केसरिया मोदक
सुव्रत का जन्म एक धनी परिवार में हुआ था। उसे सभी प्रकार के सुख साधन उपलब्ध थे। उसका लालन-पालन वैभवपूर्ण ढंग से हुआ था। घर में अनेक प्रकार के पकवान बनते रहते थे। लेकिन सुव्रत को केसरिया मोदक ही अधिक पसन्द थे। जब भी उसकी इच्छा होती, केसरिया मोदक तैयार हो जाते। इस प्रकार लाड़-प्यार और सुख-सुविधा में पलता हुआ सुव्रत बड़ा हो गया।
एक बार उस नगर में आचार्य शुभंकर अपने संघ सहित पधारे। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर सुव्रत प्रव्रजित हो गया। तप:साधना करते हुए अपनी प्रखर प्रतिभा से सम्पूर्ण आगम साहित्य का अभ्यास कर लिया। उसकी लगन, रुचि तथा—तप:साधना की साथी मुनि भी प्रशंसा करते। एक बार आचार्य शुभंकर राजगृह नगर में अपने संघ सहित पधारे। उस दिन राजगृह में मोदकोत्सव था। सभी घरों में मोदक बन रहे थे। कहीं दाल के तो कहीं बेसन के, कहीं केसरिया मोदक।
आचार्य देव के आगमन के कुछ समय बाद श्रावक समुदाय आया और क्षमा मांगते हुए आचार्यजी से निवेदन किया—'क्षमा करें। गुरुदेव! लोग आपके स्वागतार्थ उपस्थित नहीं हो सके। आज मोदकोत्सव है। उसमें लगे रहे।'
आचार्य ने पूछा—'मोदक' किस वस्तु के बनते हैं?'
श्रावकों ने बताया—'यह तो अपनी आर्थिक स्थिति और रुचि पर निर्भर है। दाल, बेसन आदि कई प्रकार के मोदक बनते हैं और केसरिया मोदक भी बनते हैं। केसरिया मोदक स्वादिष्ट अधिक होते हैं। लेकिन उसमें खर्च अधिक पड़ता है।'
आचार्यदेव ने सोचा कि मोदक गरिष्ठ भोजन है। इनको खाने से स्वाध्याय और ध्यान में चित्त एकाग्र नहीं हो सकेगा। इसलिए उन्होंने उपवास ग्रहण किया और अन्य मुनियों को भी ऐसी ही प्रेरणा दी। उन सबने भी उपवास का नियम कर लिया। लेकिन सुव्रत मुनि ने ज्यों ही केसरिया मोदकों का नाम सुना—उनके सुप्त संस्कार जागृत हो गए। उन्होंने उपवास नहीं किया और गुरुदेव से आज्ञा लेकर गोचरी के लिए चले।
मुनिजी प्रत्येक घर में जाते और देखते कि केसरिया मोदक हैं या नहीं? दोपहर से संध्या तक घूमते रहे। लेकिन उन्हें केसरिया मोदकों का योग प्राप्त नहीं हुआ। अब तो सुव्रत मुनि विहल हो गए। रसगृद्धता उन पर इतनी सवार हो गई कि उन्हें समय का ध्यान नहीं रहा। रात होने पर भी सड़कों पर चक्कर लगाते रहे। उनके मुंह से 'केसरिया मोदक, केसरिया मोदक' शब्द ऐसे निकल रहा था, जैसे कोई बेभान दशा में उन्मत्त व्यक्ति प्रलाप कर रहा हो।
श्रावक जिनभद्र ने ये शब्द सुने। उसने खिड़की से देखा। मुनि को इस रूप में देखकर वह चौंका। वह समझ गया कि केसरिया मोदक न मिलने से मुनि पर अप्रिय असर हुआ है और ये अपना सन्तुलन खो बैठे हैं। उसने अपना कर्तव्य समझा और मुनि सुव्रत को आदर सहित घर के भीतर ले गया। उन्हें केसरिया मोदक बहराए। जब मुनिजी चलने लगे तो उसने विनम्र स्वर में पूछा—'गुरुदेव! कितना समय हुआ है?' मुनि ने समय जानने के लिए ज्योंही आकाश की ओर दृष्टि उठाई तो तारों भरी रात को देखकर वहीं खड़े हो गये। मन ही मन कहने लगे—यह क्या? आधी रात का समय और मैं गोचरी हेतु भटक रहा हूं।' पश्चात्ताप उभर आया। श्रावक जिनभद्र ने विनयपूर्वक प्रार्थना की—'भगवन्! रात्रि मेरे उपासना गृह में बिताएं तो उचित रहेगा। इस आधी रात के समय गमन उचित नहीं है।'
मुनिश्री उपासना गृह में ही ठहर गये। चिन्तन चला-मोदकों के चक्कर में मैं सब कुछ भूल गया। साधु-मर्यादा में दोष लगाया। मुझे आत्म-साधना और आत्मशुद्धि करनी चाहिए थी। मैं रसगृद्धता में फंस गया। चिन्तन ऊर्ध्वमुखी हुआ और सुव्रत मुनि को वहीं कैवल्य प्राप्त हो गया। सभी आत्मदर्शी मुनि सुव्रत और विवेकी श्रावक जिनभद्र की प्रशंसा करने लगे।