भृगुपुत्र
इषुकार नगर में भृगु नाम का पुरोहित रहता था। सन्तान के अंभाव में वह अत्यधिक चिन्तित था। एक दिन उसने मुनि का धर्मोपदेश सुना। तत्त्व को समझा। श्रावक व्रत स्वीकार किए। उसने मुनि से ,पूछा—मेरे भाग्य में पुत्र-प्राप्ति है या नहीं?' मुनि ने कहा—'तुम्हारे दो पुत्र होंगे। लेकिन वे बाल्यावस्था में ही संयम स्वीकार कर लेंगे। तुम उनकी दीक्षा में बाधा मत डालना।' समय व्यतीत हुआ। भृगु की पत्नी यशा गर्भवती हुई। दीक्षा के भय से भृगु पुरोहित नगर को छोड़ ब्रजगांव में जा बसा। वहा पुरोहित की पत्नी यशा ने दो पुत्रों को जन्म दिया। पुत्र बड़े हुए। माता-पिता ने सोचा—ये कहीं दीक्षित न हो जाएं। अत: एक दिन उनसे कहा—'पुत्रो! ये जो श्रमण होते हैं वे सुन्दर-सुन्दर बालकों को उठाकर ले जाते हैं। मारकर उनका मांस खाते हैं। तुम दोनों उनके पास कभी मत जाना।'
एक बार दोनों बालक खेलते-खलते गांव से बहुत दूर चले गये। उन्होंने देखा—उसी मार्ग में कुछ साधु आ रहे हैं। बालक भयभीत होकर एक वृक्ष पर चढ़ गये। संयोग से मुनियों ने भी उसी वृक्ष के नीचे विश्राम किया। बच्चों का भय बढ़ने लगा। माता-पिता की शिक्षा स्मृति-पटल पर नाचने लगी। साधुओं ने कुछ विश्राम किया। झोली से पात्र निकाले, भोजन करने लगे। बच्चों ने देखा—मुनियों के पात्र में मांस जैसी कोई चीज नहीं है। मात्र सामान्य भोजन है। बालकों का भय कुछ कम हुआ। उन्होंने सोचा—अहो! ऐसे साधु हमने अन्यत्र भी देखे हैं। चिंतन आगे बढ़ा। जाति-स्मृति ज्ञान उत्पन्न हो गया। वे नीचे उतरे। मुनियों को वन्दना की। मन वैराग्य से भर गया।
माता-पिता के पास गये। दीक्षा की अनुमति मांगने लगे। माता-पिता ने समझाने का बहुत प्रयत्न किया। लेकिन अन्त में हुआ यह कि माता-पिता भी स्वयं संसार की नश्वरता समझ गए। चारों ने एक साथ संयम स्वीकार कर अपने जीवन का कल्याण किया।