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‹ आगम कथाएं
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राजीमती

राजीमती महाराज उग्रसेन की पुत्री थी। वह रूपलावण्य सम्पन्न सुशील कन्या थी। उसका विवाह यदुवंशी राजा समुद्रविजय के पुत्र अरिष्टनेमि के साथ निश्‍चित हो चुका था। सब लोग उत्सुकता से विवाह की प्रतीक्षा कर रहे थे। निर्धारित समय पर बारात चली। अरिष्टनेमि एक विशेष हाथी पर आरूढ़ थे। नगर के मध्य प्रवेश करते ही उन्होंने पशुओं का करुण-क्रन्दन सुना। अरिष्टनेमि ने अपने महावत से पूछा—'ये पशु क्रंदन क्यों कर रहे हैं? महावत बोला—'राजकुमार! आपकी बारात में आये बारातियों के आतिथ्य के लिए इन पशुओं का उपयोग होगा। इसी भय से ये आक्रन्दन कर रहे हैं।' अरिष्टनेमि ने यह सुना। उनका मन प्रकम्पित हो गया। उन्होंने कहा—'यह कैसा आनन्द जहां हजारों मूक और निरीह पशुओं का वध किया जाता है।' उन्होंने महावत को पुन: मुड़ने का आदेश दिया। महावत अवाक्‌ रह गया। उसने अरिष्टनेमि को समझाने का प्रयास किया। अन्य लोगों ने भी दबाव डाला। पर सब व्यर्थ। आखिर हाथी मुडा और वे अपने नगर सोरियपुर पहुंच गये। माता-पिता से अनुमति लेकर दीक्षित हो गए।

राजीमती ने जब अरिष्टनेमि द्वारा नगर में प्रवेश कर पुन: लौटने की बात सुनी तो वह एक बार मूर्च्छित हों गई। पर शीघ्र ही उसने अपने को संभाल लिया। उसने अध्यात्म के पथ पर अरिष्टनेमि का अनुगमन करने का संकल्प किया और उसके लिए उचित समय की प्रतीक्षा करने लगी। जब अरिष्टनेमि केवलज्ञान प्राप्त कर अर्हत्‌ बन गए तब राजीमती भी अनेक राजकन्याओं के साथ दीक्षित हो गई।

एक बार भगवान्‌ अरिष्टनेमि रैवतक पर्वत पर विराजमान थे। साध्वी राजीमती अनेक साध्वियों के साथ उन्हें वन्दन करने जा रही थी। अचानक ही मार्ग में वर्षा प्रारम्भ हो गई। भयंकर तूफान था। साध्वियां एक-दूसरे से ओझल हो गई और अपना-अपना बचाव करने हेतु इधर-उधर गुफाओं में चली गई।

राजीमती जिस गुफा में थी वहां पूरा अंधेरा था। उसने अपने वस्त्र सुखाने के लिए फैलाए। उस गुफा में रथनेमि पहले से ही खड़े थे। रथनेमि भगवान्‌ अरिष्टनेमि के लघु भ्राता थे। वे राजीमती के प्रति पहले से ही आकृष्ट थे। भगवान्‌ अरिष्टनेमि के दीक्षित हो जाने के बाद उन्होंने राजीमती को पाने का प्रय भी किया। पर वे असफल रहे। आज जब बिजली की चमक से राजीमती का दिव्य रूप रथनेमि के सामने प्रकट हुआ तब वे अपना भान भुला बैठे और धर्म एवं समाज की वर्जनाओं को तोड़कर एक बार फिर राजीमती के सामने प्रणय निवेदन कर दिया।

राजीमती चौंकी। रथनेमि को अपनी ओर बढ़ता देखकर वह क्षण भर के लिए सहमी किन्तु उसी समय अपने साहस को बटोरकर उसने रथनेमि को प्रतिबोध देते हुए कहा—'धिक्कार है आपको, जो वमन को पीने की इच्छा करते हैं। मैं आपके ज्येष्ठ भ्राता अरिष्टनेमि के द्वारा वान्त (छोड़ी गई) हूं। मुझे ग्रहण करने की इच्छा क्या वान्त का ग्रहण करना नहीं है?'

'मुने! हम दोनों उत्तम कुल में जन्मे हैं। मैं भोजवृष्णि की पुत्री हूं और आप अन्धकवृष्णि के पुत्र हैं। हमें अगन्धन कुल के सर्प की भांति छोड़े हुए भोगों के प्रति आकृष्ट नहीं होना है। आप संयम का मूल्य आंकें। यों जिस किसी को देखकर आप विचलित होते रहेंगे तो साधुत्व का पालन कैसे करेंगे?'

राजीमती की इस शिक्षा ने जादू का काम किया। मुनि रथनेमि पुन: संयम में उसी तरह स्थिर हो गए जैसे अंकुश से हाथी। उन्होंने प्रभु नेमिनाथ के पास जाकर अपनी इस भूल की आलोचना की और निर्विकार संयम की साधना करके केवलज्ञान प्राप्त किया।