Skip to content
‹ Agam Kathas
9 / 21

पूणिया श्रावक

अराजगृह नगर में भगवान्‌ महावीर का उपासक पूणिया श्रावक रहता था। उसकी धर्माराधना प्रशस्त थी, जीवन उन्नत था, पर आर्थिक दृष्टि से वह संपन्न नहीं था। आर्थिक विपन्नता के बावजूद वह किसी का मुंहताज नहीं था। अपने हाथ से परिश्रम कर अपने परिवार की जीविका चलाने में उसे बहुत संतोष का अनुभव होता था।

उपासक पूणिया प्रतिदिन एक सामायिक करता था। उसकी सामायिक उसके जीवन को समता से आप्लावित रखती थी। भगवान्‌ महावीर स्वयं उसकी सामायिक का अपने प्रवचन में उल्लेख करते थे। एक दिन राजा श्रेणिक ने अपने पूर्व निबद्ध नरक के आयुष्य को विफल करने का उपाय पूछा। भगवान्‌ ने कहा—यदि तुम उपासक पूणिया की एक सामायिक खरीद सको तो नरक से अपना बचाव कर सकते हो।

दूसरे दिन प्रात:काल ही राजा श्रेणिक उपासक पूर्णिया की कुटिया में पहुंचा। राजा को बिना किसी कारण और बिना निमंत्रण अपने आंगन में देख पूणिया हर्ष विभोर हो उठा। प्रसन्नता के साथ-साथ वह राजा के अकारण आगमन को एक प्रश्‍नचिह्न बनाए खड़ा था। पूणिया की प्रश्‍नायित आंखों पर गौरव और याचनाभरी निगाह डालते हुए श्रेणिक ने कहा—प्रतिदिन सामायिक करते हो?

पूणिया—हां राजन्‌! सामायिक मेरी जीवन-यात्रा का प्रथम चरण है।

श्रेणिक—तुमने तो बहुत सामायिक की है और कर रहे हो। तुम अपनी एक सामायिक मुझे दे सकते हो?

पूणिया—यह कैसे, महाराज?

श्रेणिक—डरो मत, मैं मुफ्त में नहीं लूंगा। जितना चाहे उतना पैसा ले लो, पर एक सामायिक दे दो।

पूणिया—मेरे पास जो कुछ है वह आपका ही है। मैं आपके किसी काम आ सकूं, इससे बढ़कर क्या बात होगी।

श्रेणिक—तो बोलो, कितना मूल्य है तुम्हारी सामायिक का?

पूणिया—यह तो मैं नहीं जानता।

श्रेणिक—नहीं जानते तो क्या अन्तर पड़ता है? जितना चाहो उतना धन ले लो।

पूणिया—राजन्‌! यह अध्यात्म का सौदा है। इसमें मनगढ़ंत मूल्य का निर्धारण नहीं हो सकता।

श्रेणिक—इसका उचित मूल्य कौन बता सकता है?

पूणिया—महाराज! भगवान्‌ महावीर इस व्यापार के प्रमुखतम व्यवसायी हैं। उनके अतिरिक्त सही मूल्यांकन कौन कर सकेगा?

श्रेणिक—चलो, तुम मेरे साथ। हम दोनों भगवान्‌ के चरणों में पहुंचते हैं।

राजा श्रेणिक पूणिया को साथ ले भगवान्‌ के पास पहुंचा और सारी घटना सुनाकर बोला—भगवन्‌! आप ही त्राता हैं। बताइए, मैं इसे एक सामायिक का कितना मूल्य दूं?

भगवान्‌ दो क्षण मुस्कुराए और बोले—श्रेणिक! एक सामायिक की दलाली करने का मूल्य तुम्हारे राज्य के समग्र वैभव से कई गुना अधिक है। तब सामायिक का मूल्य कितना होगा, तुम स्वयं सोच लो।

भगवान्‌ की बात सुन श्रेणिक नि:श्‍वास छोड़ता हुआ बोला—भगवन्‌! आपने मुझे फुसला दिया। क्या मैं मान लूं कि नरक मेरी भवितव्यता है?

भगवान्‌ ने इस सत्य को स्वीकार किया। वहां उपस्थित जनसमूह भगवान्‌ महावीर द्वारा प्रशंसित पूणिया आवक को अपनी चर्चा का विषय बनाता हुआ अपने घर की ओर चला गया।