
आचार्य माणकगणी
जीवन-वृत्त
- 1892–1897
जीवन-झांकी
- जयपुर (राजस्थान), भाद्रपद कृष्णा 4
- हुकमीचंदजी श्रीमाल खारड़
- छोटांजी
- लाडनूं (राजस्थान), फाल्गुन शुक्ला 11
- सरदारशहर (राज.), चैत्र कृष्णा 2
- सरदारशहर (राज.), चैत्र कृष्णा 8
- सुजानगढ़ (राज.), कार्तिक कृष्णा 3
चातुर्मास · 5
- Sardarsahar
- Churu
- Jaipur
- Bidasar
- Sujangarh
आचार्य श्री माणकगणी तेरापंथ के षष्ठ आचार्य थे। उनका जन्म विक्रम संवत् 1912 की भाद्रपद कृष्णा चतुर्थी को जयपुर के एक जौहरी परिवार में हुआ। उनका गोत्र खरड़ा और उपजाति श्रीमाल थी; पिता का नाम लालाजी लिछमनदासजी था।
माता-पिता का स्नेह उन्हें अधिक समय नहीं मिला — बचपन में ही उनका देहावसान हो गया। पितामह लाला लिछमनदासजी ने उन्हें स्नेहपूर्वक पाला और धार्मिक संस्कारों से युक्त किया। बालक माणक भी अपने पितामह के प्रति विनम्र और आदरशील थे।
विक्रम संवत् 1928 में जयाचार्य का चातुर्मास जयपुर में हुआ। उसी चातुर्मास में बालक माणक में वैराग्य जागा और उन्होंने तत्त्वज्ञान का अध्ययन किया। उसी वर्ष फाल्गुन शुक्ला एकादशी को लाडनूँ में उन्हें दीक्षा मिली; तब उनकी अवस्था साढ़े सोलह वर्ष थी।
माणकगणी स्वभाव से अत्यन्त विनम्र थे। उनकी बुद्धि तीव्र थी और वे हर बात शीघ्र ग्रहण कर लेते थे। दीक्षा के कुछ ही वर्षों में वे आगमों के ज्ञान से सम्पन्न हो गए, और दीक्षा के तीन वर्ष बाद ही जयाचार्य ने उन्हें एक समुदाय का अग्रणी बना दिया।
जयाचार्य के देहावसान के बाद आचार्य मघराजजी के सान्निध्य में उनकी आध्यात्मिक प्रगति और गहरी हुई। विक्रम संवत् 1949 की चैत्र कृष्णा द्वितीया को आचार्य मघराजजी ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। वे केवल चार दिन युवाचार्य रहे — उसी मास की कृष्णा अष्टमी को वे आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए।
वे गौरवर्ण, लम्बे और कृशकाय थे, और उनका स्वर ऊँचा तथा मधुर था। दीर्घ यात्राएँ उन्हें प्रिय थीं; हरियाणा की यात्रा करने वाले वे तेरापंथ के प्रथम आचार्य थे। संघ के विस्तार की दृष्टि से उन्होंने अधिकांश समय उन क्षेत्रों में बिताया जहाँ उनके पूर्ववर्ती या तो गए ही नहीं थे या विरले ही गए थे।
केवल बयालीस वर्ष की अवस्था में सुजानगढ़ में उनका देहावसान हुआ। अल्पायु में देहावसान के कारण वे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं कर सके। उनके आचार्यकाल में 15 पुरुषों और 25 महिलाओं ने दीक्षा ली।