
आचार्य डालगणी
जीवन-वृत्त
- 1897–1909
जीवन-झांकी
- उज्जैन (मध्य प्रदेश), आषाढ़ शुक्ला 4
- कानिरामजी
- जड़ावांजी
- इन्दौर (म. प्रदेश), भाद्रपद कृष्णा 12
- लाडनूं (राजस्थान), माघ कृष्णा 2
- लाडनूं (राजस्थान), भाद्रपद शुक्ला 12
चातुर्मास · 12
- Ladnun
- Sardarsahar
- Bidasar
- Rajaldesar
- Jodhpur
- Sujangarh
- Churu
- Ladnun
- Sardarsahar
- Bidasar
- Ladnun
- Ladnun
तीर्थ स्थल
- स्मारक
- जन्म स्थल
आचार्य श्री डालगणी — डालचन्दजी — तेरापंथ के सप्तम आचार्य थे। बहुत छोटी अवस्था में उनके पिता का देहावसान हो गया, और जब वे ग्यारह वर्ष के थे तब उनकी माता ने दीक्षा ले ली। इतनी छोटी अवस्था में ही उनके व्यक्तित्व में असाधारण परिपक्वता थी।
तीन वर्ष बाद उन्होंने भी इन्दौर में मुनिश्री हीरालालजी के सान्निध्य में दीक्षा ग्रहण की। वे बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी थे और अपने समय के अत्यन्त प्रभावशाली वक्ता बने। उनके असाधारण गुणों को देखते हुए चतुर्थ आचार्य जयाचार्य ने दीक्षा के सात वर्ष के भीतर, केवल इक्कीस वर्ष की अवस्था में, उन्हें अग्रणी नियुक्त किया।
उनकी सुगठित प्रतिभा और स्पष्ट, तर्कसंगत चिन्तन ने संघ में उन्हें विशिष्ट स्थान दिलाया। उनके निर्भीक स्वभाव ने संघ के समक्ष आई अनेक कठिन परिस्थितियों को सुलझाने में सहायता की। अग्रणी के रूप में आचार्य के मार्गदर्शन में उन्होंने बेला, कच्छ आदि अनेक क्षेत्रों में पदयात्राएँ कीं।
तेरापंथ में आचार्य की नियुक्ति पूर्ववर्ती आचार्य ही करते हैं। किन्तु तेरापंथ के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि षष्ठ आचार्य ने सुजानगढ़ में, अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किए बिना, देह त्याग दी। उस समय ऐसी स्थिति के लिए कोई व्यवस्था भी नहीं थी।
सम्पूर्ण तेरापंथ समाज के समक्ष यह अप्रत्याशित चुनौती थी। सुजानगढ़ में उपस्थित प्रमुख सन्तों ने मिलकर निर्णय लिया कि चातुर्मास के बाद सभी साधु लाडनूँ में एकत्र होकर अगले आचार्य का निर्णय करेंगे, और तब तक संघ-व्यवस्था की योजना बनाई। व्यापक परामर्श और परिस्थितियों के आकलन के बाद वरिष्ठतम सन्त कालूजी ने लाडनूँ में डालचन्दजी के नाम की घोषणा की।
उन्होंने लगभग बारह वर्ष तक अत्यन्त कुशलता से तेरापंथ का संचालन किया और उसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। अपने नेतृत्वकाल में उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बीदासर में उनका स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ा।
उन्होंने कालूगणी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया, और उनसठ वर्ष की अवस्था में बीदासर में ही उनका देहावसान हुआ।