44th Tirthankar
भगवान अभिनंदननाथ
Abhinandannath
वानर
स्वर्ण
Family & Sangha
- संवर
- सिद्धार्था
- अयोध्या
- इक्ष्वाकुवंश
- यक्षेश्वर (ईश्वर)
- कालिका
- 116
- प्रियंगु
Nirvana place
सम्मेद शिखर
View on map ↗Stuti
ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दननाथाय नमः ।
अभिनंदण वांदू नित्य मनरली । तीर्थंकर हो चोथा जग भाण, छांड गृहवास करी मति निरमली । विषय-विटंबण हो तजिया विष फल जाण, अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।। १ ।।
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