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विजय-विजया

श्रेष्ठीपुत्र विजय और श्रेष्ठीपुत्री विजया बचपन से ही धार्मिक संस्कारों से अनुप्राणित थे। वे समय-समय पर सामायिक, स्वाध्याय, ध्यान आदि करते रहते थे। जब कभी साधु-साध्वियों का सान्निध्य उपलब्ध होता, वे अन्य कार्यों को गौण कर उनका उपदेश सुनते थे। एक बार शहर में सन्तों का आगमन हुआ। उन्होंने अपने प्रवचन में विशेष रूप से ब्रह्मचर्यं का विश्‍लेषण किया। विजय और विजया प्रभावित हुए। वे पूर्ण ब्रह्मचर्यं का पालन करने की दृष्टि से स्वयं को असमर्थ पा रहे थे। फिर भी उनकी चेतना जागृत थी। बहनों के साथ विजया खड़ी हुई और उसने मन-ही-मन जीवन भर शुक्लपक्ष में ब्रह्मचर्य पालन करने का संकल्प स्वीकार कर लिया। दूसरी ओर कुछ युवक खड़े हुए, उनके साथ विजय भी था। उसने भी जीवन भर कृष्णपक्ष में ब्रह्मचारी रहने का निर्णय ले लिया। मानसिक संकल्प का क्रम था, अत: किसी को दूसरे व्यक्ति के संकल्प का ज्ञान नहीं था।

संयोग ऐसा बना कि विजय और विजया के माता-पिता ने विचार विमर्श कर दोनों का विवाह कर दिय।। उस समय कृष्णपक्ष था। विजय ने अपने संकल्प की बात विजया के सामने रखी। एक बार तो वह अवाक्‌ रह गई। किन्तु दूसरे ही क्षण बोली—'मेरा सौभाग्य प्रबल है। मैं जीवन भर अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करूंगी।' विजय की प्रश्‍नायित आंखों में झांकती हुई विजया बोली—'मैंने जीवन भर शुक्लपक्ष में ब्रह्मचर्य पालने का नियम ले रखा है। कृष्णपक्ष में आप ब्रह्मचारी हैं। इस प्रकार मैं तो सहज रूप से ब्रह्मचारिणी हो गई। पर आप इस बात को लेकर व्यथित न बनें। मैं अपनी इच्छा से आपको अनुरोध करती हूं कि आप दूसरी शादी कर लें।

विजया के इस प्रस्ताव पर विजय मुस्कराता हुआ बोला—'विजये! तुमने मुझे अभी तक पहचाना नहीं है। इसलिए ऐसी बात कर रही हो। तुम जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन कर सकती हो तो मुझे कमजोर क्यों समझती हो? आओ, हम दोनों संकल्प करें कि हम साथ-साथ रहते हुए आजीवन ब्रह्मचारी रहेंगे। पर अपने इस संकल्प को गुप्त रखेंगे। जिस दिन यह रहस्य खुल जाएगा, हम मुनिब्रत स्वीकार कर लेंगे!

विजया अपने पति की साहसपूर्ण उदारता से बहुत प्रसन्न हुई। बारह वर्ष तक वे एक साथ रहे और प्रवर्धमान भावों में ब्रह्मचर्य का पालन करते रहे। उसके बाद विमल केवली द्वारा इस रहस्य को उद्घाटित कर देने पर उन्होंने अपने माता-पिता की अनुमति ले साधु-जीवन स्वीकार कर लिया। उफनते हुए यौवन कीं मस्ती में ऐसा दुष्कर संकल्प स्वीकार कर विजय और विजया ने जो कुर्बानी की उससे वे लाखों-लाखों के लिए श्रद्धेय बन गए।