
आचार्य भिक्षु
जीवन-वृत्त
- 1760–1803
जीवन-झांकी
- कंटालिया (राजस्थान), आषाढ़ शुक्ला 13
- शाह बल्लुजी
- दीपांजी
- बगड़ी (राजस्थान), मार्गशीर्ष कृष्णा 12
- केलवा (राजस्थान), आषाढ़ पूर्णिमा
- सिरियारी (राजस्थान), भाद्रपद शुक्ला 13
चातुर्मास · 44
- Kelwa
- Barlu
- Siriyari
- Rajnagar
- Kelwa
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- Pali
- Kantaliya
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तीर्थ स्थल
- जन्म स्थल
- अभिनिष्क्रमण स्थल
- प्रथम प्रवास स्थल
- बोधि स्थल
- दीक्षा स्थल
- समाधि स्थल
आचार्य श्री भिक्षु तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम आचार्य थे। उस काल के विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों की मान्यताओं और उपदेशों ने उनके चिन्तन को गहराई से प्रभावित किया, और उन्होंने सत्य की खोज तथा उसे समझने का मार्ग चुना। उन्होंने जैन धर्म की विविध आचार-परम्पराओं का गहन अध्ययन और विश्लेषण किया, और इसी आधार पर जैन जीवन-पद्धति के अपने सिद्धान्त संकलित किए।
जिन सिद्धान्तों का उन्होंने प्रचार किया, उनका पालन उन्होंने स्वयं कठोरता से किया और इस प्रकार सबके लिए उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने संयम, शुद्धि और आत्म-नियंत्रण के जीवन का मार्ग दिखाया। यही जीवन-पद्धति आगे चलकर 'तेरापंथ' के नाम से जानी गई।
स्वर्ण अपने आप में अमूल्य होता है, फिर भी उसे अग्नि में तपकर ही लोक की प्रशंसा मिलती है। इसी प्रकार आचार्य भिक्षु का जीवन उतार-चढ़ावों से भरा रहा, जिन्होंने उन्हें परखा भी और गढ़ा भी। उनके जीवन का पूर्वार्ध बताता है कि उन्होंने कैसी कठिनाइयों और परीक्षाओं का सामना किया, और उत्तरार्ध उनकी सिद्धियों और उपलब्धियों को उद्घाटित करता है।
प्राचीन उल्लेखों में उन्हें 'भीखणजी', 'भीखमजी', 'भिक्खु' आदि नामों से पुकारा गया है। अनुयायी उन्हें श्रद्धापूर्वक 'स्वामीजी' कहते थे। आचार्य भिक्षु अपने समय से बहुत आगे के सन्त थे।
उन्होंने तत्कालीन समाज की परिस्थितियों से ऊपर उठकर सभी कालों के लोगों के समक्ष संयम और सत्य के जीवन का आदर्श रखने का प्रयत्न किया। इस लक्ष्य की साधना में उन्होंने भौतिक उपलब्धियों, सम्मान और सुविधाओं का त्याग किया। अपने ही निर्धारित सिद्धान्तों का कठोरता से पालन करते हुए उन्होंने देह और मानव-स्वभाव की दुर्बलताओं पर विजय पाई।
समय के साथ जो सिद्धान्त निरर्थक हो चले थे, उनमें उन्होंने क्रान्ति की और उन्हें नया रूप दिया। उन्होंने एक व्यवस्थित, सुदृढ़ और अनुशासित धर्मसंघ की कल्पना की और 'तेरापंथ' के रूप में उसे साकार होते देखा। इस धर्मसंघ को संगठित और स्थिर करने के लिए उन्होंने एक गुरु की विचारधारा का प्रवर्तन किया और स्वयंदीक्षा की परिपाटी का अन्त किया।
इस प्रकार एक आचार्य, एक सिद्धान्त, एक विचार और समान चिन्तन की उनकी विचारधारा अन्य सम्प्रदायों के लिए भी आदर्श बनी। स्वामीजी सहिष्णुता, अहिंसा, उदारता और समता के प्रतिमान थे। जीवन के हर अवसर पर उन्होंने समाज में जो अनुचित और अनैतिक था, उसके विरुद्ध निर्भय होकर खड़े होने का प्रयत्न किया।