मम्मण
महाराज श्रेणिक महारानी चेलणा के साथ बैठे थे। रात अंधेरी थी। बादल घिर आए थे और बिजलियां कौंध रही थीं। बिजली के प्रकाश में रानी चेलणा ने देखा, एक वृद्ध नदी वो किनारे लकड़ियां बीन रहा है। उसे यह देखकर पीड़ा हुई। राजा की ओर अभिमुख हो, वह बोली—'आपके राज्य में कैसे-कैसे दरिद्र लोग हैं! क्या इससे आपकी दानवीरता पर चोट नहीं होती?'
राजा श्रेणिक को आश्चर्य हुआ। उसने अपने अनुचरों को भेज उस व्यक्ति को बुलाकर पूछा—'तू कौन है? इतनी रात गये ऐसी भयंकर सर्दी में इतना श्रम क्यों कर रहा है?'
आगन्तुक बोला—'राजन्! मैं एक सेठ का पुत्र हूं। मेरा नाम मम्मण है। मेरे पास एक बैल है। उसकी जोड़ी का दूसरा बैल तैयार करने के लिए मैं दिन-रात काम करता हूं।'
राजा ने अपने अनुचरों को आदेश दिया—'इसे अपनी वृषभशाला में ले जाओ और इसे जो बैल पसन्द आए, वह इसे दे दो।' मम्मण ने पूरी वृषभशाला का चक्कर लगाया, पर एक भी बैल पसन्द नहीं आया। राजा के रथ से जुतने वाले बैल भी उसने नापसन्द कर दिये। राजा को जब यह सूचना मिली तो उसने मम्मण से कहा—'ऐसा क्या बैल है तुम्हारा?'
मम्मण बोला—'महाराज! आप मेरे घर पधारने की कृपा करें। आपने मुझे सुखी बनाने का संकल्प किया है तो इतनी उदारता दिखाएं। इस गरीब के आंगन की पवित्र करें।'
राजा के मन में करुणा और कौतुक दोनों थे। वह मम्मण के साथ उसके घर पहुंचा। तलघर में जाकर देखा तो राजा की आंखें चुंधिया गयीं। वहां तो रत्नजड़ित बैल खड़ा था, जिसके प्रकांश से भूमिगृह का अंधेरा समाप्त हो गया। राजा श्रेणिक बोला—'अरे मूर्ख! इसकी जोड़ी का बैल बनाने जितना वैभव तो राज्य के भंडार में भी नहीं है। तू भी बड़ा विचित्र आदमी है। भूखा रहकर ऐसे बैलों की जोड़ी बनाता है। क्या काम आएंगे ये बैल?
राजा ने मम्मण के बारे में रानी को जानकारी दी, तो वह भी बैल देखने के लिए गई। उसके प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उसने कहा—'यह व्यक्ति दरिद्र नहीं, लोभी है, कंजूस है। इसका दु:ख दूर करने वाला संसार में कोई नहीं है।'