1अभिनंदण वांदू नित्य मनरली । तीर्थंकर हो चोथा जग भाण, छांड गृहवास करी मति निरमली । विषय-विटंबण हो तजिया विष फल जाण, अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।। १ ।।
प्रभो ! तुम चौथे तीर्थंकर हो । इस जगत् में सूर्य हो । तुमने गृहवास को त्याग अपनी मति को निर्मल बना लिया । तुमने विषय-प्रपंच को विष-फल समझकर त्याग दिया ।
2दुःकर करणी हो कीधी आप दयाल, ध्यान सुधारस सम दम मन गली । संग त्याग्यो हो जाणी माया-जाल, अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।। २ ।।
प्रभो ! तुमने दुष्कर करणी की, शम और दम के द्वारा ध्यानरूपी अमृत-रस में मन को लीन कर दिया । आसिक्त को मायाजाल समझकर छोड़ दिया ।
3वीर रसे करी हो कीधी तपस्या विशाल, अनित्य अशरण-भावन अशुभ निरदली । जग झूठो हो जाण्यो आप कृपाल, अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।। ३ ।।
प्रभो ! तुमने वीर रस के द्वारा विपुल तपस्या की, अनित्य और अशरण भावना से असत्कर्मों का निर्दलन किया तथा जागतिक सम्बन्धों को अवास्तविक समझा ।
4आतम मिंत्री हो सुखदाता सम परिणाम, एहिज अमित्र असुभ भावे कलकली । एहवी भावन हो भाई जिन गुण-धाम, अभिनंदन वांदू नित्यमनरली ।। ४ ।।
समभाव में प्रतिष्ठित आत्मा मित्र है, सुखदायक है । अशुभ भावों में निमग्न यही आत्मा शत्रु है । हे गुणधाम ! तुम ऐसी भावना से भावित थे ।
5लीन संवेगे हो ध्यायो शुकल ध्यान, क्षायक-श्रेणी चढी हुवा केवली । प्रभु पाम्या हो निरावण सुज्ञान, अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।। ५ ।।
प्रभो ! मुमुक्षा में लीन होकर तुमने शुक्लध्यान किया । तुम क्षायिक श्रेणी पर आरूढ़ होकर केवली बने—निरावण ज्ञान प्राप्त किया ।
6उपशम-रस नीं हो बागरी प्रभु बाण, तन मन प्रेम पाया जन सांभली । तुम वच धारी हो पाम्या परम कल्याण, अभिनंदण वांदूनित्य मनरली ।। ६ ।।
प्रभो ! तुमने उपशम रस-भरी वाणी से उपदेश दिया । उसे जिन लोगों ने सुना, उनके तन-मन प्रीणित हो उठे । जिन्होंने उसे हृदयंगम किया, उनका कल्याण हो गया ।
7जिन अभिनंदण हो गाया तन मन प्यार, संवत उगणीसै भाद्रवै अघ दली । सुदि इग्यारस हो हुवो हर्ष अपार, अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।। ७ ।।
मैंने आन्तरिक कल्मष दूर कर शारीरिक और मानसिक अनुराग से अर्हत् अभिनन्दन की स्तवना की, इससे मुझे अपार हर्ष का अनुभव हुआ ।