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प्रभु पार्श्वदेव चरणों में

लो जैन जगत के तीर्थंकर! मेरा प्रणाम लो

Lo Jain Jagat Ke Tirthankar! Mera Pranam Lo

आचार्यश्री तुलसी · प्रभु पार्श्वदेव चरणों में

गीत क्रमांक2986

लो जैन जगत के तीर्थंकर! मेरा प्रणाम लो — Lyrics

लो जैन जगत के तीर्थंकर! मेरा प्रणाम लो। दो वीतरागता का वर, वन्दन निष्काम लो।।

तुम तीर्थ नहीं तीर्थंकर, क्या गुण गरिमा गाएं। भव-सिन्धु-भंवर में भटके, भक्तों को थाम लो।।

तुम सकल चराचर द्रष्टा, अविकल विज्ञान हो। तुम अमित-शक्ति दृढ़ दर्शन, अविचल विश्राम लो।।

तुम तीन भुवन के त्रायी, उत्तरदायी नहीं। सुख-दुख जब निज कर्माश्रित, तुम ज्योतिर्धाम लो।।

तुम आत्म-विजेता नेता, ‘तुलसी’ के त्राण हो। तुम ‘सत्यं शिवं सुन्दरं’, स्तवना आठों याम लो।।

  1. 1.Lo Jain Jagat Ke Tirthankar! Mera Pranam Lo
  2. 2.यह भक्ति-गीत आचार्यश्री तुलसी द्वारा रचित एक सुंदर स्तुति है। इसमें जैन धर्म के तीर्थंकरों के प्रति गहरी श्रद्धा, भक्ति और आदर व्यक्त किया गया है। कवि ने तीर्थंकरों को वीतराग, आत्म-विजेता और सत्य के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। हर पंक्ति में आत्मशुद्धि, कर्म सिद्धांत और आध्यात्मिक शांति का संदेश मिलता है।

Roman Transliteration

lo Jain jagat ke Tirthankar! mera pranam lo. do vitragata ka var, vandan nishkam lo..

tum tirtha nahin Tirthankar, kya gun garima gaen. bhav-sindhu-bhanvar men bhatke, bhakton ko tham lo..

tum sakal charachar drashta, avikal vijnan ho. tum amit-shakti dridh darshan, avichal vishram lo..

tum tin bhuvan ke trayi, uttardayi nahin. sukh-dukh jab nij karmashrit, tum jyotirdham lo..

tum atma-vijeta neta, ‘Tulsi’ ke tran ho. tum ‘satyaam shivam sundaram’, stavna athon yam lo..

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