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आचार्य जयाचार्य (जीतमलजी)
4 / 11 · आचार्य

आचार्य जयाचार्य (जीतमलजी)

1851-1881

जीवन-वृत्त

आचार्य-काल
1851–1881

जीवन-झांकी

जन्म
रोयट (राजस्थान), आश्विन शुक्ला 14सं. 1860
पिता
आइदानजी गोलछा
माता
कल्लुजी
दीक्षा
जयपुर (राजस्थान), माघ कृष्णा 7सं. 1869
युवाचार्य पद
नाथद्वारा (राजस्थान), आषाढ़सं. 1894
आचार्य पद
बीदासर (राजस्थान), माघ पूर्णिमासं. 1908
देवलोकगमन
जयपुर (राजस्थान), भाद्रपद कृष्णा 12सं. 1938

चातुर्मास · 30

  1. 1909 · 1852Jaipur
  2. 1910 · 1853Nathdwara
  3. 1911 · 1854Ratlam
  4. 1912 · 1855Udaipur
  5. 1913 · 1856Pali
  6. 1914 · 1857Bidasar
  7. 1915 · 1858Ladnun
  8. 1916 · 1859Sujangarh
  9. 1917 · 1860Bidasar
  10. 1918 · 1861Ladnun
  11. 1919 · 1862Sujangarh
  12. 1920 · 1863Churu
  13. 1921 · 1864Jodhpur
  14. 1922 · 1865Pali
  15. 1923 · 1866Bidasar
  16. 1924 · 1867Sujangarh
  17. 1925 · 1868Jodhpur
  18. 1926 · 1869Bidasar
  19. 1927 · 1870Ladnun
  20. 1928 · 1871Jaipur
  21. 1929 · 1872Bidasar
  22. 1930 · 1873Bidasar
  23. 1931 · 1874Sujangarh
  24. 1932 · 1875Ladnun
  25. 1933 · 1876Ladnun
  26. 1934 · 1877Ladnun
  27. 1935 · 1878Bidasar
  28. 1936 · 1879Bidasar
  29. 1937 · 1880Jaipur
  30. 1938 · 1881Jaipur

तीर्थ स्थल

  • स्मृति संस्थानरोयट, पाली · राजस्थान
  • समाधि स्थलरामनिवास बाग, जयपुर · राजस्थान

आचार्य श्री जीतमलजी — जयाचार्य — तेरापंथ के चतुर्थ आचार्य और जैन परम्परा के प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्तित्व थे। अपनी सभी रचनाओं के अन्त में वे 'जय' नाम का प्रयोग करते थे। उनका जन्म विक्रम संवत् 1860 की आश्विन शुक्ला चतुर्दशी को हुआ।

पिता का नाम आइदानजी और माता का नाम कल्लूजी था; वे गोलछा ओसवाल थे। सात वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने दीक्षा का संकल्प कर लिया था। विक्रम संवत् 1869 में, आचार्य भारीमालजी के आदेश से युवाचार्य रायचन्दजी ने उन्हें दीक्षित किया; तब वे दसवें वर्ष में चल रहे थे।

उसी वर्ष उनके ज्येष्ठ भ्राता स्वरूपचन्दजी स्वामी ने भी दीक्षा ली, और एक मास बाद उनकी माता कल्लूजी तथा दूसरे भाई भमरजी भी दीक्षित हुए। इस प्रकार उनका सम्पूर्ण परिवार तेरापंथ को समर्पित हो गया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा मुनि हेमराजजी के सान्निध्य में हुई।

भारीमालजी की प्रज्ञा, ऋषिराज की दीक्षा और आगमज्ञ मुनि हेमराजजी का ज्ञान — इन तीन धाराओं का संगम उन्हें सहज ही प्राप्त हुआ। जयाचार्य आरम्भ से ही दृढ़ और मेधावी साधु थे। विक्रम संवत् 1894 में वे युवाचार्य बने और संवत् 1908 की माघ पूर्णिमा को तेरापंथ के आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए।

उनके आचार्यकाल में तेरापंथ धर्मसंघ अपनी दूसरी शताब्दी में प्रवेश कर रहा था — परिवर्तन का काल था, और संघ-व्यवस्था में सुधार अपेक्षित था। जयाचार्य ने अनेक नए प्रशासनिक विधान दिए। आज जिस समाजवाद की चर्चा होती है, उसकी दृष्टि उन्होंने एक शताब्दी पूर्व समान वितरण की व्यवस्था स्थापित करके दे दी थी।

उन्होंने पुस्तकें, उपकरण और श्रम ही नहीं, साधु-साध्वियों के समुदायों को भी समान रूप से विभाजित किया। उन दिनों सहयोगी साधु-साध्वियों की संख्या समान नहीं थी। जयाचार्य ने प्रत्येक को मनोवैज्ञानिक ढंग से नई व्यवस्था स्वीकार करने के लिए तैयार किया और उसे व्यावहारिक रूप दिया।

आज की भाषा में इसे 'जयाचार्य की क्रान्ति' कहा जाता है। उन्होंने संघ की समृद्धि और एकता के लिए नई मर्यादाएँ निर्धारित कीं। वे केवल कुशल प्रशासक, विधानकर्ता और मनोविज्ञानी ही नहीं, प्रख्यात साहित्यकार भी थे — जन्मजात कवि।

ग्यारह वर्ष की अवस्था में उन्होंने 'सन्तगुणमाला' की रचना की और उन्नीस वर्ष की आयु में 'पण्णवणा' जैसे गम्भीर ग्रन्थ का राजस्थानी में अनुवाद किया। इसके बाद उनकी लेखनी से साहित्य की अविरल धारा बही। भगवती सूत्र का राजस्थानी रूपान्तर 'भगवती की जोड़' राजस्थानी साहित्य की विशालतम कृतियों में गिना जाता है।

उन्होंने आगमों पर टीकाएँ ही नहीं लिखीं, अपने अनुभव के आधार पर अनेक स्थलों पर स्वतन्त्र विवेचन भी किया। दर्शन, ध्यान, स्तवन, व्याकरण, आचार और आत्म-अनुभव — विविध विषयों पर उनकी लगभग तीन लाख पद्यों की रचना है। उनके साहित्य का बड़ा भाग आचार्य भिक्षु के विचारों पर केन्द्रित है।

वे आचार्य भिक्षु के दर्शन के प्रति पूर्ण समर्पित थे और उनके श्रेष्ठ व्याख्याता माने जाते हैं; इतने तन्मय कि उन्हें 'द्वितीय भिक्षु' कहा जाने लगा। वे शास्त्रों के अनन्य अध्येता थे और आगमों की हजारों गाथाएँ उन्हें कण्ठस्थ थीं। उन्होंने तीस वर्ष आचार्य पद का निर्वाह किया और आचार्य भिक्षु की परम्परा को सुदृढ़ आधार दिया।

उनके आचार्यकाल में 105 पुरुषों और 224 महिलाओं ने दीक्षा ली। विक्रम संवत् 1938 की भाद्रपद कृष्णा द्वादशी को उनका समाधिपूर्वक देहावसान हुआ।