
आचार्य महाप्रज्ञ
जीवन-वृत्त
- 1996–2010
जीवन-झांकी
- टमकोर (राजस्थान), आषाढ़ कृष्णा 13
- तोलाराम चोरड़िया
- बालुजी
- सरदारशहर (राजस्थान), माघ शुक्ला 10
- गंगाशहर (राज.), कार्तिक शुक्ला 13
- राजलदेसर (राज.), माघ शुक्ला 7
- सुजानगढ़ (राज.), माघ शुक्ला 7
- दिल्ली, माघ शुक्ला 6
- सरदारशहर (राज.), वैशाख शुक्ला 11 (9 मई 2010)
चातुर्मास · 14
- Gangasahar
- Sardarsahar
- Delhi
- Ladnun
- Bidasar
- Ahmedabad
- Surat (Gujarat)
- Siriyari
- Delhi
- Bhiwani (Haryana)
- Udaipur
- Jaipur
- Ladnun
- Sardarsahar
तीर्थ स्थल
- जन्म स्थल
'महाप्रज्ञ' का अर्थ है — परम ज्ञानी। आचार्य महाप्रज्ञ केवल एक व्यक्ति नहीं, एक प्रयोजन थे; केवल एक सत्ता नहीं, एक आस्था थे। वे ऐसी दृष्टि थे जिसे काल या क्षेत्र की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता।
उनके ध्यान की गहराइयों से निकले विचार स्थायी और प्रभावी हैं। उन्होंने धर्म और उसके कर्मकाण्डों से जुड़े अनेक भ्रम दूर किए। वे कहते थे — "जो धर्म मनुष्य के जीवन में परिवर्तन नहीं लाता, जो उसे शान्ति नहीं देता, उसे कन्धे पर बोझ की तरह ढोने के बजाय गंगा में बहा देना चाहिए।
केवल कर्मकाण्ड या मूर्तिपूजा पर्याप्त नहीं, जब तक आचरण न बदले। जब तक व्यक्ति स्वयं के और दूसरों के प्रति ईमानदार न हो और मूल्यनिष्ठ जीवन न जिए, वह घोषणा भर से धार्मिक नहीं हो जाता।" वे जैन आगमों के प्रकाण्ड विद्वान्, भारतीय और पाश्चात्य दर्शन के प्रतिष्ठित समालोचक, विज्ञान और अध्यात्म के समन्वयकर्ता तथा आचार्य तुलसी के निष्ठावान शिष्य थे। उनकी असाधारण मेधा विद्वानों के लिए भी विस्मय का विषय थी; उन्हें 'चलता-फिरता विश्वकोश' कहा जाता था।
कवि रामधारी सिंह 'दिनकर' उन्हें भारत का द्वितीय विवेकानन्द कहते थे। तेरापंथ को गौरव देने के साथ-साथ वे अनगिनत समस्याओं में उलझे मानव-मन के लिए प्रकाश-स्तम्भ भी रहे। प्रेक्षाध्यान और जीवन-विज्ञान के उनके प्रयोगों ने भिन्न-भिन्न धर्मों, सम्प्रदायों और जातियों के लोगों को एक मंच पर लाने तथा पूर्व और पश्चिम को जोड़ने में सफलता पाई।
दार्शनिक चिन्तक होने के साथ वे संवेदनशील कवि भी थे। हिन्दी और संस्कृत में लिखी उनकी रचनाएँ उनकी सूक्ष्म अनुभूतियों को उद्घाटित करती हैं। 'सम्बोधि', 'अश्रुवीणा', 'मुकुलम्' (संस्कृत) और 'ऋषभायण' (हिन्दी) उनकी साहित्यिक देन के कुछ रत्न हैं।
उनका जन्म 1921 में राजस्थान के झुंझुनूँ जिले के टमकोर गाँव में हुआ। दस वर्ष की अवस्था में उन्होंने दीक्षा ली। आचार्य तुलसी के कुशल मार्गदर्शन में उन्होंने शिक्षा पाई और निष्ठावान शिष्य सिद्ध हुए।
इतिहास, दर्शन, न्याय और व्याकरण के अध्ययन ने उनके ज्ञान की नींव सुदृढ़ की। आधुनिक भौतिकी, जीव-विज्ञान, आयुर्वेद, राजनीति, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया। उपाधियाँ और सम्मान — 1965 में हिसार (हरियाणा) में आचार्य तुलसी ने उन्हें (मुनि नथमल को) तेरापंथ का 'निकाय सचिव' नियुक्त किया।
1978 में गंगाशहर (राजस्थान) में उनकी असाधारण प्रज्ञा और विद्वत्ता के लिए उन्हें 'महाप्रज्ञ' की उपाधि दी गई। 4 फरवरी 1979 को राजलदेसर (राजस्थान) में उन्हें युवाचार्य घोषित किया गया और उनका नाम 'महाप्रज्ञ' कर दिया गया। जैन ध्यान और योग के क्षेत्र में उनके अनूठे अनुसन्धान के लिए उन्हें 'जैन-योग-पुनरुद्धारक' की उपाधि भी प्रदान की गई।