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वृहद् उपसर्गहर स्तोत्र

(आचार्य भद्रबाहु स्वामी द्वारा विरचित)

1

उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्मघणमुक्कं । विसहर—विसनिन्‍नासं, मंगल—कल्लाण—आवास ।।

शासन पर होने वाले उपसर्गों को दूर करने वाला पार्श्‍व देवता जिनके चरणों में सेवक है, कर्म—रूप सघन बादलों से जो मुक्त हैं, महाविषधर भुजंग का विष जिनके नाम से दूर होता है, मंगल और कल्याण के घर हैं, उन पार्श्‍व प्रभु को नमस्कार करता हूं ।

2

विसहर—फुलिंग—मंतं, कंठे धारेइ जो सया मणुओ । तस्स गह—रोग—मारी, दुट्ठजरा जंति उवसामं ।।

विषधर के विष को दूर करने वाला भगवान पार्श्‍वदेव का नाम जो मनुष्य कंठस्थ रखता है, उसके दुष्‍ट्ग्रह, भीषण रोग, कालज्वर आदि सभी उपद्रव पूर्णरूपेण शान्त हो जाते हैं ।

3

चिट्ठउ दूरे मंतो, तुज्झ पणामो वि बहुफलो होइ । नरतिरिएसु वि जीवा, पावंति न दुक्ख—दोहग्गं ।।

प्रभो ! तुम्हारे नाम के मंत्र का चमत्कार तो दूर, तुम्हें केवल नमस्कार करने मात्र से ही अपार फल प्राप्त होता है । अतः मनुष्य, तिर्यंच आदि गतियों में भी तुम्हारे भक्तों को दुःख—दौर्भाग्य के कष्‍ट नहीं सता सकते ।

4

तुह सम्मत्ते लद्धे, चिंतामणि—कप्पपायवब्भहिए । पावंति अविग्घेणं, जीवा अयरामरं ठाणं ।।

प्रभो ! चिन्तामणिरत्‍न् और कल्पवृक्ष से भी अधिक महिमाशाली (सम्यक्त्व) श्रद्धा प्राप्त हो जाने पर साधकों को किसी प्रकार का भय नहीं रहता । ऐसे श्रद्धालु बिना किसी विघ्‍न—बाधा के अजरामर मोक्षधाम को प्राप्त कर लेते हैं ।

5

ॐ अमरतरु—कामधेणु, चिंतामणि कामकुम्भमाईए । सिरीपासनाह—सेवा—गयाण सव्वे वि दासत्तं ।।

ॐ—यह नमस्कार मन्त्र का बीज मंत्र है, ऐसा समझना चाहिए । कल्पवृक्ष, कामधेनु, चिन्तामणि रत्‍न और काम—कुम्भ आदि ये सभी वस्तुएं पार्श्‍वनाथ भगवान की सेवा करने वाले का दासत्व स्वीकार करती हैं ।

6

ॐ ह्रीं श्रीं ऐं ॐ तुह दंसपेण सामिय, पणासेइ रोग—सोग दोहग्गं । कल्पतरुमिव जायइ, ॐ तुह, दंसणेण समफल हेउ स्वाहा ।।

ॐ ह्रीं श्रीं ऐं स्वामिन् ! तुम्हारे दर्शन से मनुष्य के रोग, शोक और दुर्भाग्य नष्‍ट हो जाते हैं । प्रभो ! तुम्हारे दर्शन से कल्पवृक्ष की ज्यों व्यक्ति की सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं ।

7

ॐ ह्रीं नमिऊण पणवसहिये, मायाबीएण धरणनागिंदं । सिरीकामरायकलियं, पास जिणंदं नमसामि ।।

ॐ ह्रीं इस बीज मंत्र को नमस्कार कर ॐ सहित श्री कामराज को परास्त करने वाले पार्श्‍व जिनेन्द्र को नमस्कार करता हूं ।

8

ॐ ह्रीं श्रीं पास विसहर—विज्जामंतेण झाणं झाएज्जा । धरणेन्द्र पउमादेवी, ॐ ह्रीं क्ष्मर्ल्व्युं स्वाहा ।।

ॐ ह्रीं श्रीं पार्श्‍व—विषहर विद्यामंत्र के द्वारा ध्यान ध्याएं । धरणेन्द्र पद्‍मादेवी ॐ ह्रीं क्ष्मल्यूँ स्वाहा । (यहां बीज मंत्र को नमस्कार किया गया है ।)

9

ॐ थुणेमि पास, ॐ ह्रीं पणमामि परमभत्तीए । अट्ठक्खर धरणिंदो, पउमावई पयडिया कित्ती ।।

ॐ पंचपरमेष्‍ठी के बीज मंत्र सहित पार्श्‍व प्रभु को नमस्कार, ॐ हीं बीज—मंत्र को परम भक्ति से प्रणाम करता हूं, धरणेन्द्र पद्‍मावती के ये आठ अक्षर परिकीर्तित किये गये हैं ।

10

ॐ नट्ठट्ठ—मयट्ठाणे, पणट्ठकम्मट्ठ—नट्ठ संसारे । परमठ्ठ—निट्ठियट्ठे, अट्ठगुणाधीसरं वन्दे ।।

ॐ यह पंचपरमेष्‍ठी का बीज मंत्र है, इस बीज मंत्र के द्वारा अष्‍टमदस्थान प्रणष्‍ट किये हैं, अष्‍ट कर्म प्रणष्‍ट किये हैं, संसार के भय—भ्रमणों को नष्‍ट किये हैं, ऐसे निश्‍चित परमार्थ तथा अष्‍टगुण अधीश्‍वर को नमस्कार करता हूं ।

11

इय संथुओ महायस ! भत्तिब्भर निब्भरेण हियएण । ता देव ! दिज्ज बोहिं, भवे भवे पास जिणचंद ।।

हे महायशस्वी ! इस प्रकार भक्ति—भावना से परिपूर्ण हृदय से मैंने यह तुम्हारी स्तुति की है, अतएव जब तक मोक्ष प्राप्त न हो, तब तक भव-भव में मुझे सम्यक्त्व प्रदान करते रहें ।