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आचार्य भिक्षु
1 / 11 · आचार्य

आचार्य भिक्षु

1760-1803

जीवन-वृत्त

आचार्य-काल
1760–1803

जीवन-झांकी

जन्म
कंटालिया (राजस्थान), आषाढ़ शुक्ला 13सं. 1783
पिता
शाह बल्लुजी
माता
दीपांजी
द्रव्य दीक्षा
बगड़ी (राजस्थान), मार्गशीर्ष कृष्णा 12सं. 1808
भाव दीक्षा
केलवा (राजस्थान), आषाढ़ पूर्णिमासं. 1817
देवलोकगमन
सिरियारी (राजस्थान), भाद्रपद शुक्ला 13सं. 1860

चातुर्मास · 44

  1. 1817 · 1760Kelwa
  2. 1818 · 1761Barlu
  3. 1819 · 1762Siriyari
  4. 1820 · 1763Rajnagar
  5. 1821 · 1764Kelwa
  6. 1822 · 1765Siriyari
  7. 1823 · 1766Pali
  8. 1824 · 1767Kantaliya
  9. 1825 · 1768Kelwa
  10. 1826 · 1769Kherwa
  11. 1827 · 1770Bagri (Sudhri)
  12. 1828 · 1771Kantaliya
  13. 1829 · 1772Siriyari
  14. 1830 · 1773Bagri (Sudhri)
  15. 1831 · 1774Madhopur
  16. 1832 · 1775Kherwa
  17. 1833 · 1776Pali
  18. 1834 · 1777Pipad
  19. 1835 · 1778Amet
  20. 1836 · 1779Bagri (Sudhri)
  21. 1837 · 1780Padu
  22. 1838 · 1781Kelwa
  23. 1839 · 1782Siriyari
  24. 1840 · 1783Pali
  25. 1841 · 1784Kherwa
  26. 1842 · 1785Siriyari
  27. 1843 · 1786Nathdwara
  28. 1844 · 1787Pali
  29. 1845 · 1788Pipad
  30. 1846 · 1789Kherwa
  31. 1847 · 1790Pur
  32. 1848 · 1791Madhopur
  33. 1849 · 1792Kelwa
  34. 1850 · 1793Nathdwara
  35. 1851 · 1794Siriyari
  36. 1852 · 1795Pali
  37. 1853 · 1796Sojat Road
  38. 1854 · 1797Kherwa
  39. 1855 · 1798Pali
  40. 1856 · 1799Nathdwara
  41. 1857 · 1800Pur
  42. 1858 · 1801Kelwa
  43. 1859 · 1802Pali
  44. 1860 · 1803Siriyari

तीर्थ स्थल

  • जन्म स्थलकंटालिया · राजस्थान
  • अभिनिष्क्रमण स्थलबगड़ी, सज्जनपुर · राजस्थान
  • प्रथम प्रवास स्थलबगड़ी, सज्जनपुर · राजस्थान
  • बोधि स्थलराजनगर, राजसमंद · राजस्थान
  • दीक्षा स्थलकेलवा, राजसमंद · राजस्थान
  • समाधि स्थलसिरियारी, पाली · राजस्थान

आचार्य श्री भिक्षु तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम आचार्य थे। उस काल के विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों की मान्यताओं और उपदेशों ने उनके चिन्तन को गहराई से प्रभावित किया, और उन्होंने सत्य की खोज तथा उसे समझने का मार्ग चुना। उन्होंने जैन धर्म की विविध आचार-परम्पराओं का गहन अध्ययन और विश्लेषण किया, और इसी आधार पर जैन जीवन-पद्धति के अपने सिद्धान्त संकलित किए।

जिन सिद्धान्तों का उन्होंने प्रचार किया, उनका पालन उन्होंने स्वयं कठोरता से किया और इस प्रकार सबके लिए उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने संयम, शुद्धि और आत्म-नियंत्रण के जीवन का मार्ग दिखाया। यही जीवन-पद्धति आगे चलकर 'तेरापंथ' के नाम से जानी गई।

स्वर्ण अपने आप में अमूल्य होता है, फिर भी उसे अग्नि में तपकर ही लोक की प्रशंसा मिलती है। इसी प्रकार आचार्य भिक्षु का जीवन उतार-चढ़ावों से भरा रहा, जिन्होंने उन्हें परखा भी और गढ़ा भी। उनके जीवन का पूर्वार्ध बताता है कि उन्होंने कैसी कठिनाइयों और परीक्षाओं का सामना किया, और उत्तरार्ध उनकी सिद्धियों और उपलब्धियों को उद्घाटित करता है।

प्राचीन उल्लेखों में उन्हें 'भीखणजी', 'भीखमजी', 'भिक्खु' आदि नामों से पुकारा गया है। अनुयायी उन्हें श्रद्धापूर्वक 'स्वामीजी' कहते थे। आचार्य भिक्षु अपने समय से बहुत आगे के सन्त थे।

उन्होंने तत्कालीन समाज की परिस्थितियों से ऊपर उठकर सभी कालों के लोगों के समक्ष संयम और सत्य के जीवन का आदर्श रखने का प्रयत्न किया। इस लक्ष्य की साधना में उन्होंने भौतिक उपलब्धियों, सम्मान और सुविधाओं का त्याग किया। अपने ही निर्धारित सिद्धान्तों का कठोरता से पालन करते हुए उन्होंने देह और मानव-स्वभाव की दुर्बलताओं पर विजय पाई।

समय के साथ जो सिद्धान्त निरर्थक हो चले थे, उनमें उन्होंने क्रान्ति की और उन्हें नया रूप दिया। उन्होंने एक व्यवस्थित, सुदृढ़ और अनुशासित धर्मसंघ की कल्पना की और 'तेरापंथ' के रूप में उसे साकार होते देखा। इस धर्मसंघ को संगठित और स्थिर करने के लिए उन्होंने एक गुरु की विचारधारा का प्रवर्तन किया और स्वयंदीक्षा की परिपाटी का अन्त किया।

इस प्रकार एक आचार्य, एक सिद्धान्त, एक विचार और समान चिन्तन की उनकी विचारधारा अन्य सम्प्रदायों के लिए भी आदर्श बनी। स्वामीजी सहिष्णुता, अहिंसा, उदारता और समता के प्रतिमान थे। जीवन के हर अवसर पर उन्होंने समाज में जो अनुचित और अनैतिक था, उसके विरुद्ध निर्भय होकर खड़े होने का प्रयत्न किया।