1भजियै नित्य स्वामी सुपास ए । सुपास सातमां जिणंद ए, ज्यांनै सेवै सुर नर वृंद ए । सेवक पूरण आश ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। १ ।।
सुपार्श्व प्रभु ! तुम सातवें तीर्थंकर हो । देव और मनुष्य तुम्हारी उपासना कर रहे हैं । तुम उपासकों की आशा पूरी करने वाले हो ।
2ज न प्रतिबोधण काम ए, प्रभु बागरै वाण अमाम ए । संसार स्यू हुवै उदास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। २ ।।
जनता को प्रतिबोध देने के लिए तुमने अनुपम देशना दी । उसे सुनने वाले संसार से उदासीन हो गये ।
3पामैं कामभोग थी उद्वेग ए, बलि उपजै परम संवेग ए । एहवा तुम बच सरस विलास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। ३ ।।
प्रभो ! तुम्हारी वाणी का विलास इतना सरस है कि उसे सुनने वाले काम-भोग से उद्विग्न हो जाते हैं और उनके मन में परम संवेग उत्पन्न हो जाता है ।
4घणी मीठी चक्री न खीर ए, बलि खीर-समुद्र नो नीर ए । एह थी तुम वच अधिक विमास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। ४ ।।
चक्रवर्ती की खीर और क्षीर-समुद्र का नीर ये दोनों बहुत मधुर होते हैं, तुम्हारी वाणी उनसे भी अधिक मधुर थी ।
5सांभल नै जनव्रन्द ए, रोम-रोम में पामै आनंद ए । ज्यांरी मिटै नरकादिक त्रास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। ५ ।।
तुम्हारी वाणी सुनकर जन-समूह रोम-रोम में आनन्द का अनुभव कर रहा है । उस वाणी को सुनने वालों के नरक आदि का संत्रास दूर हो जाता है ।
6तुं प्रभु ! दीन-दयाल ए, तू ही अशरण-शरण निहाल ए । हूं छूं तुम्हारो दास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। ६ ।।
प्रभो ! तुम दीनदयाल हो और अशरण के शरण हो । मैं तुम्हारे चरण का दास हूं ।
7संवत उगणीसै सोय ए, भाद्रवा सुदि तेरस जोय ए । पहुंची मन नीं आश ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। ७ ।।
मेरे मन की आशा पूरी हो गयी ।