सनत्कुमार
चक्रवर्ती सनत्कुमार की रूप-संपदा अनन्य थी। उसके सौन्दर्य की तुलना में देवकुमार भी पीछे रह जाते थे। एक बार इन्द्र ने अपनी सभा में उसके सौन्दर्य की प्रशंसा की। दो देवों के मन में कुतूहल जगा। वे सनत्कुमार को देखने का लोभ संवरण नहीं कर सके। उन्होंने ब्राह्मण का वेश बनाया और प्रात:काल ही चक्रवर्ती के राजमहल में पहुंच गए। देवों ने सनत्कुमार के लावण्य के सबंध में जैसा सुना, वैसा ही पाया। उनकी आंखें क़ृतार्थ हो गई। वे लौटने लगे तो सनत्कुमार ने पूछा—विप्रवरों! आप क्यों आए?
देव बोले—हम आपके सौन्दर्य की महिमा सुनकर आए थे। वास्तव में ही आपका सौन्दर्य प्रशंसा के योग्य है।
चक्रवर्ती सनत्कुमार ने यह बात सुनी। उन्हें अपने सौन्दर्य का गर्व हो गया। वे बोले—द्विजवरो! मेरा रूप देखना है तो अभी नहीं, राजसभा में देखना। अभी तो मैंने स्नान भी नहीं किया है?
देव बोले—आपकी कृपा होगी तो हम उस समय भी आपकी रूपसुधा का पान कर लेंगे।
चक्रवर्ती ने उनको दो घंटे बाद राजसभा में उपस्थित होने के लिए कहा। देव निश्चित समय पर आए, पर अब सम्राट का सहज लावण्य समाप्त हो चुका था। देवों को आश्चर्य हुआ। उन्होंने सम्राट का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित किया। देहाभिमान के इस भयंकर दुष्परिणाम से सम्राट का मन रूपान्तरित हो गया। वे उसी समय छह खण्ड का साम्राज्य छोड़कर प्रव्रजित होने का संकल्प स्वीकार कर राजप्रासाद से निकल पड़े। सम्राट सनत्कुमार अब मुनि सनत्कुमार हो गए थे। पारिवारिक जन छह माह उनके पीछे घूमते रहे। पर मुनि को अपने प्रति पुन: अनुरक्त नहीं कर सके। एक ओर मुनि-जीवन की कठिन चर्या, दूसरी ओर रोगों का प्रवर्धमान उपद्रव। मुनि सनत्कुमार शान्तभाव से वेदना सहन कर रहे थे। इन्द्र ने मुनि की कष्ट-सहिष्णुता की प्रशस्ति की। वे दोनों देव फिर वैद्यों का रूप बना उपस्थित हुए और मुनि के समक्ष परिचर्या करने का आग्रह करने लगे। मुनि ने स्वीकृति नहीं दी तो देव बोले—मुनिवर! हम आपकी शरीरिक वेदना देख द्रवित हो रहे हैं। आप हम पर करुणा करें।
मुनि ने उनके सामने ही अपना थूक निकाला और अंगुली पर लगाया। अंगुली सोने की तरह चमकने लगी। मुनि बोले—तुम्हारी औषधि में इतनी क्षमता है? मैं चाहता तो इन रोगों को कभी शान्त कर लेता, किन्तु इन रोगों का सम्बन्ध शरीर से है आत्मा से नहीं। मुझे तो आत्म-रमण करना है। ऊर्ध्वारोहण करना है। देव यह सुन मुनि के प्रति श्रद्धा से नत हो गए। मुनि ने वर्षों तक साधना कर अन्त में मुक्तिश्री का वरण कर लिया।