
आचार्य रायचन्दजी
जीवन-वृत्त
- 1821–1851
जीवन-झांकी
- बड़ी रावलियां (राजस्थान)
- शाह चतरोजी बम्ब
- कुशालांजी
- बड़ी रावलियां (राज.), चैत्र पूर्णिमा 9
- केलवा (राजस्थान), बैशाख कृष्णा 9
- राजनगर (राजस्थान), माघ कृष्णा 9
- छोटी रावलियां (राज.), माघ कृष्णा 14
चातुर्मास · 30
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तीर्थ स्थल
- समाधि स्थल
आचार्य श्री रायचन्दजी तेरापंथ के तृतीय आचार्य थे। उनका जन्म विक्रम संवत् 1847 में उदयपुर क्षेत्र के बड़ारवालिया गाँव में हुआ। पिता का नाम चान्द्रजी और माता का नाम कुशलाजी था।
ग्यारह वर्ष की अवस्था में, विक्रम संवत् 1857 की चैत्र पूर्णिमा को, उन्होंने अपनी माता के साथ दीक्षा ली। थोड़े ही समय में उन्होंने आगमों का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया और अनेक गाथाएँ कण्ठस्थ कर लीं। धर्मोपदेश देने में वे निपुण थे।
उनका स्वर मधुर, ऊँचा और प्रभावशाली था — कहा जाता है कि प्रवचन के समय उनकी वाणी समीपवर्ती गाँव तक सुनाई देती थी। मुनि रायचन्दजी आचार्य भिक्षु के अत्यन्त विश्वस्त शिष्य थे, यद्यपि स्वामीजी का सान्निध्य उन्हें केवल तीन वर्ष ही मिल सका। आचार्य भारीमालजी का विश्वास भी उन्हें समान रूप से प्राप्त था, और संघ के आन्तरिक विषयों में भी उनका परामर्श सदा लिया और सराहा जाता था।
विक्रम संवत् 1878 में केलवा में वे युवाचार्य बने और उसी वर्ष माघ कृष्णा नवमी को राजनगर में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए। वे दीर्घ यात्राओं में रुचि रखते थे और गुजरात, सौराष्ट्र तथा कच्छ की यात्रा करने वाले तेरापंथ के प्रथम आचार्य थे। वे निर्भीक थे।
एक बार मेवाड़ में विहार करते समय कुछ साधु उनसे आगे चल रहे थे। उन दिनों डाकुओं का प्रकोप था। घोड़ों पर सवार डाकुओं ने उन साधुओं को रोककर सब कुछ रख देने को कहा।
साधुओं ने कहा कि उनके पास केवल आवश्यक वस्त्र और आहार है। इसी बीच एक डाकू ने एक साधु की कम्बल छीनने का प्रयत्न किया। साधु ने कम्बल बिछाकर उस पर बैठ जाना उचित समझा, तो डाकू घोड़े से उतरकर उसे नीचे से खींचने लगा।
दूर से यह देखकर ऋषिराज ने ऊँचे स्वर में पूछा — "यहाँ जो एकत्र हैं, उनमें कोई राजपूत है या नहीं?" उनका स्वर दूर तक गूँजा। डाकुओं का मुखिया वहाँ पहुँचा और पूछा कि राजपूत की क्या आवश्यकता है। ऋषिराज ने कहा — "आवश्यकता कोई नहीं।
मैं केवल यह जानना चाहता था कि यदि यहाँ कोई राजपूत होता, तो वह सन्तों को लूटने का साहस न करता।" ठाकुर ने उनके चरणों में नमन किया, अपनी भूल स्वीकार की, और ऐसी पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए अपने दो साथी साधुओं के साथ भेज दिए। उन्होंने तीस वर्ष आचार्य पद का निर्वाह किया। उनका अन्तिम चातुर्मास विक्रम संवत् 1908 में उदयपुर में हुआ।
उसी वर्ष श्वास-रोग के कारण उनका देहावसान हुआ। उनके आचार्यकाल में 77 पुरुषों और 168 महिलाओं ने दीक्षा ली।