श्राविका सुलसा
एक बार भगवान् महावीर चंपानगरी पधारे। भगवान् ने प्रवचन किया। प्रवचन में राजगृह निवासी अम्बड़ संन्यासी भी था। उसने प्रवचन सम्पन्न होने के बाद कहा—'प्रभो! मैं राजगृह जा रहा हूं। आप भी वहां पधारने की कृपा करें।'
भगवान् बोले—'अम्बड़! राजगृह में सुलसा नाम की श्राविका है। वह दृढ़धर्मिणी है। उसकी आस्था उल्लेखनीय है। अम्बड़ ने मन ही मन सुलसा के सौभाग्य की प्रशंसा की।
अम्बड़ संन्यासी भगवान् महावीर का भक्त था। उसके पास विशिष्ट ज्ञान था। वह वैक्रिय लब्धि का धारक था। इस लब्धि के द्वारा वह। विविध प्रकार के-रूप बना सकता था। उसने राजगृह के नागरिकों को सुलसा की धार्मिक दृढ़ता से परिचय कराने के लिए उसकी परीक्षा करने का निर्णय लिया। उसने सबसे पहले चतुर्मुख ब्रह्मा का रूप बनाया। नगर की पूर्व दिशा में प्रकट होकर वेदपाठ करने लगा। हजारों व्यक्ति उसके दर्शन करने गये, सुलसा नहीं गई।
दूसरे दिन अम्बड़ विष्णु का रूप बनाकर पश्चिम द्वार पर प्रकट हुआ। लोगों ने शंख, चक्र, गदा धारण किए हुए साक्षात् विष्णु को देखा। विष्णु-भक्तों के साथ अन्य हजारों दर्शक उसे देख चमत्कृत हुए। किन्तु सुलसा के मन पर उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ।
तीसरे दिन उसने शिव का रूप बनाया। हाथ में त्रिशूल लिये, शरीर पर भस्म लगाए एवं जटाजूट में गंगा को धारण किए उसने दक्षिण दिशा में लोगों को दर्शन दिया। सुलसा ने उस चमत्कारी पुरुष के बारे में, बहुत कुछ सुना, पर उसके पास जाने के लिए तैयार नहीं हुई।
चौथे दिन उत्तर दिशा में स्फटिक सिंहासन पर साक्षात तीर्थंकर महावीर के रूप में विराजमान हुआ। विशाल समवसंरण के बीच अशोक वृक्ष के नीचे सिंहासनस्थ महावीर को देखकर राजगृह के नागरिक हर्ष-विभोर हो रहे थे। प्रतिदिन नये-नये भगवान् के दर्शन पाकर जनता कृतार्थ हो गई। उस दिन जैन लोग सबसे अधिक संख्या में उपस्थित हुए। कुछ व्यक्ति सुलसा के पास जाकर बोले—'आज तो चलो। स्वयं तीर्थंकर महावीर प्रवचन करेंगे।' सुलसाने बिना किसी उत्सुकता के सपाट उत्तर दिया—'तीर्थंकर यहां कहां हो सकते हैं। मेरे परम आराध्य भगवान् महावीर तो इस समय चम्पा के परिसर में विहार कर रहे हैं। यह तीर्थंकर बनने वाला कोई ढोंगी पुरुष है। संसार में ऐसी धोखाधड़ी चलाने वाले बहुत लोग हैं। मुझे वहां नहीं जाना है।'
शहर के काफी लोग वहां गए। पर सुलसा नहीं गई।
तथाकथित महावीर वेशधारी अम्बड़ ने प्रवचन के मध्य पूछा—'शहर के सब जैनी आ गए?
एक व्यक्ति सहमता हुआ बोला—'और तो सब आ गए, एक सुलसा नहीं आई।'
'क्यों नहीं आई वह? इतना क्या अहं है उसे? बड़ी श्रद्धालु श्राविका कहलाती है न वह। चलें, आज उसके पास और उसकी तथाकथित धार्मिकता की पोल खोल दें।'
उत्सुक लोगों की भीड़ साथ ले अम्बड़ संन्यासी सुलसा के घर पहुंचा। सुलसा अपने ध्यान-स्वाध्याय में तल्लीन थी। अम्बड़ ने उसको दुराग्रही और अदूरदर्शी बताकर बुरा-भला कहा। सुलसा शान्त थी। अम्बड़ के मौन होने पर वह बोली—'तुम कहते हो, मैं तीर्थंकर हूं। कैसा होता है तीर्थंकर? क्या पहचान है तीर्थंकर की? तुम छोटी-सी बात पर इतने उत्तेजित हो रहे हो और तीर्थंकर होने का दम्भ भरते हो। क्या तीर्थंकर कभी गुस्सा करते हैं?
सुलसा शान्त भाव और गम्भीर वाणी में यह सब कह रही थी। दर्शक विस्मित होकर सुन रहे थे। आखिर अम्बड़ अपने मूल रूप में उपस्थित हुआ और भगवान् महावीर द्वारा सुलसा के सम्बन्ध में उपस्थित किया हुआ प्रसंग कह सुनाया। सुलसा इस परीक्षा में शत-प्रतिशत सफल रही। शहर भर में उसकी दृढ़ता और स्थिरता की चर्चाएं शुरू हो गई।