मुख्य सामग्री पर जाएँ
‹ आगम कथाएं
14 / 21

नन्दीषेण

मगध देश के नन्दी ग्राम में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। टूटी-फूटी झोपड़ी उसका निवास-स्थान था। उसके एक पुत्र था। उसका नाम नन्दीषेण था। नन्दीषेण का शरीर बेढंगा था—उसका पेट मोटा था, नाक रेटी थी, कान कटा हुआ था, आंखें धंसी हुई थीं, केश पीले थे और रंग काला था। उसे देखकर ऐसा लगता था मानो कुरूपता ने अवतार ले लिया हो। नन्दीषेण थोड़ा बड़ा हुआ। माता-पिता का स्वर्गवास हो गया वह अकेला रह गया। उसे उसका मामा अपने घर ले आया। वहां वह घर का कार्य करता, पशुओं को चराता और अपना पेट भरता।

एक बार उसके मामा के भाई की शादी का प्रसंग आया। उस वातावरण में वह भी विवाह करने के लिए आतुर हो गया। उसकी मनोदशा की जानकारी पाकर मामा ने कहा—'मेरे सात पुत्रियां हैं। उनमें से जो भी तुम्हारे साथ शादी करना चाहे, मैं उसी के साथ तुम्हारी शादी कर दूंगा। तुम किसी को तैयार कर लों।' दुर्भाग्य से किसी ने भी उसके साथ विवाह की स्वीकृति नहीं दी। उसे अपमानित होकर लौटना पड़ा।

इस अपमान से उसका दिल टूट गया। अपने दु:खी जीवन का अन्त करने के लिए उसने पहाड़ से कूदकर आत्महत्या करने का निर्णय कर लिया। वह अपने संकल्प को क्रियान्वित कर ही रहा था कि उसे एक मुनि दिखाई दिए। मृत्यु से पहले मुनिदर्शन का अवसर पाकर उसे प्रसन्नता हुई। वह मुनि के पास गया। मुनि ने उसका परिचय पूछा। उसने सब कुछ सच-सच बता दिया। मुनि ने उसको उपदेश दिया। संयोग ते उसके विचारों में,वैराग्य की सरिता प्रवाहित हो गई। उसने साधु-जीवन दीकार कर जीवनपर्यन्त बेले-बेले की तपस्या का व्रत स्वीकार किया। तपस्या के साथ रोगी, बाल, वृद्ध की सेवा में अपने जीवन को समर्पित हर दिया। सेवा-भावना की सौरभ से उसके जीवन का कण-कण महक उठा।

इन्द्र ने अपनी सभा में नन्दीषेण की सेवा की सराहना की। एक देव के भीतर दबी ईर्ष्या की वृत्ति जाग गई। वह नन्दीषेण की परीक्षा के लिए चल पड़ा। रोगग्रस्त साधु का रूप बनाकर रत्‍नपुर नगर के बाहर उद्यान में ठहर गया। एक अन्य साधु का रूप बनाकर वह नन्दीषेण के पास आया। नन्दीषेण मुनि पारणे के लिए बैठे ही थे। इतने में साधुरूप देव ने मुनि की भर्त्सना करते हुए कहा—'सेवाभावी साधु नन्दीषेण तुम्ही हो क्या? देख लिया तुम्हारा सेवाभाव। गुरुदेव अतिसार के रोग से पीड़ित हैं। वे शरीर से कृश: काय हैं। उठने में असमर्थ हैं और तुम यहां बैठे भोजन में आसक्त बने हो।'

नन्दीषेण मुनि ने तत्काल खड़े हो मुनि की वन्दना की। अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी और बोले—'मुनिवर! कहां हैं, गुरुदेव? मैं सेवा के लिए प्रस्तुत हूं। यह कहते हुए भिक्षापात्र को वहीं छोड़ मुनि के साथ उद्यान में आ गए।

नन्दीषेण मुनि ने वृद्ध मुनि को वन्दना कर उनके सारे शरीर की सफाई की। निवेदन किया—'गुरुदेव! आपका शरीर बहुत कृश हो गया है। अत: स्थान पर पहुंचकर विश्राम करावें।'

वृद्ध मुनि कुपित होकर बोले—'केवल सेवा का मुखौटा ओढ़े हो। सेवा करने से जी चुराते हो, तुम्हें दिखाई नहीं देता, मैं ऐसी स्थिति में कैसे चल सकता हूं?

नन्दीषेण ने विनम्रता से अपनी भूल स्वीकार की और मुनि को कंधों पर बिठाकर गन्तव्य स्थान की ओर चला। मार्ग में मुनि ने नन्दीषेण का सारा शरीर मल-मूत्र से भर दिया। लेकिन नन्दीषेण मुनि के मानस में एक क्षण के लिए भी घृणा, ग्लानि और रोष का भाव नहीं आया। स्थान पर पहुंचकर मुनि ने रुग्ण मुनि से कहा—'गुरुदेव! मार्ग में मेरी असावधानी से आपको कष्ट हुआ हो तो आप मुझे क्षमा कर दें।'

नन्दीषेण के सामने देव झुक गया। मूल रूप में प्रकट हो, अपने आगमन का उद्देश्य बताते हुए कहा—'इन्द्र ने देवसभा में तुम्हारी सेवाभावना की प्रशंसा की थी। मैं तुम्हारी परीक्षा करने आया था। तुम अपनी परीक्षा में खरे उतरे हो। यों कहता हुआ वह अन्तर्धान हो गया।