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आचार्य मघराजजी
5 / 11 · आचार्य

आचार्य मघराजजी

1881-1892

जीवन-वृत्त

आचार्य-काल
1881–1892

जीवन-झांकी

जन्म
बीदासर (राजस्थान), चैत्र शुक्ला 11सं. 1897
पिता
पूरणमलजी बेगवानी
माता
बन्नाजी
दीक्षा
लाडनूं (राजस्थान), मार्गशीर्ष कृष्णा 12सं. 1908
युवाचार्य पद
चूरू (राजस्थान), आश्विन कृष्णा 13सं. 1920
आचार्य पद
जयपुर (राजस्थान), भाद्रपद शुक्ला 2सं. 1938
देवलोकगमन
सरदारशहर (राजस्थान), चैत्र कृष्णा 5सं. 1949

चातुर्मास · 11

  1. 1939 · 1882Bidasar
  2. 1940 · 1883Churu
  3. 1941 · 1884Sardarsahar
  4. 1942 · 1885Jodhpur
  5. 1943 · 1886Udaipur
  6. 1944 · 1887Bidasar
  7. 1945 · 1888Sardarsahar
  8. 1946 · 1889Ladnun
  9. 1947 · 1890Bidasar
  10. 1948 · 1891Jaipur
  11. 1949 · 1892Ratangarh

तीर्थ स्थल

  • स्मारक स्थलसरदारशहर, चूरू · राजस्थान

आचार्य श्री मघराजजी तेरापंथ के पंचम आचार्य थे। उनका जन्म विक्रम संवत् 1897 की चैत्र शुक्ला एकादशी को बीदासर के बेंगानी परिवार में हुआ। पिता का नाम पूरणमलजी और माता का नाम गुलाबा था।

उन दिनों युवाचार्य जीतमलजी का चातुर्मास बीदासर में था। माता, पुत्र और बहन — तीनों के मन में दीक्षा का भाव जागा। तीनों एक साथ दीक्षित होना चाहते थे, किन्तु गुलाबा दीक्षा की निर्धारित आयु तक नहीं पहुँची थी।

माता को अपनी भावना रोकनी पड़ी, पर बालक मघराज को प्रतीक्षा असह्य थी। माता की अनुमति लेकर वे युवाचार्य जीतमलजी के समक्ष उपस्थित हुए, अपनी उत्कण्ठा कही और धर्म के मूल तत्त्व सीखने लगे। जयाचार्य ने बालक में ग्रहण करने की असाधारण क्षमता देखी और लाडनूँ में उन्हें दीक्षित किया।

उस समय आचार्य रायचन्दजी मेवाड़ के रावलिया में विराजमान थे। जब उन तक मुनि मघराज की दीक्षा का समाचार पहुँचा, उसी क्षण किसी ने तीन बार छींका — जिसे शुभ माना गया। पहली छींक पर उन्होंने कहा कि यह मुनि मेधावी होगा, दूसरी पर कि यह समुदाय का अग्रणी बनेगा, और तीसरी पर कि यह मुनि जीतमलजी का उत्तराधिकारी होगा।

महापुरुषों के वचन व्यर्थ नहीं जाते — वे तीनों बातें सत्य सिद्ध हुईं। जयाचार्य के सान्निध्य में मुनि मघराजजी ने बहुमुखी अध्ययन किया। विनम्रता, सहनशीलता और पाप-भीरुता उनके स्वभाव में थी।

अपने आचार्य के प्रति उनकी असाधारण निष्ठा थी, और आचार्य का स्नेह भी उन पर उतना ही गहरा था — गुरु और शिष्य के पारस्परिक समर्पण का यह विरल उदाहरण है। उनका स्मरण अत्यन्त तीक्ष्ण था; एक बार कण्ठस्थ किया शास्त्र वे कभी नहीं भूलते। सभी साधुओं के वे प्रिय और विश्वसनीय थे।

एक बार किसी मुनि से कुछ भूल हुई और विषय आचार्य द्वारा नियुक्त पाँच पंचों को सौंपा गया। निर्णय की घड़ी में उस मुनि ने जयाचार्य से कहा कि उसे न्याय की आशा नहीं है। जयाचार्य ने पूछा कि उसे किस पर विश्वास है — क्या मघराजजी पर? मुनि ने तत्काल सहमति दी।

उसी दिन मघराजजी को पंचों का प्रमुख नियुक्त किया गया; तब वे केवल चौदह वर्ष के थे। उनकी असाधारण क्षमता को देखते हुए विक्रम संवत् 1920 में, चौबीस वर्ष की अवस्था में, जयाचार्य ने उन्हें युवाचार्य बनाया। अठारह वर्ष तक वे युवाचार्य रहे और अपने आचार्य के अनेक महत्त्वपूर्ण दायित्व सँभालकर उनका भार हल्का किया।

जयाचार्य के देहावसान के बाद, विक्रम संवत् 1938 में, जयपुर में उन्होंने तेरापंथ का दायित्व सँभाला। तेरापंथ के सभी आचार्यों में वे सर्वाधिक कोमल-हृदय थे। उन्होंने कभी किसी को कठोर उपालम्भ नहीं दिया।

किसी की भूल पर भी वे इतना ही कहते — "तुम भूल करते हो, तब मुझे कहना पड़ता है।" संघ के अनुशासन में उनकी यह अत्यन्त विनम्र पद्धति अहिंसा का एक विलक्षण प्रयोग थी। उनके आचार्यकाल में 36 पुरुषों और 83 महिलाओं ने दीक्षा ली। विक्रम संवत् 1948 की चैत्र कृष्णा पंचमी को सरदारशहर में उनका देहावसान हुआ।