थावच्चापुत्र
थावच्चापुत्र एक दिन अपनी अट्टालिका पर खड़ा था। उसके कानों में गीतों की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ी। वह उन्हें बड़े ध्यान से सुनता रहा। वे गीत उसे बड़े मोहक और लुभावने लगे। उसकी उत्सुकता बढ़ी कि ये गीत क्यों गाए जा रहे हैं? वह सीधा अपनी माता के पास आया और पूछने लगा—'मां ये गीत कहां गाए जा रहे हैं? और क्यों गाए जा रहे हैं? मुझे ये गीत बड़े ही अच्छे लगते हैं?
मां ने कहा—बेटा! पड़ोसी के घर पुत्र का जन्म हुआ है। उसकी खुशी में ये गीत गाए जा रहे हैं।'
'अच्छा! पुत्र के जन्म पर इतनी खुशी होती है?'
'हां, बेटा!!
तो क्या मैं जन्मा था तब भी इसी तरह गीत गाए गए थे?
थावच्यापुत्र अपरे बचपन के स्वाभाविक भोलेपन के साथ पूछ बैठा।
पुत्र को गोद में भरते हुए मां ने कहा—'वत्स! तुम्हारे जन्म के समय तो एक दिन क्या कई दिन तक गीत गाए गये धे। खुशियां मनाई गई धीं। उन गीतों और खुशियों के सामने तो यह कुछ भी नहीं है।
'मां, मेरे कान उन गीतों को सुनने के लिए लालायित हैं। मैं फिर ऊपर जाता हूं! यों कह वह पुन: छत पर गया। ध्यान से गीत सुनने लगा। पर अब उन गीतों में वह मधुरता नहीं थी। कान उन्हें सुनना नहीं चाहते थे। वह असमंजस में पड़ गया। क्या बात है? वे गीत अब नहीं हैं? अथवा गाने वाले दूसरे हैं? कुछ समझ में नहीं आया। पुन: दौड़ा-दौड़ा माता के पास आया और पूछने लगा—'मां! गीतों में इतना अन्तर क्यों हो गया है? उनकी मधुरता कहां नष्ट हो गई? ये गीत तो कानों को बड़े अप्रिय लग रहे हैं।
पुत्र की यह बात सुनकर माता की आंखों में आंसू आ गए।
वह बोली—'बेटा! हमारे उस पड़ोसी के घर जो पुत्र जन्मा था, वह मर गयी है।
'अभी जन्मा और अभी मर गया? यह कैसे मां!'
'बेटा! मरना-जीना किसी के वश की बात नहीं है। वह जन्मा तब गीत गाए गए थे। वह मर गया, अब सब रो रहे हैं। विलाप कर रहे हैं।'
'तो मां, क्या मैं भी मरूंगा?'
'तू क्यों मरे। मरे तेरी बला। ऐसी बात फिर कभी मुख से मत निकालना, बेटा!
'मां! मुझे भुलावे में मत डालो। सही-सही बताओ। क्या मुझे भी मरना होगा?
'मां—(अन्यमनस्क सी होकर) 'क्या बताऊं, बेटा! यह मौत किसी को नहीं छोड़ती है। इसका वार सबको झेलना पड़ता है।'
'मां! मैं मरूंगा तब तुम भी ऐसे ही रोओगी क्या?'
'बेटा! तुम्हारे वियोग के नाम से ही मेरा कलेजा मुंह को आता है। मैं दु:ख की कोई कल्पना भी नहीं कर सकती।'
'मां? फिर कोई ऐसा उपाय बताओ जो मुझे मौत से बच्चा सके।'
'बेटा! मेरे पास तो ऐसा कोई उपाय नहीं है। इस बीमारी के एक ही वैद्य हैं—अरिष्टनेमि। जो व्यक्ति उनकी शरण में चला जाता है, वह मौत से बच सकता है।
'मां! तब मुझे भी उनके पास ले चलो।'
'बेटा! समय आने पर तुम्हें उनके दर्शन कराऊंगी।'
कुछ समय बाद वहां अरिष्टनेमि का आगमन हुआ। थावच्चापुत्र ने भगवान् अरिष्टनेमि का उपदेश सुना। वह विरक्त हुआ और दीक्षा स्वीकार कर सदा के लिए मृत्यु के भय से मुक्त हो गया।