श्रावक प्रतिक्रमण
नमस्कार—सूत्र
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ।
एसो पंच णमुक्कारो सव्वपाव पणासणो मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं ।
वन्दन—विधि
(चित्र नं. 1 की तरह बैठकर व झुककर प्रदक्षिणा देते हुए)
तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि वंदामि नमसामि सक्कारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण वंदामि ।
चित्र नं. 1
(वन्दना तथा प्रदक्षिणा देने की विधि)
(चित्र नं. 2 की तरह खड़े होकर)
‘मत्थएण वंदामि’ चउवीसत्थव की आज्ञा ।
ईर्यापथिक—सूत्र
इच्छामि पडिक्कमिउं, इरियावहियाए विराहणाए गमणागमणे पाणक्कमणे बीयक्कमणे हरियक्कमणे ओसा—उत्तिंगपणग—दगमट्टी—मक्कडा—संतणासंकमणे जे मे जीवा विराहिया एगिंदिया बेइंदिया तेइंदिया चउरिदिया पंचिंदिया अभिहया वत्तिया लेसिया संघाइया संघट्टिया परियाविया किलामिया उद्दविया ठाणाओ ठाणं संकामिया जीवियाओ ववरोविया जो मे देवसिओ1 अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
चित्र नं. 2
प्रतिक्रमण में खड़े रहने
की विधि
कायोत्सर्ग—प्रतिज्ञा
तस्स उत्तरीकरणेणं पायच्छित्तकरणेणं विसोहीकरणेणं विसल्ली—करणेणं पावाणं कम्माणं निग्घायणट्टाए ठामि काउस्सग्गं अन्नत्थ ऊससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइएणं उड्डुएणं वायनिसग्गेणं भमलीए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं सुहुमेहिं खेलसंचालेहिं सुहुमेहि दिट्ठिसंचालेहिं एवमाइएहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहिओ हुज्ज मे काउस्सग्गो जाव अरहंताणं भगवंताणं नमोक्कारेणं न पारेमि ताव कायं2 । ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ।
चित्र नं. 3
ध्यान में स्थित रहने की
विधि
चतुर्विंशति—स्तव
1.लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतित्थयरे जिणे ।
अरहंते कित्तइस्सं, चउवीसंपि केवली ।।
2.उसभमजियं च वंदे, संभवमभिनंदणं च सुमइं च ।
पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ।।
3.सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल सिज्जंस वासुपुज्जं च ।
विमलमणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ।।
4.कुंथु अरं च मल्लिं , वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।
वंदामि रिट्ठ्नेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ।।
5.एवं मए अभिथुआ, विहुय—रयमला पहीणजर—मरणा ।
चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा में पसीयंतु ।।
6.कित्तिय वंदिय मए, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा ।
आरोग्ग बोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।।
7.चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा ।
सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ।।
नमस्कार—सूत्र
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ।
(ध्यान समाप्त)
चतुर्विंशति—स्तव
1.लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतित्थयरे जिणे ।
अरहंते कित्तइस्सं, चउवीसंपि केवली ।।
2.उसभमजियं च वंदे, संभवमभिनंदणं च सुमइं च ।
पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ।।
3.सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल सिज्जंस वासुपुज्जं च ।
विमलमणंतं च जिणं, धम्म संतिं च वंदामि ।।
4.कुंथुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च । |
वंदामि रिट्ठनेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ।।
5.एवं मए अभिथुआ, विहुय—रयमला पहीणजर—मरणा ।
चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ।।
6.कित्तिय वंदिय मए, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा ।
आरोग्ग बोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।।
7.चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा ।
सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ।।
शक्र—स्तुति
नमोत्थु णं अरहंताणं भगवंताणं आइगराणं तित्थयराणं सहसंबुद्धाणं पुरिसोत्तमाणं पुरिस—सीहाणं पुरिसवर—पुंडरीयाणं पुरिसवरगंधहत्थीणं लोगुत्तमाणं लोग—नाहाणं लोगहियाणं लोगपईवाणं लोगपज्जोयगराणं अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्गदयाणं सरणदयार्ण बोहिदयाणं जीवदयाणं धम्मदयाणं धम्मदेसयाणं , धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्म—वरचाउरंत—चक्कवट्ठीणं दीवो ताणं सरण—गई—पइट्ठा अप्पडिहयवरनाणदंसणधराणं विअट्टछउमाणं जिणाणं जावयाणं तिन्नाणं तारयाणं बुद्धाणं बोहयाणं मुत्ताणं मोयगाणं सव्वण्णूर्ण सव्वदरिसीणं सिवमयलमरुयमणंत—मक्खयमव्वा बाहमपुणरावित्तयं सिद्धि—गइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं णमो जिणाणं जियभयाणं ।
चित्र नं. 4
शक्र स्तुति करने
की विधि
चतुर्विंशति—स्तव समाप्त
‘मत्थएण वंदामि’ चउवीसत्थव समाप्त, पहले सामायिक आवश्यक की आज्ञा ।
(चित्र नं. 2 की तरह खड़े होकर)
प्रतिक्रमण—प्रतिज्ञा
आवस्सई इच्छाकारेण संदिसह भयवं ! देवसिय1 पडिक्कमणं ठाएमि देवसिय2—णाण—दसण—चरित्ताचरित्त—तवअइयारचिंतवणट्ठं करेमि काउस्सग्गं ।
नमस्कार सूत्र
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ।
मंगल—सूत्र
चत्तारि मंगलं—अरहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगल ।
चत्तारि लोगुत्तमा—अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलि—पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो ।
चत्तारि सरणं पवज्जामि—अरहते सरणं पवज्जामि, सिद्धे सरणं पवज्जामि, साहू सरणं पवज्जामि, केवलि—पण्णत्तं धम्म सरणं पवज्जामि ।
सामायिक—प्रतिज्ञा
करेमि भंते । सामाइये सावज्जं जोगं पच्चक्खामि जाव नियम (मुहुत्तं एग) पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा, तस्स भंते ! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।
प्रायश्चित्त—सूत्र
इच्छामि ठाइउं काउस्सग्गं जो मे देवसिओ* अइयारो कओ काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकरणिज्जो दुज्झाओ दुव्विचिंतिओ अणायारो अणिच्छियव्वो असावगपाउग्गो नाणे तह दसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिहं गुत्तीवणं चउपहं कसायाणं पंचण्हें अणुव्वयाणं तिहे गुणव्वयाणं चउपहें सिक्खावयाणं बारसविहस्स सावग—धम्मस्स जं खंडियं जं विराहियं जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
कायोत्सर्ग—प्रतिज्ञा
तस्स उत्तरीकरणेणं पायच्छित्त—करणेणं विसोहीकरणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं निग्घायणट्ठाए ठामि काउस्सग्गं अन्नत्थ ऊससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइएणं उड्डुएणं वायनिसग्गेणं भमलीए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं सुहुमेहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहिं दिटि्ठसंचालेहिं एवमाइएहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहिओ हुज्ज मे काउस्सग्गो जाव अरहंताणं भगवंताणं नमोक्कारेणं न पारेमि ताव कायं ।*
ध्यान प्रारम्भ निन्नानवे अतिचारों का (चित्र नं. 3 की तरह)
ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि
ज्ञान के 14 अतिचार
अमल अन्त:करण से अतिचार की आलोचना ।
कर रहा हूं सरलता से हृदय—ग्रन्थि विमोचना ।।
सूत्र के अध्ययन में, अक्षर—विपर्यय जो हुआ ।
पद—विपर्यय1, यति—विपर्यय2, कृति—विपर्यय3 जो हुआ ।।
घोष में या विनय में बहुमान में स्खलना हुई ।
काल के अतिगमन4 से स्वाध्याय में छलना5 हुई ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
दर्शन के 5 अतिचार
लक्ष्य के प्रति चित्त में सन्देह या भय छा गया ।6
जो नहीं है लक्ष्य उसके प्रति हृदय ललचा गया ।।7
धर्म—फल की प्राप्ति में मानस अगर विचलित हुआ ।8
और मिथ्या—दर्शनों में भाव यदि विकलित हुआ ।।9
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
चारित्र के अतिचार
1. अहिंसा अणुव्रत के पांच अतिचार
निष्करुण हो प्राणियों को कष्ट जो मैंने दिया ।
पीटकर या बांध अंगोपांग का छेदन किया ।।
लादकर अतिभार पशुओं पर स्वयं निर्दय बना ।
जीविका—विच्छिन्न कर यह हृदय पापों से सना ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
2. सत्य अणुव्रत के पांच अतिचार
पुष्ट आधारों बिना आरोप जो सहसा किया ।
हास्य, भय या क्रोध को अतिमात्र यदि प्रश्रय दिया ।।
मर्म खोला हो किसी का, गलत पथ—दर्शन किया ।
लेख झूठा लिख किसी को बात में ही ठग लिया ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो को तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
3. अचौर्य अणुव्रत के पांच अतिचार
ग्रहण कर अस्तेय का व्रत जो चुराई वस्तु ली ।
चोर के चोरीकरण में योग सम्मति अगर दी ।।
राज्य के प्रतिषिद्ध का आयात या निर्यात भी ।
कुछ दिखाया, कुछ दिया या की मिलावट हो कभी ।।
तोल में या माप में प्रामाण्य जो बरता नहीं ।
और लंचा1—ग्रहण में कर्तव्य की जड़ता रही ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
4. ब्रह्मचर्य अणुव्रत के पांच अतिचार
स्वादलोलुप, दॄष्टिलोलुप—वृत्ति को प्रश्रय दिया ।
तीव्र भोगासक्ति से व्यवहार कोई भी किया ।।
यदि रहा कामुक—दशा—उद्दीप्त वातावरण में 1 ।
और आयी हो शिथिलता ब्रह्मव्रत—आचरण में ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
5. अपरिग्रह अणुव्रत के पांच अतिचार
अर्थ के व्यवहार2 में की वंचना यदि जानकर ।
उच्चता अपनी दिखाई दीन पर को मानकर ।।
त्याग में स्वीकृत परिधि का यदि अतिक्रम जो किया ।
व्यसन, रूढ़ि, प्रदर्शनों में व्यर्थ वित्त बहा दिया ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
6. दिग्व्रत के पांच अतिचार
राज्य—शासित देश, सीमा का अतिक्रम जो किया ।
और शोषण हेतु निर्हेतुक अभिक्रम3 जो किया ।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
7. भोगोपभोग—परिमाण व्रत के बीस अतिचार
तृप्ति अल्प, अनल्प हिंसा का किया व्यवहार हो ।
बार, मात्रा का अतिक्रम कर किया आहार हो ।।
अनुकरण—प्रियता दिखाई वस्तु के उपभोग में ।
और स्वेच्छाचारिता की अर्थहीन प्रयोग में ।।
जीविका का हेतु जो व्यवसाय वह अनिवार्य है ।
किन्तु श्रावक के लिए अतिवाद अव्यवहार्य है ।।
महाहिंसा4 और वन को काटना5 अज्ञान है ।
यथासम्भव त्याज्य मन से सभी कर्मादान हैं ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
8. अनर्थदंड विरमण व्रत के पांच अतिचार
हास्य—युक्त अशिष्ट वाणी का किया विनियोग हो ।
और कायिक चपलता का साथ उसके योग हो ।।
व्यर्थ की वाचालता, आया कलह का वेग हो ।
हो गया यदि निष्प्रयोजन, वस्तु का अतिरेक हो ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
9. सामायिक व्रत के पांच अतिचार
साम्य के अभ्यास में मन मलिनता यदि आ गई ।
वचन, काया पर कलुषता की घटा यदि छा गई ।।
सहज कृत—संकल्प का विस्मरण जैसा हो गया ।
काल—मर्यादाकलन1 में चित्त स्थिरता खो गया ।
जो मे देवसिओ* अइयारो को तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
10. देशावकाशिक व्रत के पांच अतिचार
सावधिक संकल्प सीमा का अतिक्रम जो किया ।
दिवसचर्या रात्रिचर्या का व्यतिक्रम जो किया ।
प्रेष्य2 द्वारा यदि किया व्यवसाय वर्जित देश में ।
वस्तु का आयात या निर्यात भावावेश में ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो को तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
11. पौषधोपवास व्रत के पांच अतिचार
पूर्ण पौषध की यथाविधि की न हो आराधना ।
स्थान या उत्सर्ग—विधि की, की न सम्यक् साधना ।।
की न प्रतिलेखन प्रमार्जन की सविधि अनुपालना ।
धर्म जागरिका—विषय में की न यदि परिचालना ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
12. यथासंविभाग व्रत के पांच अतिचार
यदि प्रमाद, प्रवंचना से देय को दूषित किया ।
नाम, शोभा, ख्याति, मत्सर भाव से यदि हो दिया ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो को तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
13. संलेखना के पांच अतिचार
ऐहलौकिक पारलौकिक वस्तु में प्रियता रही ।
और जीवन—मरण में आसक्ति की धारा बही ।।
काम—भोगों के लिए यदि चित्त व्याकुल हो गया ।
भीति और प्रमाद से चैतन्य मेरा सो गया ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
पांच अणुव्रत, सात शिक्षाव्रत यही जीवन—निधि ।
सतत संयम—साधना से पूर्ण हो श्रावक—विधि ।।
साधना में अति—व्यतिक्रम, अति अनाचरणं कृतं ।
विफल हों सब पाप स्वीकृत करूं मिथ्या दुष्कृतं ।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
अठारह पाप
1.प्राणातिपात
2.मृषावाद
3.अदत्तादान
4.मैथुन
5.परिग्रह
6.क्रोध
7.मान
8.माया
9.लोभ
10.राग
11.द्वेष
12.कलह
13.अभ्याख्यान1
14.पैशुन्य2
15.परपरिवाद
16.रति—अरति3
17.मायामृषा
18.मिथ्यादर्शनशल्य
यदि मैंने अठारह पाप सेवन किये हों, तो जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
प्रायश्चित्त—सूत्र
इच्छामि आलोइउं जो मे देवसिओ* अइयारो कओ काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकरणिज्जो दुज्झाओ दुव्विचिंतिओ अणायारो अणिच्छियव्वो असावगपाउग्गो नाणे तह दंसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिणहं गुत्तीर्ण चउपहं कसायाणं पंचण्हें अणुव्वयाणं तिराहे गुणव्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं बारसविहस्स सावग—धम्मस्स जं खंडियं जं विराहियं जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
नमस्कार सूत्र
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ।
(ध्यान समाप्त)
‘मत्थएण वंदामि’ पहला आवश्यक समाप्त, दूसरा ‘चतुर्विंशति-स्तव’ आवश्यक की आज्ञा ।
चतुर्विंशति—स्तव
1. लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतित्थयरे जिणे ।
अरहंते कित्तइस्सं, चउवीसंपि केवली ।।
2. उसभमजियं च वंदे, संभवमभिनंदणं च सुमइं च ।
पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ।।
3. सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल सिज्जंस वासुपुज्जं च ।
विमलमणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ।।
4. कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।
वंदामि रिट्ठनेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ।
5. एवं मए अभिथुआ, विहुय—रयमला पहीणजर—मरणा ।
चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ।।
6. कित्तिय वंदिय मए, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा ।
आरोग्ग बोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।।
7. चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा ।
सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ।।
‘मत्थएणं वंदामि’, दूसरा आवश्यक समाप्त, ‘तीसरे वंदना’ आवश्यक की आज्ञा ।।
वन्दना—सूत्र
इच्छामि खमासमणो ! वंदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए* । अणुजाणह मे मिउग्गहं* । निसीहि1 अहोकायं कायसंफासं । खमणिज्जो भे किलामो । अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइक्कंतो ?2 जत्ता भे* जवणिज्जं च भे* खामेमि खमासमणो । देवसियं वइक्कमं3 आवस्सियाए4 पडिक्कमामि खमासमणाणं देवसियाए आसायणाए5 तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक्कमणाए आसायणाए जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स खमासमणो ! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।
वन्दना—सूत्र
इच्छामि खमासमणो ! वंदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए* । अणुजाणह मे मिउग्गहं* । निसीहि1 अहोकायं कायसंफासं । खमणिज्जो भे किलामो । अप्पकिनंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइक्कंतो ?2 जत्ता भे* जवणिज्जं च भे* खामेमि खमासमणो ! देवसियं वइक्कमं3 आवस्सियाए4 पडिक्कमामि खमासमणाणं देवसियाए आसायणाए5 तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कड़ाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक्कमणाए आसायणाए जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स खमासमणो ! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।
चित्र नं. 5
वंदना आवश्यक में खड़े रहकर व
बैठकर वंदना करने की विधि
चित्र नं. 6
वंदना आवश्यक में बैठकर
वंदना करने की विधि
‘मत्थएण वंदामि’ तीसरा आवश्यक समाप्त, चौथे ‘प्रतिक्रमण’
आवश्यक की आज्ञा ।
आलोचना—सूत्र
(चित्र नं. 7 की तरह बैठकर)
तस्स सव्वस्स देवसियस्स1 अइयारस्स दुच्चिंतिय—दुब्भासिय-दुच्चिट्ठियस्स आलोयंतो पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।
प्रायश्चित्त—सूत्र
इच्छामि पडिक्कमिउं जो मे देवसिओ* अइयारो कओ काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकरणिज्जो दुज्झाओ दुव्विचिंतिओ अणायारो अणिच्छियव्वो असावगपाउग्गो नाणे तह दंसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिण्हं गुत्तीणं चउण्हं कसायाणं पंचण्हं अणुव्वयाणं तिण्हं गुणव्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं बारसविहस्स सावगधम्मस्स जं खंडियं जं विराहियं जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
चित्र नं. 7
प्रतिक्रमण आवश्यक में
बैठने की विधि
ईर्यापथिक—सूत्र
इच्छामि पडिक्कमिउं, इरियावहियाए विराहणाए गमणागमणे पाणक्कमणे बीयक्कमणे हरियक्कमणे ओसा—उत्तिंगपणग—दगमट्टी-मक्कड़ा—संताणासंकमणे जे मे जीवा विराहिया, एगिंदिया बेइंदिया तेइंदिया चउरिंदिया पंचिंदिया अभिहया वत्तिया लेसिया संघाइया संघट्टिया परियाविया किलामिया उद्दविया, ठाणाओ ठाणं संकामिया, जीवियाओ ववरोविया जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
रत्नत्रय
साधना रत्न—त्रयी की विनयनत हो मैं करूं ।
एक लय हो एक रस हो भाव—तन्मयता वरूं ।।
ज्ञान, दर्शन, चरण की पावन त्रिवेणी में नहा ।
देव ! मैं निर्मल बनूं यह स्वप्न मानस में रहा ।।
प्राप्त सम्यग् ज्ञान मुझको और दर्शन भी मिला ।
आचरण का सुमन सुन्दर हृदय—वनिका में खिला ।।
ज्ञान
आगमे तिविहे पन्नत्ते त्तं जहा—सुत्तागमे, अत्थागमे, तदुभयागमे ।
अर्हतों के अनुभवों का आगमों में सार है ।
वह हमारी साधना का प्राणमय आधार है ।।
सूत्र आगम, अर्थ आगम, तदुभयागम रम्य है ।
विविध नय की दॄष्टियों से सहज सरल सुगम्य है ।।
ज्ञान के 14 अतिचार
अमल अन्त:करण से अतिचार की आलोचना ।
कर रहा हूं सरलता से हृदय—ग्रन्थि विमोचना ।।
सूत्र के अध्ययन में अक्षर—विपर्यय जो हुआ ।
पद—विपर्यय, यति—विपर्यय, कृति—विपर्यय जो हुआ ।।
घोष में या विनय में, बहुमान में स्खलना हुई ।
काल के अतिगमन से स्वाध्याय में छलना हुई ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
दर्शन—सम्यक्त्व
अरहंतो महदेवो, जावज्जीवं सुसाहुणो गुरुणो ।
जिणपण्णत्तं तत्तं, इय सम्मत्तं मए गहियं ।।
देव मेरे दिव्य अर्हन्, श्रेष्ठ सारे लोक में ।
साधना—धन साधु मेरे सुगुरु पथ—आलोक में ।।
धर्म वह जो साधना—पथ केवली उपदिष्ट है ।
आत्म—निष्ठामय अमल सम्यक्त्व मुझको इष्ट है ।।
सम्यक्त्व के लक्षण
शान्त हैं आवेग सारे, शान्ति मन में व्याप्त है1 ।
मुक्त होने की हृदय में प्रेरणा पर्याप्त है2 ।।
वृत्ति में वैराग्य3 अन्तर्भाव में करुणा विमल4 ।
अटल आस्था, ये सभी सम्यक्त्व के लक्षण सबल5 ।।
सम्यक्त्व के भूषण
लक्ष्य में स्थिरता निरंतर भक्ति—भावित भावना ।
धर्म शासन की करूं नि:स्वार्थ सतत प्रभावना ।
जैन तत्त्वज्ञान में हो सहज जिज्ञासा प्रबल ।
संघ—सेवा, ये सभी सम्यक्त्व के भूषण अमल ।।
दर्शन के 5 अतिचार
लक्ष्य के प्रति चित्त में संदेह या भय छा गया ।
जो नहीं है लक्ष्य उसके प्रति हृदय ललचा गया ।।
धर्म—फल की प्राप्ति में मानस अगर विचलित हुआ ।
और मिथ्या—दर्शनों में भाव यदि विकलित हुआ ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
बारह व्रत और अतिचार
1. अहिंसा अणुव्रत
पढमं अणुव्वयं थूलाओ पाणाइवायाओ वेरमणं
धन्य हैं मुनिवर महाव्रत पालते सद्भाव से ।
सर्व हिंसा त्याग कर वे जी रहे समभाव से ।।
है महाव्रत साध्य मेरा किन्तु वह दुःसाध्य है ।
पर अणुव्रत—मार्ग मध्यम सरल और सुसाध्य है ।।
स्वत्व—रक्षा के लिए मैं भाव से प्रतिबद्ध हूं ।
देश की हित—सिद्धि के दायित्व से आबद्ध हूं ।।
देहधारी हूं, अतः आरम्भ भी अनिवार्य है ।
किन्तु यह संकल्पजा हिंसा सदा परिहार्य है ।।
अहिंसा अणुव्रत के 5 अतिचार
निष्करुण हो प्राणियों को कष्ट जो मैंने दिया ।
पीटकर या बांध अंगोपांग का छेदन किया ।।
लादकर अतिभार पशुओं पर स्वयं निर्दय बना ।
जीविका विच्छिन्न कर यह हृदय पापों से सना ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
2. सत्य अणुव्रत
बीयं अणुव्वयं थूलाओ मुसावायाओ वेरमणं
ताप और प्रकाश जैसे भिन्न हो सकते नहीं ।
क्या अहिंसा सत्य वैसे भिन्न हो सकते कहीं ?
फिर अहिंसक के लिए यह सत्य तो अनिवार्य है ।
सरलता की सिद्धि का यह व्रत मुझे स्वीकार्य है ।।
मैं नहीं दूंगा कभी झूठी गवाही जानकर ।
ना धरोहर को नकारूंगा स्वयं की मानकर ।।
भूमि विक्रय और विक्रय वस्तुओं का हो भले ।
वर—वधू सम्बन्ध में ना झूठ मेरे में पले ।।
सत्य अणुव्रत के 5 अतिचार
पुष्ट आधारों बिना आरोप जो सहसा किया ।
हास्य, भय या क्रोध को अतिमात्र यदि प्रश्रय दिया ।।
मर्म खोला हो किसी का, गलत पथ—दर्शन किया ।
लेख झूठा लिख किसी को बात में ही ठग लिया ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
3. अचौर्य अणुव्रत
तइयं अणुव्वयं थूलाओ अदिन्नादाणाओ वेरमणं
सत्य—निष्ठा के बिना क्या नीति—निष्ठा है कहीं ?
नीति—निष्ठा के बिना फिर सत्य—निष्ठा भी नहीं ।।
हो अटल संकल्प मेरा नित्य प्रामाणिक रहूं ।
दूसरों के स्वत्व के अपहरण से बचता रहूं ।।
अचौर्य अणुव्रत के 5 अतिचार
ग्रहण कर अस्तेय का व्रत जो चुराई वस्तु ली ।
चोर के चोरीकरण में योग, सम्मति अगर दी ।।
राज्य के प्रतिषिद्ध का आयात या निर्यात भी ।
कुछ दिखाया, कुछ दिया या की मिलावट हो कभी ।।
तोल में या माप में प्रामाण्य जो बरता नहीं ।
और लंचा—ग्रहण में कर्तव्य की जड़ता रही ।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
4. ब्रह्मचर्य अणुव्रत
चउत्थं अणुव्वयं थूलाओ मेहुणाओ वेरमणं
ब्रह्मचर्य पवित्रता की साधना का सेतु है ।
ऊर्ध्वगामी चेतना का यह विलक्षण हेतु है ।।
यथासंभव वस्ति—संयम खाद्य—संयम से करूं ।
प्राण—जय, इन्द्रिय—विजय से वासना को मैं हरूं ।।
ब्रह्मचर्य अणुव्रत के 5 अतिचार
स्वादलोलुप दॄष्टिलोलुप—वृत्ति को प्रश्रय दिया ।
तीव्र भोगासक्ति से व्यवहार कोई भी किया ।।
यदि रहा कामुक—दशा—उद्दीप्त वातावरण में ।
और आयी हो शिथिलता ब्रह्मव्रत—आचरण में ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
5. अपरिग्रह अणुव्रत
पंचमं अणुव्वयं थूलाओ परिग्गहाओ वेरमणं
अर्थ—संग्रह मान्य केवल जीविका—निर्वाह में ।
अर्थ की आसक्ति लाती दोष भाव—प्रवाह में ।।
व्यक्तिगत संग्रह बढ़ाता व्यसन और विलास को ।
क्रूरता, छलना, अनैतिक साधनों की प्यास को ।।
भावना है कब परिग्रह का विसर्जन मैं करूं ।
और इस दुस्तर नदी को चाहता हूं मैं तरूं ।।
अतः अपरिग्रह अणुव्रत हृदय से स्वीकार्य है ।।
न्याय, समता की प्रतिष्ठा के लिए अनिवार्य है ।।
अपरिग्रह अणुव्रत के 5 अतिचार
अर्थ के व्यवहार में की वंचना यदि जानकर ।
उच्चता अपनी दिखाई दीन पर को मानकर ।।
त्याग में स्वीकृत परिधि का यदि अतिक्रम जो किया ।
व्यसन, रूढ़ि, प्रदर्शनों में व्यर्थ वित्त बहा दिया ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
6. दिग्व्रत
छट्ठं दिसिपरिमाण—वयं
अपर के अधिकार, हित का हरण करना हेय है ।
इसलिए दिग्गमन का व्रत श्रेय है, आदेय है ।।
नियत सीमा से परे सोद्देश्य मैं जाऊं नहीं ।
व्यर्थं यातायात के श्रम में उलझ पाऊं नहीं ।।
दिग्व्रत के 5 अतिचार
राज्य—शासित देश—सीमा का अतिक्रम जो किया ।
और शोषण—हेतु निर्हेतुक अभिक्रम जो किया ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
7. भोगोपभोग—परिमाणव्रत विरति
सत्तमं भोगोपभोग—परिमाण—वयं :
भोग के साधन विपुल हैं, अतुल मन की लालसा ।
लालसा की पूर्ति में आरम्भ है भूचाल—सा ।
खाद्य—संयम, वस्त्र—संयम वस्तु का संयम सधे ।
भोग या उपभोग का संयम सफलता से बढ़े ।।
भोगोपभोग—परिमाणव्रत के 20 अतिचार
तृप्ति अल्प, अनल्प हिंसा का किया व्यवहार हो ।
बार, मात्रा का अतिक्रम कर किया आहार हो ।।
अनुकरण—प्रियता दिखाई वस्तु के उपभोग में ।
और स्वेच्छाचारिता की अर्थहीन प्रयोग में ।।
जीविका का हेतु जो व्यवसाय वह अनिवार्य है ।
किन्तु श्रावक के लिए अतिवाद अव्यवहार्य है ।
महाहिंसा और ‘वन को काटना’ अज्ञान है ।
यथासंभव त्याज्य मन से सभी कर्मादान हैं ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
8. अनर्थदंड विरमणव्रत
अट्ठमं अणदुदंड—वेरमण—वयं
दूसरों की अहित—चिंता चित्त का दुर्ध्यान है ।
स्व—प्रमादाचरण हिंसा—पंथ में प्रस्थान है ।।
द्युत, चौर्यादि प्रशिक्षण, शस्त्र का अनुदान है ।
यह अनर्थक—दण्ड इसका पूर्ण प्रत्याख्यान है ।।
अनर्थदंड विरमणव्रत के 5 अतिचार
हास्य—युक्त अशिष्टवाणी का किया विनियोग हो ।
और कायिक चपलता का साथ उसके योग हो ।।
व्यर्थ की वाचालता, आया कलह का वेग हो ।
हो गया यदि निष्प्रयोजन, वस्तु का अतिरेक हो ।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
9. सामायिक व्रत
नवमं सामाइय—वयं
धर्म है समता, विषमता पाप का आधार है ।
जैन शासन के निरूपण का यही बस सार है ।।
त्याग कर सावद्य—चर्या सुखद सामायिक करूं ।
लीन अपने आप में हो, मैं भवोदधि को तरूं ।।
सामायिक व्रत के 5 अतिचार
साम्य के अभ्यास में मन—मलिनता यदि आ गई ।
वचन, काया पर कलुषता की घटा यदि छा गई ।।
सहज कृत—संकल्प का विस्मरण जैसा हो गया ।
काल—मर्यादाकलन में चित्त स्थिरता खो गया ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
10. देशावकाशिक व्रत
दसमं देशावगासिय—वयं
त्याग हिंसा आदि का सामान्य आजीवन किया ।
और यातायात—सीमा हेतु दिग्व्रत भी लिया ।।
एक निश्चित समय तक उनको नियन्त्रित मैं करूं ।
स्वल्पकालिक त्यागमय देशावकाशिक व्रत वरूं ।।
देशावकाशिक व्रत के 5 अतिचार
सावधिक संकल्प—सीमा का अतिक्रम जो किया ।
दिवसचर्या रात्रिचर्या का व्यतिक्रम जो किया ।।
प्रेष्य द्वारा यदि किया व्यवसाय वर्जित देश में ।
वस्तु का आयात या निर्यात भावावेश में ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
11. पौषधोपवास व्रत
एगारसमं पडिपुण्णपोसहोववास—वयं
पर्व—तिथि में पूर्ण पौषध, साथ में उपवास हो ।
त्याग कर सावद्य—चर्या अन्तरात्म—निवास हो ।।
रात्रि—दिन पर्यन्त मैं मुनि—वेश—भूषा में रहूं ।
मोह—ममता से विलग, समभाव से सब कुछ सहूं ।।
पौषधोपवास व्रत के 5 अतिचार
पूर्ण पौषध की यथाविधि की न हो आराधना ।
स्थान या उत्सर्ग—विधि की, की न सम्यक् साधना ।।
की न प्रतिलेखन प्रमार्जन की सविधि अनुपालना ।
धर्म—जागरिका विषय में की न यदि परिचालना ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
12. यथासंविभाग व्रत
बारसमं जहासंविभाग—वयं
मैं सदा आरंभजीवी, मुनि अहिंसा—शूर हैं ।
मैं परिग्रह में निरत हूं, साधु उससे दूर हैं ।।
प्रवर संयम—साधना में संविभागी मैं बनूं ।
खाद्य—संयम, वस्तु—संयम का सहज साधक बनूं ।
वस्त्र, भोजन, पात्र, औषध सहज मेरे पास है ।।
और रहने के लिए आवास में अवकाश है ।
धन्य वह दिन मुनिप्रवर को ये समर्पित मैं करूं ।
भावना के प्रबल बल से शीघ्र भवसागर तरूं ।।
यथासंविभाग—व्रत के 5 अतिचार
यदि प्रमाद, प्रवंचना से देय को दूषित किया ।
नाम, शोभा, ख्याति, मत्सर भाव से यदि हो दिया ।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कड
संलेखना
मारणांतिय संलेखना
देह की संलेखनामय मृत्यु पावन पर्व है ।
दीर्घकालिक साधना का सफल सात्विक गर्व है ।।
मृत्यु की सन्निकटता या देह—शक्ति क्षीण हो ।
प्रवर तप के आचरण में भावना संलीन हो ।।
संलेखना के 5 अतिचार
इहलौकिक पारलौकिक वस्तु में प्रियता रही ।
और जीवन—मरण में आसक्ति की धारा बही ।।
काम—भोगों के लिए यदि चित्त व्याकुल हो गया ।
भीति और प्रमाद से चैतन्य मेरा सो गया ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
पांच अणुव्रत सात शिक्षाव्रत यही जीवन—निधि ।
सतत संयम—साधना से पूर्ण हो श्रावक—विधि ।।
साधना में अति—व्यतिक्रम, अति—अनाचरणं कृतं ।
विफल हों सब पाप स्वीकृत करू मिथ्या दुष्कृतं ।।
जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’
अभ्युत्थान—सूत्र
तस्स धम्मस्स केवलिपपणत्तस्स अब्भुट्ठिओमि1 आराहणाए विरओमि विराहणाए सव्वं तिविहेण पडिक्कंतो वंदामि जिणे चउवीसं ।
वन्दना—सूत्र
इच्छामि खमासमणो ! वंदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए* । अणुजाणह मे मिउग्गह* । निसीहि1 अहोकायं कायसंफासं । खमणिज्जो भे किलामो । अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइक्कंतो ?2 जत्ता भे* जवणिज्जं च भे* खामेमि खमासमणो ! देवसियं वइक्कमं3 आवस्सियाए4 पडिक्कमामि खमासमणाणं देवसियाए आसायणाए5 तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए मणदुक्कड़ाए वयदुक्कडाए कायदुक्कड़ाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक्कमणाए आसायणाए । जो मे देवसिओ* अड्यारो कओ तस्स खमासमणो ! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।
वन्दना—सूत्र
इच्छामि खमासमणो ! वंदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए* । अणुजाणह मे मिउग्गहं* । निसीहि1 अहोकायं कायसंफासं । खमणिज्जो मे किलामो । अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइक्कंतो ?2 जत्ता भे* जवणिज्जं च भे* खामेमि खमासमणो ! देवसिय वइक्कमं3 आवस्सियाए पडिक्कमामि खमासमणाण देवसियाए आसायणाए5 तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए मणदुक्कड़ाए वयदुक्कडाए कायदुक्कड़ाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक्कमणाएं आसायणाए । जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स खमासमणो ! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।
क्षमा—याचना—सूत्र (खड़े होकर)
खामेमि सव्वजीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे ।
मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झ न केणई ।।
पूज्य—पूजा का व्यतिक्रम जान या अनजान में ।
की अवज्ञा लघुजनों की मग्न हो अभिमान में ।।
चाहता हूं मैं क्षमा, मुझको क्षमा दें वे सभी ।
मित्र सब हैं, शत्रुता का भाव लाऊं ना कभी ।।
जीव—योनि
सात लाख पृथ्वीकाय, सात लाख अप्काय, सात लाख तेजस्काय, सात लाख वायुकाय, दस लाख प्रत्येक वनस्पतिकाय, चौदह लाख साधारण वनस्पतिकाय, दो लाख द्वीन्द्रिय, दो लाख त्रीन्द्रिय, दो लाख चतुरिन्द्रिय, चार लाख नारकी, चार लाख देवता, चार लाख तिर्यंच पंचेन्द्रिय, चौदह लाख मनुष्य की जाति—चार गति, चौरासी लाख जीव-योनि पर राग—द्वेष आया हो तो जो मे देवसिओ* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं ’ ।
‘मत्थएण वंदामि’ चौथा आवश्यक सम्पन्न, पांचवें कायोत्सर्ग आवश्यक की आज्ञा ।
कायोत्सर्ग संकल्प सूत्र
देवसिय1—अइयार—विसोहणटठं करेमि काउस्सग्गं ।
प्रायश्चित्त—सूत्र
इच्छामि पडिक्कमिउं जो मे देवसिओ* अइयारो कओ काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकरणिज्जो दुज्झाओ दुव्विचिंतिओ अणायारो अणिच्छि अव्वो असावगपाउग्गो नाणे तह दंसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिरहं गुत्तीर्ण चउपहं कसायाणं पंचपहं अणुव्वयाणं तिहं गुणव्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं बारसविहस्स सावग—धम्मस्स जे खंडियं जं विराहिये जो मे देवसिओ अइयारो को तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
कायोत्सर्ग—प्रतिज्ञा
तस्स उत्तरीकरणेणं पायच्छित्तकरणेणं विसोहीकरणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं निग्घायणट्ठाए ठामि काउस्सग्गं अन्नत्थ ऊससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइएणं उड्डुएणं वायनिसग्गेणं भमलीए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं सुहुमेहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहिं दिट्ठिसंचालेहिं एवमाइएहिं आगारेहिं अभम्गो अविराहिओ होज्ज मे काउस्सग्गो जाव अरहंताणं भगवंताणं नमोक्कारेणं न पारेमि ताव कायं ।*
ध्यान प्रारम्भ (चित्र नं. 3 की तरह)
ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ।
चतुर्विंशति—स्तव
‘लोगस्स का दैवसिक और रात्रिक प्रतिक्रमण में 4, पाक्षिक में 12, चातुर्मासिक में 20 और सांवत्सरिक में 40 का ध्यान करें’
चतुर्विंशति—स्तव
1.लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतित्थयरे जिणे ।
अरहंते कित्तइस्सं, चउवीसेपि केवली ।।
2.उसभमजियं च वंदे, संभवमभिनंदणं च सुमइं च ।
पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ।।
3.सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल सिज्जंस वासुपुज्जं च ।
विमलमणेतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ।
4. कुंथु अरं च मल्लिं , वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।
वंदामि रिट्ठनेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ।।
5.एवं मए अभिथुआ, विहुय—रयमला पहीणजर—मरणा ।
चउवीसेपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ।।
6.कित्तिय वंदिय मए, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा ।
आरोग्ग बोहिलामं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।।
7.चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा ।
सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ।।
नमस्कार—सूत्र
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणे ।
(ध्यान समाप्त)
चतुर्विंशति—स्तव
1.लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतित्थयरे जिणे ।
अरहते कित्तइस्सं, चउवीसंपि केवली ।।
2.उसभमजयं च वंदे, संभवमभिनंदणं च सुमइं च ।
पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ।।
3.सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल सिज्जंस वासुपुज्जं च ।
विमलमणतं च जिणं, धम्म संतिं च वंदामि ।।
4.कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।
वंदामि रिट्ठनेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ।
5.एवं मए अमिथुआ, विहुय—रयमला पहीणजर—मरणा ।
चवीसेपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ।।
6.कित्तिय वंदिय मए, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा ।
आरोग्ग बोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।।
7.चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा ।
सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ।।
वन्दना—सूत्र
इच्छामि खमासमणो ! वंदिउं, जावणिज्जाए निसीहियाए ! अणुजाणह मे मिउग्गहं ।* निसीहि1 अहोकायं काय—संफासं । खमणिज्जो भे किलामो । अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइक्कंतो2 ? जत्ता भे ?* जवणिज्जं च भे ? खामेमि खमासमणो ! देवसियं वइक्कमं3 । आवस्सियाए4 पडिक्कमामि खमासमणाणं देवसियाए आसायणाए5 तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक्कमणाए आसायणाए जो मे देवसिओ* अइयारो कओ तस्स खमासमणो ! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।
वन्दना—सूत्र
इच्छामि खमासमणो ! वंदिउं, जावणिज्जाए निसीहियाए । अणुजाणह मे मिउग्गहं ।* निसीहि1 अहोकायं काय—संफासं । खमणिज्जो में किलामो । अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइक्कंतो2 ? जत्ता भे ?* जवणिज्जं च भे ? खामेमि खमासमणो ! देवसियं वइक्कम3 ! आवस्सियाए4 पडिक्कमामि खमासमणाणं देवसियाए आसायणाए तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए मणदुक्कड़ाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक्कमणाए आसायणाए जो मे देवसिओं* अइयारो कओ तस्स खमासमणो । पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।
‘मत्थएण वंदामि’ । पांचवां आवश्यक समाप्त, छठे ‘प्रत्याख्यान’ आवश्यक की आज्ञा ।
अतीत का प्रतिक्रमण, वर्तमान काल की सामायिक तथा भविष्यत काल का प्रत्याख्यान ।1
सामायिक, चतुर्विंशति—स्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग और प्रत्याख्यान—इन छहों आवश्यकों में जाने—अनजाने, जो कोई अतिचार—दोष लगा हो तथा पाठ का उच्चारण करते समय मात्रा, अनुस्वार, अक्षर हीन, अधिक, ऊंचा, नीचा, आगे—पीछे कहा हो तो जो मे देवसिओं* अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’ ।
शक्र स्तुति
(चित्र नं. 4 की तरह बैठकर)
नमोत्थु णं अरहंताणं भगवंताणं आइगराणं तित्थयरांणं सहसंबुद्धाणं पुरिसोत्तमाणं पुरिस—सीहाणं पुरिसवर—पुंडरीयाणं पुरिस—वरगंधहत्थीणं लोगुत्तमाणं लोग—नाहाणं लोगहियाणं लोगपईवाणं लोगपज्जोयगराणं अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्गदयाणं सरणदयाणं बोहिदयाणं जीवदयाणं धम्मदयाणं धम्मदेसयाणं धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्म—वरचाउरंत—चक्कवट्टीणं दीवो ताणं सरण—गई—पइट्ठा अप्पडिहयवरनाणदंसणधराणं विअट्टछउमाणं जिणाणं जावयाणं तिन्नाणं तारयाणं बुद्धाणं बोहयाणं मुत्ताणं मोयगाणं सव्वण्णूणं सव्वदरिसीणं सिवमयलमरुय—मणंत-मक्खयमव्वाबाहमपुणरावित्तयं सिद्धि—गइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं णमो जिणाणं जियभयाणं ।
शक्र स्तुति
(चित्र नं. 4 की तरह बैठकर)
नमोत्थु णं अरहंताणं भगवंताणं आइगराणं तित्थयराणं सहसंबुद्धाणं पुरिसोत्तमाणं पुरिस—सीहाणं पुरिसवर—पुंडरीयाणं पुरिस—वरगंधहत्थीणं लोगुत्तमाणं लोग—नाहाणं लोगहियाणं लोगपईवाणं लोगपज्जोयगराणं अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्गदयाणं सरणदयाणं बोहिदयाणं जीवदयाणं धम्मदयाणं धम्मदेसयाणं धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्म—वरचाउरंत-चक्कवट्टीणं दीवो ताणं सरण—गई—पइट्ठा अप्पडिहयवरनाणदंसणधराणं विअट्टछउमाणं जिणाणं जावयाणं तिन्नाणं तारयाण बुद्धाणं बोहयाणं मुत्ताणं मोयगाणं सव्वण्णूणं सव्वदरिसीणं सिवमयलमरुय—मणंत-मक्खयमव्वाबाहमपुणरावित्तयं सिद्धि—गइनामधेयं ठाणं संपाविउकामाणं नमो जिणाणं जियभयाणं ।
पहला नमोत्थुणं सिद्ध भगवान के प्रति, दूसरा नमोत्थुणं अरिहंत भगवान के प्रति । तीसरा नमोत्थुणं मम धम्मायरियस्स धम्मोवदेसगस्स थवत्थुई मंगलं श्री श्री श्री 1008 आचार्यश्री महाश्रमणजी के प्रति ।
(‘नमस्कार सूत्र’ का पांच बार पाठ करें)
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ।
पंचपद—वन्दना
णमो अरहंताणं—परम अर्हता सम्पन्न, चार घनघाती कर्म का क्षय कर, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत चारित्र, अनंत शक्ति और आठ प्रातिहार्य इन बारह गुणों से सुशोभित, चौंतीस अतिशय, पैंतीस वचनातिशय से युक्त, धर्मतीर्थ के प्रवर्तक, वर्तमान तीर्थंकर सीमंधर आदि अर्हतों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक भावभीनी वंदना—तिक्खुत्तो आयाहिणं.... ।
णमो सिद्धाणं—परम सिद्धि संप्राप्त, अष्टकर्म क्षय कर केवलज्ञान, केवलदर्शन, असंवेदन, आत्मरमण, अटल अवगाहन, अमूर्ति, अगुरुलघु और निरंतराय—इन आठ गुणों से सम्पन्न, परमात्मा, परमेश्वर, जन्म, मरण, जरा, रोग, शोक, दुःख, दारिद्रय रहित अनंत सिद्धों को विनम्रभाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक भावभीनी वंदना—तिक्खुत्तो आयाहिणं.... ।
णमो आयरियाणं—परम आचार—कुशल, धर्मोपदेशक, धर्मधुरंधर, बहुश्रुत, मेधावी, सत्यनिष्ठ, श्रद्धा—धृति—शक्ति—शांति सम्पन्न, अष्ट गणि—सम्पदा से सुशोभित, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के ज्ञाता, चतुर्विध धर्मसंघ के शास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि एवं छत्तीस गुणों के धारक वर्तमान आचार्यश्री महाश्रमण आदि धर्माचार्यों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक भावभीनी वंदना—तिक्खुत्तो आयाहिणं.... ।
णमो उवज्झायाणं—परम श्रुत स्वाध्यायी, धर्मसंघ में आचार्य द्वारा नियुक्त, ग्यारह अंग तथा बारह उपांग के धारक, अध्ययन और अध्यापन में कुशल—इन पचीस गुणों से सुशोभित उपाध्यायों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक भावभीनी वंदना—तिक्खुत्तो आयाहिणं.... ।
णमो लोए सव्वसाहूणं—अध्यात्म—साधना में संलग्न, पांच महाव्रत, पंचेन्द्रिय निग्रह, चार कषाय—विवेक, भाव सत्य, करण सत्य, योग सत्य, क्षमा, वैराग्य, मन—वचन—काय समाहरणता, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, सम्पन्नता, वेदना और मृत्यु के प्रति सहिष्णुता—इन सत्ताईस गुणों से सुशोभित, परीषहजयी, प्रासुक एषणीय भोजी, अर्हत् और आचार्य की कुशभक अवजात व आज्ञा के आराधक, तपोधन साधु—साध्वियों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक भावभीनी वंदना—तिक्खुत्तो आयाहिणं.... ।
1. देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
2. ध्यान प्रारंभ (चित्र नं. 3 की तरह) ।
1. दैवसिक प्रतिक्रमण में देवसियं, रात्रिक प्रतिक्रमण में राइयं, पाक्षिक प्रतिक्रमण में देवसियं पक्खियं, चातुर्मासिक प्रतिक्रमण में देवसिय चाउमासियं पक्खियं, सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में देवसियं संवच्छरियं ।
2. देवसिय, राइय, देवसिय पक्खिय, देवसिय चाउमासिय पक्खिय, देवसिय संवच्छरिय ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
1. पद को आगे पीछे कहना ।
2. रुकने के स्थान पर न रुकना ।
3. आगम पाठ का विपर्यास ।
4. अतिक्रमण ।
5. स्वाध्याय का विधिवत् न करना ।
6. शंका
7. कांक्षा
8. विचिकित्सा
9. पर—पाषण्ड प्रशंसा, पर—पाषण्ड संस्तव
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
1. रिश्वत
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
1. नाइट क्लब, डिस्कोथिक आदि
2. लेन देन
3. अभियान
4. अंगार कर्म
5. वन कर्म ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
1. निर्धारण
2. प्रतिनिधि
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
1. कलंक लगाना
2. चुगली
3. असंयम से प्रेम और संयम से अप्रेम ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
* चिह्नांकित स्थानों पर खड़े होने पर चित्र नं. 5 की तरह और बैठने पर चित्र नं. 6 की तरह वंदना करें ।
1. चित्र नं. 6 की तरह बैठकर ।
2. दिवसो बइक्कतो, राई बइक्कंता, दिवसो पक्खो बइक्कतो, दिवसो चाउमासो पक्खो वइक्कतो, दिवसो संवच्छरो वइक्कंतो ।
3. देवसिय वइक्कम, राइयं वइक्कम, देवसियं पक्खियं वइक्कमं, देवसियं चाउमासियं पक्खियं वइक्कम, देवसिय संवच्छरियं वइक्कमं ।
4. चित्र नं 5 की तरह खड़े । नोट : दूसरे वंदना सूत्र में यहां खड़ा नहीं होना ।।
5. देवसियाए आसायणाए, राझ्याए आसायणाए, देवसियाए पक्खियाए आसायणाए, देवसियाए चाउमासियाए पक्खियाए आसायणाए, देवसियाए संवच्छरियाए आसायणाए ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
1. देवसियस्स राइयस्स, देवसियस्स पक्खियस्स, देवसियस्स चाउमासियस पक्खियस्स, देवसियस्स संवच्छरियस्स ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
1. शम,
2. संवेग,
3. निर्वेद,
4. अनुकम्पा,
5. आस्था ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ | संवच्छरिओ ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ | संवच्छरिओ ।
1. चित्र नं. 2 की तरह खड़े होकर ।
* चिह्नांकित स्थानों पर खड़े होने पर चित्र नं. 5 की तरह और बैठने पर चित्र नं. 6 की तरह वंदना करें ।
1. चित्र नं. 6 की तरह बैठकर ।
2. दिवसो वइक्कतो, राई वइक्कंता, दिवसो पक्खो वइक्कतो, दिवसो चाउमासो पक्खो वइक्कतो, दिवसो संवच्छरो वइक्कतो ।
3. देवसियं वइक्कम, राइयं वइक्कम, देवसिय पक्खियं वइक्कम, देवसिय चाउमासियं पक्खियं वइक्कम, देवसियं संवच्छरियं वइक्कमं ।
4. चित्र नं 5 की तरह खड़े । नोट : दूसरे वंदना सूत्र में यहां खड़ा नहीं होना ।
5. देवसियाए आसायणाए, राइयाए आसायणाए, देवसियाए पक्खियाए आसायणाए, देवसियाए चाउमासियाए पक्खियाए आसायणाए, देवसियाए संवच्छरियाए आसायणाए ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
1. देवसिय, राइय, देवसिय पक्खिय, देवसिय चाउमासिय पक्खियं, देवसिय संवच्छरिय ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
* चिह्नांकित स्थानों पर खड़े होने पर चित्र नं. 5 की तरह और बैठने पर चित्र नं. 6 की तरह वंदना करें ।
1. चित्र नं. 6 की तरह बैठकर ।
2. दिवसो वइक्कतो, राई वइक्कंता, दिवसो पक्खो वइक्कतो, दिवसो चाउमासो पक्खो वइक्कतो, दिवसो संवच्छरो वइक्कंतो ।
3. देवसियं वइक्कम, राइयं वइक्कम, देवसिय पक्खियं वइक्कम, देवसियं चाउमासियं पक्खियं वइक्कम, देवसिय संवच्छरियं वइक्कमं ।
4. चित्र नं 5 की तरह खड़े । नोट : दूसरे वंदना सूत्र में यहां खड़ा नहीं होना ।
5. देवसियाए आसायणाए, राइयाए आसायणाए, देवसियाए पक्खियाए आसायणाए, देवसियाए चाउमासियाए पक्खियाए आसायणाए, देवसियाए संवच्छरियाए आसायणाए ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ | संवच्छरिओ ।
* देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ ।
1. देवसिक तथा रात्रिक प्रतिक्रमण में कम—से—कम एक दिन तक, पाक्षिक में एक पक्ष तक, चातुर्मास में चार मास तक, सांवत्सरिक में एक वर्ष तक के लिए कोई प्रत्याख्यान करें ।