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स्वाध्याय साधना

चौबीसी

—श्रीमज्जयाचार्य

दूहा

1.ॐ नमः अरिहंत अतनु, आचारज उवझाय ।

मुनी पंच परमेष्‍ठी नुं, ऊँकार रै मांय ।।

2.बलि प्रणमूं गुणवंत गुरु, भिक्खू भरत मझार ।

दान दयादिक छाण नै, लीधो मारग सार ।।

3.भारीमाल पट भलकता, तीजै पट ऋषिराय ।

प्रणमूं मन वच काय करी, पांचू अंग नमाय ।।

4.सिध साधु प्रणमी करि, ऋषभादिक चौबीस ।

स्तवना करूं प्रमोद धरि, जय—जश कर जगदीश ।

5.मल्लि नेम ए दोय जिन, पाणिग्रहण न कीध ।

शेष बावीस जिनेसरू, रमण छांड व्रत लीध ।।

6.वासुपूज्य मल्लि नेम जिन, पार्श्‍व अनै वर्धमान ।

कुमर पदे अरु प्रथम वय, धार्यो चरण—निधान ।।

7.छत्रपती उगणीस जिन, व्रत तीजी वय सार ।

उत्कृष्‍ट आयुजिह समय, तमु त्रिण भाग विचार ।।

8.वीर समय उत्कृष्‍ट स्थिति, वर्ष सवा सय सोय ।

भाग तीन कीजै तसु, ए तीनूं वय जोय ।।

9.इम सगलै उत्कृष्‍ट स्थिति, त्रिणभागे वय तीन ।

अंतिम वय उगणीस जिन, धुर वय पंच सुचीन ।।

10.श्‍वेतवरण चंद सुविधि जिन, पद्‍म वासुपूज्य लाल ।

मुनि सुव्रत रिठनेम प्रभु, कृष्ण वरण सुविशाल ।।

11.मल्लिनाथ फुन पार्श्‍व प्रभु, नील वरण वर अंग ।

षोडस शेष जिनेश तनु, सोवन वरण सुचंग ।

12.श्रेयांस मल्ली सुव्रत जिन, नेम पार्श्‍व जगदीश ।

प्रथम प्रहर दीक्षा ग्रही, पाछिल पहर उगणीस ।।

13.सुमति जीम दीक्षा ग्रही, अठम—भक्त मल्लि पास ।

छट्ठ—भक्त जिन वीस वर, वासुपूज्य उपवास ।।

14.ऋषभ अष्‍टापद शिव गमन, वीर पावापुरी दीस ।

नेम गिरनारे, वासु चंपा, शिखर—समेत सुबीस ।।

15.ऋषभ संथारे शिव—गमन, चउदस—भक्त उदार ।

चरम छठ्ठ अणसण पवर, बावीस मास—संथार ।।

16.ऋषभ वीर अरु नेम जिन, पल्यंकासन पेख ।

शेष इक्कीस जिनेसरू, काउसग—मुद्रा देख ।

17.जिन चौबीस तणां सुगुण, रचियै वचन रसाल ।

ध्यान सुधावर सार रस, ‘जय—जश’ करण विशाल ।।

आदिनाथ स्तवन

प्रणमूं प्रथम जिनन्द नैं जय जय जिन चंदा

1.वन्दू बेकर जोड़ नैं, जुग आदि जिनिन्दा ।

कर्म—रिपु—गज ऊपरै, मृगराज मुनिन्दा ।।

2.अनुकूल प्रतिकूल सम सही, तप विविध तपंदा ।

चेतन तन भिन लेखवी, ध्यान शुकल ध्यावंदा ।।

3.पुद्‍गल—सुख अरि पेखिया, दुख—हेतु भयाला ।

विरक्त चित विघट्यो इसो, जाण्या प्रत्यक्ष जाला ।

4.संवेग—सरवर झूलता, उपशम—रस लीना ।

निंदा—स्तुति सुख—दु:ख में, समभाव सुचीना ।।

5.वासी चंदन समपणें, थिर—चित्त जिन ध्याया ।

इम तन—सार तजी करी, प्रभु केवल पाया ।

6.हूं बलिहारी तांहरी वाह ! वाह ! ! जिनराया ।

उवा दिशा किण दिन आवसी, मुझ मन ऊम्हाया ।

7.उगणीसै सुदि भाद्रवे, दशमी दीतवारं ।

ऋषभदेव रटवै करी, हुओ हरष अपारं ।।

लय : ऐसे गुरु किम पाइयै

अजितप्रभु स्तवन

अहो प्रभु ! तुम ही दायक शिव-पंथ ना ।

1.अहो प्रभु ! अजित जिनेश्‍वर आपरो, ध्याऊं ध्यान हमेश हो ।

अहो प्रभु ! अशरण शरण तूं ही सही, मेटण सकल कलेश हो ।।

2.अहो प्रभु ! उपशम रस भरि आपरी, वाणी सरस विशाल हो ।

अहो प्रभु ! मुगति-निसरणी मनोहरू, सुण्यां मिटै भ्रम जाल हो ।।

3.अहो प्रभु ! उभय बंधण आप आखिया, राग-द्वेष विकराल हो ।

अहो प्रभु ! हेतु ए नरक निगोद नां, राच्या मूरख बाल हो ।।

4.अहो प्रभु ! रमणी राखसणी कही, विषबेली मोहजाल हो ।

अहो प्रभु ! काम-भोग किम्पाक-सा, दाख्या दीन-दयाल हो ।।

5.अहो प्रभु ! विविध उपदेश देई करी, ते तार्या नरनार हो ।

अहो प्रभु ! भव-सिन्धु-पोत तू ही सही, तू ही जगत-आधार हो ।।

6.अहो प्रभु ! शरण आयो तुझ साहिबा ! बस रह्या हीया मांय हो ।

अहो प्रभु ! आगम—वयण अङ्गीकरी, रह्यो ध्यान तुझ ध्याय हो ।।

7.अहो प्रभु ! संवत उगणीसै भाद्रवै, दसमी आदितवार हो ।

अहो प्रभु ! आप तणा गुण गाविया, वर्त्या जै जै कार हो ।।

लय : अहो प्रिय तुम बाट पाड़ी

संभव प्रभु स्तवन

संभव साहिब समरियै ।

1.संभव साहिब समरियै, ध्यायो है जिन निर्मल ध्यान कै ।

एक पुद्‍गल दृष्‍टि थाप नै, कीधो है मन मेर समान कै ।।

2.तन—चंचलता मेट नै, हुआ है जग थी उदासीन कै ।

धर्म शुकल थिर—चित्त धरै, उपशम—रस में होय रह्या लीन कै ।।

3.सुख इन्द्रादिक नां सहु, जाण्या है प्रभु अनित्य असार कै ।

भोग भयंकर कटुक—फल, देख्या है दुर्गति दातार कै ।।

4.सुधा संवेग—रसे भर्या, पेख्या है पुद्‍गल मोह पास कै ।

अरुचि अनादर आण नैं, आतम ध्याने करता विलास कै ।।

5.संग छांड मन वश करी, इन्द्रिय—दमन करी दुर्दन्त कै ।

विविध तपे करी स्वामजी, घाति—करम नौं कीधो अंत कै ।।

6.हूँ तुझ शरणे आवियो, कर्म—विदारण तू प्रभु ! वीर कै ।

तें तन मन वच बस किया, दु:कर करणि करण महाधीर कै ।।

7.संवत उगणीसै भाद्रवै, सुदि इग्यारस आण विनोद कै ।

संभव साहिब समरिया, पाम्यो है मन अधिक प्रमोद कै ।।

लय : हूँ बलिहारी हो जादवां

अभिनन्दन प्रभु स्तवन

अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।

1.तीर्थंकर हो चोथा जग भाण,

छांड गृहवास करी मति निरमली ।

विषय—विटंबण हो तजिया विष फल जाण ।।

2.दु:कर करणी हो कीधी आप दयाल,

ध्यान सुधारस सम दम मन गली ।

संग त्याग्यो हो जाणी माया—जाल ।।

3.वीर रसे करी हो कीधी तपस्या विशाल,

अनित्य अशरण—भावन अशुभ निरदली ।

जग झूठो हो जाण्यो आप कृपाल ।।

4.आतम मिंत्री हो सुखदाता सम परिणाम,

एहिज अमित्र अशुभ भावे कलकली ।

एहवी भावन हो भाई जिन गुण—धाम ।।

5.लीन संवेगे हो ध्यायो शुकल ध्यान,

क्षायक—श्रेणि चढी हुवा केवली ।

प्रभु पाम्या हो निरावरण सुज्ञान ।।

6.उपशम—रस नीं हो बागरी प्रभु बाण,

तन मन प्रेम पाया जन सांभली ।

तुम वच धारी हो पाम्या परम कल्याण ।।

7.जिन अभिनंदण हो गाया तन मन प्यार,

संवत उगणीसै भाद्रवै अघ दली ।

सुदि इग्यारस हो हुवो हर्ष अपार ।।

लय : सती कलूजी हो थाया संजम नै त्यार

सुमति प्रभु स्तवन

सुमति जिनेश्‍वर साहिब शोभता ।

1.सुमति जिनेश्‍वर साहिब शोभता, सुमति करण संसार ।

सुमति जप्यां थी सुमति बधै घणी, सुमति सुमति—दातार ।।

2.ध्यान सुधारस निरमल ध्याय नैं, पाम्या केवल नाण ।

बाण सरस वर जन बहु तारिया, तिमिर हरण जगभाण ।।

3.फटिक—सिंहासण जिनजी फाबता, तरु अशोक उदार ।

छत्र चमर भामंडल भलकतो, सुर—दुन्दुभि झिणकार ।

4.पुष्प—वृष्‍टि दिव्य—ध्वनि दीपती, साहिब जग सिणगार ।

अनंत ज्ञान दर्शन बल चरण ही, द्वादश गुण श्रीकार ।।

5.वाण अमी सम उपशम—रस भरी, दुर्गति—मूल कषाय ।

शिव—सुख नां अरि शब्दादिक कह्या, जग—तारक जिनराय ।।

6.अंतरयामी शरणै आपरै, हूँ आयो अवधार ।

जाप तुमारो निश—दिन संमरू, शरणागत सुखकार ।

7.संवत उगणीसै सुदि पख भाद्रवै, बारस मंगलवार ।

सुमति जिनेश्‍वर तन मन स्यूं रट्या, आनंद उपनो अपार ।।

लय : मूरख जीवड़ा रे गाफल मत रहे

पद्‍म प्रभु स्तवन

पदम प्रभू नित समरियै ।

1.निर्लेप पदम जिसा प्रभू, प्रभु पद्‍म पिछाण ।

संयम लीधो तिण समै, पाया चोथो नाण ।।

2.ध्यान शुकल प्रभु ध्याय नैं, पाया केवल सोय ।

दीनदयाल तणी दशा, कैणी नावै कोय ।।

3.सम दम उपशम रस भरी, प्रभु ! आपरी वाण ।

त्रिभुवन तिलक तूं ही सही, तूं ही जनक समान ।।

4.तू प्रभु कल्पतरू जिसो, तूं चिंतामणि जोय ।

समरण करतां आपरो, मन—वंछित होय ।।

5.सुखदायक सहु जग भणी, तूं ही दीनदयाल ।

शरण आयो तुझ साहिबा ! तूं ही परम कृपाल ।

6.गुण गातां मन गह—गहै, सुख संपति जाण ।

विघन मिटै समरण कियां, पामैं परम कल्याण ।

7.उगणीसै नैं भाद्रवै, सुदि बारस देख ।

पद्‍म प्रभू रट्या लाडनूं, हुओ हरष विशेष ।

लय : कुशलपुरी में प्रभु जनमिया

सुपार्श्‍वप्रभु स्तवन

भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।

1.सुपास सातमां जिणंद ए, ज्यांनै सेवै सुर नर वृंद ए ।

सेवक पूरण आश ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।

2.जन प्रतिबोधण काम ए, प्रभु बागरे वाण अमाम ए ।

संसार स्यूं हुवै उदास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।

3.पामैं कामभोग थी उद्वेग ए, बलि उपजै परम संवेग ए ।

एहवा तुम वच सरस विलास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।

4.घणी मीठी चक्री नीं खीर ए, बलि खीर—समुद्र नो नीर ए ।

एहथी तुम वच अधिक विमास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।

5.सांभल नै जनव्रन्द ए, रोम—रोम में पामै आनंद ए ।

ज्यांरी मिटै नरकादिक त्रास ए, भजिये नित्य स्वामी सुपास ए ।।

6.तू प्रभू ! दीन—दयाल ए, तूं ही अशरण—शरण निहाल ए ।

हूं छूं तुम्हारो दास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।

7.संवत उगणीसै सोय ए, भाद्रवा सुदि तेरस जोय ए ।

पहुंची मन नीं आश ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।

लय : कृपण दीन अनाथ ए

चन्द्रप्रभु स्तवन

प्रभु ! चन्द्र जिनेश्‍वर ! चन्द जिसा ।

1.हो प्रभु ! चंद जिनेश्‍वर चंद जिसा, वाणी शीतल चंद सीन्हाल हो ।

प्रभु ! उपशम रस जन सांभल्यां, मिटै करम भरम मोह जाल हो ।।

2.हो प्रभु ! सूरत मुद्रा सोहनी, वारु रूप अनूप विशाल हो ।

प्रभु ! इंद्र शची जिन निरखता, ते तो तृप्त न होवै निहाल हो ।।

3.अहो ! वीतराग प्रभु तूं सही, तुम ध्यान ध्यावै चित रोक हो ।

प्रभु ! तुम तुल्य ते हुवै ध्यान सूं, मन पायां परम संतोष हो ।।

4.हो प्रभु ! लीनपणे तुम ध्यावियां, पामै इंद्रादिक नीं ऋद्धि हो ।

बलि विविध भोग सुख संपदा, लहै आमोसही आदि लब्धि हो ।।

5.हो प्रभु ! नरेंद्र पद पामै सही, चरण सहित ध्यान तन मन्‍न हो ।

प्रभु ! अहमिंद्र पद पामै बलि, कियां निश्‍चल थारो भजन्‍न हो ।।

6.हो प्रभु ! शरण आयो तुझ साहिबा, तुम ध्यान धरूं दिन—रैन हो ।

तुझ मिलवा मुझ मन उमह्यो, तुम समरण स्यूं सुख चैन हो ।।

7.हो प्रभु ! संवत उगणीसै नैं भाद्रवै, सुदि तेरस नैं बुधवार हो ।

प्रभु ! चंद जिनेश्‍वर समरिया, हुओ आनन्द हरष अपार हो ।।

लय : शिवपुर नगर सुहामणो

सुविधि प्रभु स्तवन

सुविधि भजियै शिरनामी हो ।

1.सुविधि करि भजियै सदा, सुविधि जिनेश्‍वर स्वामी हो ।

पुष्पदंत नाम दूसरो, प्रभु अंतरयामी हो ।।

2.श्‍वेत वरण प्रभु शोभता, वारू वाण अमामी हो ।

उपशम रस गुण आगली, मेटण भव भव खामी हो ।।

3.समवसरण बिच फाबता, त्रिभुवन—तिलक तमामी हो ।

इंद्र थकी ओपै घणां, शिव—दायक स्वामी हो ।।

4.सुरेंद्र नरेन्द्र चन्द्र ते, इंद्राणी अभिरामी हो ।

निरख—निरख धापै नहीं, एहवो रूप अमामी हो ।।

5.मधुकर मरंद तणी परै, सुर नर करत सलामी हो ।

तो पिण राग व्यापै नहीं, जीत्यो मोह हरामी हो ।।

6.जे जोधा जग में घणां, सिंह साथे संग्रामी हो ।

तैं मन इन्द्री वश करी, जोड़ी केवल पामी हो ।।

7.उगणीसै पूनम भाद्रवी, प्रणमूं शिरनामी हो ।

मन—चिंतित वस्तु मिलै, रटियां जिन स्वामी हो ।।

लय : सोही तेरापंथ पावै हो

शीतल प्रभु स्तवन

सूरत थारी मन बसै साहिब जी !

1.शीतल जिन शिवदायका साहिब जी !

शीतल चन्द समान हो, निसनेही ।

शीतल अमृत सारिषा साहिब जी !

तप्त मिटै तुम ध्यान हो, निसनेही ।।

2.वंदै निंदै तो भणी साहिब जी !

राग द्वेष नहीं ताम हो, निसनेही ।

मोह—दावानल मेटियो साहिब जी !

गुण—निप्पन तुम नाम हो, निसनेही ।।

3.नृत्य करै तुझ आगलै साहिब जी !

इंद्राणी सुर—नार हो, निसनेही ।

राग भाव नहिं ऊपजै साहिब जी !

अंतर तप्त निवार हो, निसनेही ।।

4.क्रोध मान माया लोभ ए साहिब जी !

अग्‍नि सूं अधिकी आग हो, निसनेही ।

शुकल ध्यान रूप जल करी साहिब जी !

थया शीतलीभूत महाभाग हो, निसनेही ।।

5.इन्द्रिय नोइन्द्रिय आकरा साहिब जी !

दुर्जय नैं दुर्दान्त हो, निसनेही ।

तैं जीत्या मन थिर करी साहिब जी !

धर उपशम चित शांत हो, निसनेही ।।

6.अंतरजामी ! आपरो साहिब जी !

ध्यान धरूं दिन—रैन हो, निसनेही ।

उवाही दशा कद आवसी साहिब जी !

होसी उत्कृष्‍टो चैन हो, निसनेही ।।

7.उगणीसै पूनम भाद्रवी साहिब जी !

शीतल मिलवा काज हो, निसनेही ।

शीतल जिनजी नैं समरिया साहिब जी !

हिय शीतल हुवो आज हो, निसनेही ।।

लय : हूं देवा आई ओलभड़ा सासूजी

श्रेयांस प्रभु स्तवन

श्रेयांस जिनेश्‍वरू ! प्रणमूं नित बेकर जोड़ रे ।

1.मोक्ष मार्ग श्रेय शोभता, धार्या स्वाम श्रेयांस उदार रे ।

जे जे श्रेय वस्तु संसार में, ते ते आप करी अंगीकार रे ।

ते ते आप करी अंगीकार, श्रेयांस जिनेश्‍वरू ?.... ।।

2.समिति गुप्ति दुर्धर घणां, धर्म शुकल ध्यान उदार रे ।

ए श्रेय वस्तु शिवदायिनी, आप आदरी हरष अपार रे ।।

3.तन चंचलता मेट नैं, पद्‍मासन आप विराज रे ।

उत्कृष्‍ट ध्यान तणो कियो, आलंबन श्री जिनराज रे ।।

4.इंद्रिय विषय विकार थी, नरकादिक रुलियो जीव रे ।

किंपाक फल नीं ओपमा, रहिये दूर थी दूर सदीव रे ।।

5.संजम तप जप शील ए, शिव—साधन महा सुखकार रे ।

अनित्य अशरण अनंत ए, ध्यायो निर्मल ध्यान उदार रे ।।

6.त्रीयादिक नां संग ते, आलंबन दुख दातार रे ।

अशुद्ध आलंबन छांड नैं, धार्यो ध्यान आलंबन सार रे ।।

7.शरण आयो तुझ साहिबा, करूं बार—बार नमस्कार रे ।

उगणीसै पूनम भाद्रवी, मुझ वरत्या जै जै कार रे ।।

लय : पुत्र वसुदेव रा गजसुखमाल

वासुपूज्य प्रभु स्तवन

प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी !

1.द्वादशमा जिनवर भजियै, राग द्वेष मच्छर माया तजिये ।

प्रभु लाल वरण तन छिब जाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।

2.वनिता जाणी वेतरणी, शिव—सुंदर वरवा हूंस घणी ।

काम—भोग तज्या किम्पाकाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।

3.अंजन—मंजन स्यूं अलगा, बलि पुष्प विलेपन नहिं बिलगा ।

कर्म काट्या ध्यान—मुद्रा ठाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।

4.इन्द्र थकी अधिका ओपै, करुणागर कदेय नहीं कोपै ।

वर साकर दूध जिसी वाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।

5.स्त्री स्‍नेह पासा दुर्दन्ता, कह्या नरक निगोद तणां पंथा ।

इह भव पर भव दुखदाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।

6.गज कुंभ दलै मृगराज—हणी, पिण दोहिली निज आतम दमणी ।

इम सुण बहु जीव चेत्या जाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।

7.भाद्रवी पूनम उगणीसो, कर जोड़ नमूं वासुपूज्य ईसो ।

प्रभु गातां रोम—राय हुलसाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।

लय : नित जाप जपो श्री नवकारं

विमल प्रभु स्तवन

साहिब ! शरण तिहारै हो ।

शरण तिहारै, शरण तिहारै, शरण तिहारै हो ।

विमल प्रभु ! सेवक नीं अरदास, आयो शरण तिहारै हो ।

1.विमल करण प्रभु विमलनाथजी, विमल आप वर रीत ।

विमल ध्यान धरतां हुवै निर्मल, तन मन लागी प्रीत ।

2.विमल ध्यान प्रभु आप ध्याया, तिण यूं हुवा विमल जगदीश ।

विमल ध्यान बलि जे कोई ध्यासी, होसी विमल सरीस ।।

3.विमल गृहवासे द्रव्य जिनेन्द्र था, दीख्या लीधां भावे साथ ।

केवल उपनां भावे जिनेश्‍वर, भावे विमल आराध ।

4.नाम स्थापना द्रव्य विमल थी, कारज न सरै कोय । |

भाव विमल थी कारज सुधरै, भाव जप्यां शिव होय ।।

5.गुण गिरवो गंभीर धीर तूं, तूं मेटण जम—त्रास ।

मैं तुम वयण आगम शिर धार्या, तूं मुझ पूरण आश ।

6.तूं ही कृपाल दयाल साहिब ! शिव—दायक तूं जगनाथ ।

निश्‍चल ध्यान धरै तुझ ओलख, ते मिलै तुझ संघात ।।

7.अंतरजामी आप उजागर, मैं तुम शरण लीध ।

संवत उगणीसै भाद्रवी पूनम, वंछित कारज सीध ।।

लय : कांय न मांगा, कांय न मांगों, कांय न मांगा हो

अनन्त प्रभु स्तवन

पायो पद जिनराज नौं सुध ध्यान निर्मल ध्याय भला जी कांईं ।।

1.अनंत नाम—जिन चवदमां रे, द्रव्य चौथे गुणठाण ।

भावे जिन हुवै तेरमे रे, इतलै द्रव्य जिन जाण ।।

2.जिन चक्री सुर जुगलिया रे, वासुदेव बलदेव ।

पंचम गुण पावै नहीं रे, ए रीत अनादि स्वमेव ।।

3.संजम लीधौ तिण समैं रे, आया सप्तम गुणठाण ।

अंतरमुहूर्त तिहां रही रे, छठे बहुस्थिति जाण ।।

4.आठमा थी दोय श्रेणि छै रे, उपशम क्षपक पिछाण ।

उपशम जाय इग्यारमे रे, मोह दबावतो जाण ।।

5.श्रेणि उपशम जिन नां लहै रे, खपक श्रेणि धर खंत ।

चारित्र मोह खपावतां रे, चढ़िया ध्यान अत्यंत ।।

6.नवमे आदि संजल चिहुं रे, अन्त समे इक लोभ ।

दसमे सूक्षम मात्र ते रे, सागार उपयोग सोभ ।।

7.एकादशम उलंघ नै रे, बारमे मोह खपाय ।

त्रिकर्म इक सम तोड़तां रे, तेरम केवल पाय ।।

8.तीर्थ थाप जोग रुंध नै रे, चवदमां थी शिव पाय ।

उगणीसै पूनम भाद्रवी रे, अनन्त रट्या हरषाय ।।

लय : पायो जुगराज पद मुनि

धर्म प्रभु स्तवन

अहो प्रभु परम देव प्यारा ।

1.धर्म जिन धर्म तणा धोरी, त्रटक मोह—पाश नाख्या तोड़ी ।

चरण—धर्म आतम सूं जोड़ी, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।

2.शुकल ध्यानामृत रस लीना, संवेग रसे करि जिन भीना ।

प्याला प्रभु उपशम नां पीना, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।

3.जाण्या शब्दादिक मोहजाला, रमणि—सुख किंपाक सम काला ।

हेतु नरकादिक दुख आला, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।

4.पुद्‍गल सुख अरि जाण्या स्वामी, ध्याने थिरचित आतम—धामी ।

जोड़ी युग केवल नीं पामी, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।

5.थाप्या प्रभु च्यार तीरथ तायो, आख्यो धर्म जिन आज्ञा मांह्यो ।

आज्ञा बारै अधरम दुखदायो, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।

6.विरत धर्म धर्म—जिनंद ख्याता, अव्रत कही अधरम दुख दाता ।

सावद निरवद जू जूआ कह्या खाता, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।

7.बहुजन तार मुक्ति पाया, उगणीसै आसू धुर दिन आया ।

धर्म जिन रटवै सुख पाया, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।

लय : भीखू पट भारीमाल भलकै

शान्ति प्रभु स्तवन

बलिहारी हो शांति जिणंद की ।

1. शांति करण प्रभु शांतिनाथजी, शिवदायक सुखकंद की ।

बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।

2. अमृत—वाण सुधा—सी अनुपम, मेटण मिथ्या मंद की ।

बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।

3. काम भोग राग द्वेष कटुक फल, विष—बेली मोह—धंध की ।

बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।

4. राखसणी रमणी वैतरणी, पुतली अशुचि दुर्गन्ध की ।

बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।

5. विविध उपदेश देई जन तार्या, हूं वारि जाऊं विश्‍वनंद की ।

बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।

6. परम दयाल गोवाल कृपानिधि, तुम जप माला आनंद की ।

बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।

7. संवत उगणीसै आसू बिद एकम, शांति—लता सुखकंद की ।

बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।

लय : हूं बलिहारी भीखणजी साध री

कुन्थु प्रभु स्तवन

प्रभु को समरण कर नीको रे ।

1.कुन्थु जिनेश्‍वर करुणा—सागर, त्रिभुवन सिर टीको रे ।

प्रभु को समरण कर नीको रे ।।

2.अद्भुत रूप अनूप कुन्थु जिन, दर्शन जग—पी को रे ।

प्रभु को समरण कर नीको रे ।।

3.वाण सुधा सम उपशम रस नीं, वाल्हौ जगती को रे ।

प्रभु को समरण कर नीको रे ।।

4.अनुकंपा दोय श्री जिन दाखी, मर्म समदृष्‍टी को रे ।

प्रभु को समरण कर नीको रे ।।

5.असंजती रो जीवणो बांछै, सावद्य तहतीको रे ।

प्रभु को समरण कर नीको रे ।।

6.निरवद्य करुणा करि जन तार्या, धर्म ए जिनजी को रे ।

प्रभु को समरण कर नीको रे ।।

7.संवत उगणीसै आसू बिद एकम, शरणो साहिबजी को रे ।

प्रभु को समरण कर नीको रे ।।

लय : भिक्षु म्हारै प्रगट्या जी भरत खेतर में

अर प्रभु स्तवन

मोनैं प्यारा लागै छै जी अर जिनराज ।

मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।

1.अर जिन कर्म—अरी नां हंता, जगत उधारण ज्हाज ।

मोनें वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।

2.परीषह उपसर्ग रूप अरी हण, पाया केवल पाज ।

मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।

3. नैण न धापै निरखतांजी, इन्द्राणी सुरराज ।

मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।

4.वारु रे जिनेश्‍वर रूप अनूपम, तू सुगणा—सिरताज ।

मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।

5.वाण विशाल दयाल—पुरुष नीं, भूख तृषा जाए भाज ।

मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।

6.शरणै आयो स्वाम रै जी, अविचल सुख नै काज ।

मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।

7.उगणीसै आसू बिद एकम, आणन्द उपनौं आज ।

मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।

लय : देखो सहियां ! बनड़ो ए नेमकुमार

मल्ली प्रभु स्तवन

मल्लि जिनेश्‍वर नाम समर तरण शरण आयो ।

1.नील वर्ण मल्लि जिनेश्‍वर, ध्यान—निर्मल ध्यायो ।

अल्प काल मांहि प्रभू, परम—ज्ञान पायो ।।

2.कल्प पुष्पमाल जेम, सुगंध तन सुहायो ।

सुर—वधू वर नयन—भ्रमर, अधिक ही लिपटायो ।।

3.स्व पर चक्र विविध विघन, मिटत तो पसायो ।

सिंघनाद थकी गजेन्द्र, जेम दूर जायो ।।

4.वाण विमल निमल—सुधा—रस संवेग छायो ।

नर सुरासुर तिरि समाज, सुणत ही हरषायो ।

5.जगदयाल तू हि कृपाल, जनक ज्यूं सुखदायो ।

वच्छल नाथ स्वाम साहिब, सुजश तिलक पायो ।।

6.जपत जाप खपत पाप, तपत ही मिटायो ।

मल्लिदेव त्रिविध सेव, जग अछेरो पायो ।।

7.उगणीसै आसोज कृष्ण, तीज सुदिन आयो ।

कुम्भ—नन्द कर आनन्द, हरष थी मैं गायो ।।

लय : जै गणेश, जै गणेश, जै गणेश....

मुनिसुव्रत प्रभु स्तवन

प्रभूजी ! आप प्रबल बड़ भागी ।

त्रिभुवन दीपक सागी रा ।।

1.सुमित्रनन्दन श्री मुनिसुव्रत, जगतनाथ जिन जाणी ।

चारित्र ले केवल उपजायो, उपशम रस नीं वाणी रा ।।

2.चौतीस अतिशय पैंतीस वाणी, निरखत सुर इन्द्राणी ।

संवेग रस नीं वाणी सांभल, हरष स्यूं आंख्यां भराणी रा ।।

3.शब्द-रूप-रस-गंध-परस, प्रतिकूल न हुवै तुम आगै ।

पंच दरशन थांस्यूं पग नहिं मांडै, (तिम) अशुभ शब्दादिक भागै रा ।।

4.सुर कृत जल स्थल पुष्प पुंजवर, ते छांडी चित दीनो ।

तुझ निश्‍वास-सुगंध मुख-परिमल, मन-भ्रमर महा लीनो रा ।।

5.पंचेन्द्री सुर नर तिरि तुम स्यूं, किम होवै दुखदायो ।

एकेन्द्री अनिल तजै प्रतिकूलपणुं, बाजै गमतो वायो रा ।।

6.रागद्वेष दुर्दत तै दमिया, जीत्या विषय विकारो ।

दीनदयाल आयो तुम सरणै, तूं गति-मति-दातारो रा ।।

7.उगणीसै आसोज तीज तिथि, श्री मुनिसुव्रत गाया ।

लाडनूं शहर मांहि रूड़ि रीते, आणंद अधिको पाया रा ।।

लय : भरतजी भूप भया छो

नमि प्रभु स्तवन

प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।

मुझ प्यारा प्राण आधारा ।।

1.नमिनाथ अनाथां रा नाथो रे, नित्य नमण करू जोड़ी हाथो रे ।

कर्म काटण वीर विख्यातो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।

2.प्रभु ध्यान सुधारस ध्याया रे, पद केवल जोड़ी पाया रे ।

गुण उत्तम-उत्तम आया, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।

3.प्रभु बागरी वाण विशालो रे, खीर-समुद्र थी अधिक रसालो रे ।

जगतारक दीनदयालो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।

4.थाप्या तीरथ च्यार जिनीन्दो रे, मिथ्या-तम हरण मुनीन्दो रे ।

ज्यांनैं सेवत सुर—नर वृन्दो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।

5.सुर अनुत्तर विमाण नां सेवै रे, प्रश्‍न पूछयां उत्तर जिन देवै रे ।

अवधिज्ञान करी जाण लेवै, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।

6.तिहां बैठा ते तुम ध्यान ध्यावै रे, तुम योग—मुद्रा चित चावै रे ।

ते पिण आपरी भावना भावै, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।

7.उगणीसै आसोज उदारो रे, कृष्ण चौथ गाया गुणधारो रे ।

हुवो आणंद हर्ष अपारो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।

लय : परमगुरु पूज्यजी मुझ प्यारा रे

अरिष्‍टनेमि प्रभु स्तवन

प्रभु नेम स्वामी ! तू जगनाथ अंतरयामी ।

रिठनेम स्वामी ! तू जगनाथ अंतरयामी ।।

1.तूं तोरण स्यू फिर्‌यो जिन—स्वाम, अद्भुत बात करी तें अमाम ।

प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।

2.राजिमती छांडी जिनराय, शिव—सुन्दर स्यूं प्रीत लगाय ।

प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।

3.केवल पाया ध्यान वर ध्याय, इन्द्र शची निरखै हरषाय ।

प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।

4.नेरिया पिण पामैं मन मोद, तुझ कल्याण सुर करत विनोद ।

प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।

5.राग—रहित शिव सुख स्यूं प्रीत, कर्म हणै बलि द्वेष रहीत ।

प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।

6.इचरजकारी थारो चरित्त, हूं प्रणमूं कर जोड़ी नित्त ।

प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।

7.उगणीसै बिद चौथ कुमार, नेम जप्यां पायो सुखसार ।

प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।

लय : व्रजवासी लाला कान

पार्श्‍वनाथ प्रभु स्तवन

पारस देव ! तुम्हारा दर्शन भाग भला सोई पावै हो ।

भाग भला सोई पावै, हूं वारि जाऊं,

जीव मगन हो ज्यावै हो पारस देव !

1.लोह कंचन करै पारस काचो, ते कहो कर कुण लेवै हो ।

पारस तू प्रभु साचो पारस, आप समो कर देवै हो ।।

2.तुझ मुख—कमल पासै चमरावलि, चन्द्रकांतिवत सोहै हो ।

हंस—श्रेणि जाणै पंकज सेवे, देखत जन—मन मोह हो ।।

3.फटिक—सिंहासण सिंह आकारे, बैस देशना देवै हो ।

वन—मृग आवै वाणी सुणवा, जाणक सिंह ने सेवै हो ।।

4.चन्द्र समो तुझ मुख महा शीतल, नयन—चकोर लुभावै हो ।

इन्द्र नरेन्द्र सुरासुर रमणी, निरखत तृप्ति न पावै हो ।।

5.पाखंडी सरागी आप विरागी, आपस में इम गैरी हो ।

वैर भाव पाखंडी राखै, आप त्यांरा नहिं वैरी हो ।।

6.जिम सूरज खद्योत ऊपरै, वैर—भाव नहिं आणै हो ।

इण विध प्रभु पिण पाखंडियां नैं, खद्योत सरीखा जाणै हो ।।

7.परमदयाल कृपाल पारस प्रभु, संवत उगणीसै गाया हो ।

कृष्ण पक्ष तिथि चौथ लाडनूं, आणंद अधिको पाया हो ।।

लय : पूज भीखणजी तुम्हारा दर्शन

महावीर प्रभु स्तवन

नहीं इसो दूसरो जगवीर,

उपसर्ग सहिवा अडिग जिनवर, सुरगिरि जेम सधीर ।

1.चरम जिनेन्द्र चौबीसमा रे, अघ हणवा महावीर ।

विकट तप वर ध्यान धर प्रभु, पाया भव जल तीर ।।

2.संगम दुख दिया आकरा पिण, सुप्रसन्‍न निजर दयाल ।

जग उद्धार हुवै मो थकी रे, ए डूबे इण काल ।।

3.लोक अनारज बहु किया रे, उपसर्ग विविध प्रकार ।

ध्यान सुधारस लीनता जिन, मन में हरष अपार ।।

4.इण पर कर्म खपाय नै प्रभु, पाया केवल नाण ।

उपशम रसमय वागरी रे, अधिक अनूपम वाण ।।

5.पुद्‍गल सुख अरि शिव तणां रे, नरक तणा दातार ।

छांड रमण किंपाक बेली, संवेग संजम धार ।।

5.निंदा नैं स्तुति समपणै रे, मान अनै अपमान ।

हरष शोग मोह परहर्‌यां रे, पामै पद निरवाण ।।

6.इम बहुजन प्रभु तारिया रे, प्रणमूं चरम जिणंद ।

उगणीसै आसोज चौथ बिद, हुओ अधिक आणंद ।।

लय : पोढ़ो प्रभु द्वारिका