान्तो लोभः—माया भी शान्त है, लोभ भी शान्त ।

शांतं पापं, उदिता शान्तिः—पाप शान्त हो गया है, शान्ति प्रकट हो गई है ।

उदिता ऋजुता, उदिता मृदुता—ऋजुता जनम गई है, मृदुता आ गई है ।

उदिता तुष्‍टिः , उदितो धर्मः—संतोष उतर रहा है, धर्म का उदय हो गया है ।

नो में दुःखं, नो मे तापः—मुझे कोई दुःख नहीं है, कोई ताप नहीं है ।

नो मे दैन्यं, नो मे रात्रिः—दीनता मिट गई है, रात समाप्त हो गई है ।

उदितो धर्मः, मुदितं चित्तम् —धर्म का उदय हो गया, चित्त प्रमुदित है ।

मुदितं चित्तं, मुदितं चित्तम् —चित्त प्रमुदित है, चित्त प्रमुदित है ।

अनित्य—अनुप्रेक्षा

(नोट—अनित्य—अनुप्रेक्षा करने से पहले अर्हं की ध्वनि और ध्येय सूत्र का उच्चारण करें तथा कायोत्सर्ग की मुद्रा में यह प्रयोग करें ।)

(यह विसम्बन्ध का प्रयोग है, स्थूल से सूक्ष्म की तरफ चलें । फिर सूक्ष्म से स्थूल की तरफ वापस लौटें । सारे सम्बन्धों को देखते चले जाएं ।)

जिस स्थान (मकान या गांव) पर बैठे हैं, यह मात्र संयोग है । जिसका संयोग होता है उसका निश्‍चित वियोग होता है । स्थान के साथ संयोग का अनुचिन्तन करें । अनुचिन्तन करते—करते अनुभव के स्तर पर आएं । स्थान से अपनी भिन्‍नता का अनुभव करें ।

जिस कमरे में बैठे हैं, यह मात्र संयोग है । जो संयोग होता है उसका निश्‍चित वियोग होता है । कमरे के साथ संयोग का अनुचिन्तन करें । अनुचिन्तन करते—करते अनुभव के स्तर पर आएं । कमरे से अपनी भिन्‍नता का अनुभव करें ।

जिस आसन पर बैठे हैं, यह मात्र संयोग है । जो संयोग होता है, उसका निश्‍चित वियोग होता है । आसन के साथ संयोग का अनुचिन्तन करें । अनुचिन्तन करते—करते अनुभव के स्तर पर आएं । आसन से अपनी भिन्‍नता अनुभव करें ।

शरीर पर जो वस्त्र पहने हुए हैं, यह मात्र संयोग है । जो संयोग होता है, उसका निश्‍चित वियोग होता है । वस्त्र के साथ संयोग का अनुचिन्तन करें । अनुचिन्तन करते—करते अनुभव के स्तर पर आएं । वस्त्र से अपनी भिन्‍नता का अनुभव करें ।

यह शरीर मात्र एक संयोग है । जो संयोग होता है, उसका निश्‍चित वियोग होता है । शरीर के साथ संयोग का अनुचिन्तन करें । अनुचिन्तन करते—करते अनुभव के स्तर पर आएं । शरीर से अपनी भिन्‍नता का अनुभव करें ।

शरीर में होने वाले ये रोग, मात्र एक संयोग है । जो संयोग होता है, उसका निश्‍चित वियोग होता है । रोग के साथ संयोग का अनुचिन्तन करें । अनुचिन्तन करते—करते अनुभव के स्तर पर आएं । रोग से अपनी भिन्‍नता का अनुभव करें ।

ये मन की उलझनें, मानसिक समस्याएं मात्र एक संयोग है । जो संयोग होता है, उसका निश्‍चित वियोग होता है । मानसिक समस्याओं के साथ संयोग का अनुचिन्तन करें । अनुचिन्तन करते—करते अनुभव के स्तर पर आएं । समस्याओं से अपनी भिन्‍नता का अनुभव करें ।

ये उपाधियां, आवेग—आवेश, क्रोध, अहंकार जितनी उपाधियां हैं, मात्र संयोग है । जो संयोग होता है, उसका निश्‍चित वियोग होगा है । उपाधियों के साथ संयोग का अनुचिन्तन करें । अनुचिन्तन करते—करते अनुभव के स्तर पर आएं । उपाधियों से अपनी भिन्‍नता का अनुभव करें ।

ये स्वभाव, आदतें (लड़ने की आदत, नशे की आदत, अलग-अलग प्रकार की आदतें) मात्र संयोग है । जो संयोग होता है उसका निश्‍चित वियोग होता है । स्वभाव, आदतों के साथ संयोग का अनुचिन्तन करें । अनुचिन्तन करते—करते अनुभव के स्तर पर आएं । स्वभाव, आदतों से अपनी भिन्‍नता का अनुभव करें । कोई भी आदत शाश्‍वत नहीं है । वह बदली जा सकती है ।

यह सूक्ष्म शरीर (कर्म—शरीर) जहां से उपाधियां आती हैं, मात्र संयोग है । जो संयोग होता है, उसका निश्‍चित वियोग होता है । सूक्ष्म शरीर के साथ संयोग का अनुचिन्तन करें । अनुचिन्तन करते—करते सूक्ष्म शरीर के स्तर पर आएं । कर्म शरीर से अपनी भिन्‍नता का अनुभव करें ।

मेरा चैतन्य स्थान, आसन, वस्त्र, शरीर, रोग, मानसिक उलझनें, उपाधियां, आदतें, सूक्ष्म शरीर इन सबसे भिन्‍न है । इन सबके साथ संयोग से जुड़ा हुआ है । जो संयोग होता है उसका निश्‍चित वियोग होता है, इनके

साथ संयोग का अनुचिन्तन करें । अनुचिन्तन करते—करते अनुभव के स्तर पर आएं । चेतना से इन सबकी भिन्‍नता का अनुभव करें ।

जिस क्रम से चले थे, अब फिर सब संयोगों को पार कर उसी क्रम में लौटें । सूक्ष्म शरीर, आदतें, उपाधियां, मानसिक उलझनें, रोग, शरीर, कपड़े, आसन, स्थान प्रत्येक का अनुचिन्तन करते—करते पुनः स्थान पर आएं ।

इमं सरीरं अणिच्चं, इमं सरीरं अणिच्चं, इमं सरीरं अणिच्चं—यह शरीर अनित्य है । प्रति क्षण अनेक कोशिकाएं मिट रही हैं, नई बन रही हैं । कभी आशा, कभी निराशा, नाना प्रकार के परिवर्तन हो रहे हैं ।

इमे रोगा अणिच्चं—ये रोग अनित्य हैं, स्थायी नहीं हैं, चले जाने वाले हैं ।

इमे मणोरोगा अणिच्चा—ये मानसिक उलझनें मिट जाने वाली हैं ।

इमे भावा अणिच्चा—ये स्वभाव चले जाने वाले हैं ।

ये सारे सम्बन्ध संयोग हैं, इनको देखते चले जाएं, पर संयोग मूर्च्छा न बन जाए । तब बाद में जो कुछ बचेगा, वह मैं हूं । चिन्तन करें । अनुचिन्तन करें । गहराई से चिन्तन करें.... ।

आत्म—विकास के पांच सूत्र

1.अपनी पूर्णता और स्वतन्त्रता का अनुभव—जो परमात्मा है वह मैं हूं और जो मैं हूँ वही परमात्मा है ।

2.जड़—चेतन भिन्‍नता—मैं भिन्‍न हूं, शरीर भिन्‍न है, मैं चेतन हूँ, वह अचेतन है ।

3.आनन्द का अनुभव—आनन्द बाहर से नहीं आता, मैं आनन्द का अक्षय कोष हूं । पदार्थ के संयोग से जो सुख आता है वह मौलिक सुख नहीं है ।

4.पुद्‍गल विरक्ति—पुद्‍गल से पुद्‍गल को तृप्ति मिलती है, मुझे नहीं ।

5.ध्येय और ध्याता का एकत्व—ध्येय परमात्मा पद है, वह मुझ से भिन्‍न नहीं है । ध्यान से एक दिन ध्येय का साकार हो जाएगा ।