शकडालपुत्र
शकडालपुत्र पोलासपुर का ऋद्धिसंपन्न कुंभकार था। बर्तन बनाना और बेचना उसका प्रमुख कार्य था। गोशालक के सिद्धान्तों का वह अनुयायी था। एक दिन अशोक वाटिका में बैठा वह धार्मिक चिन्तन कर रहा था। उस समय आकाश से एक देव ने कहा—देवानुप्रिय! कल तुम्हारे यहां महामाहन आने वाले हैं। वे त्रिकालदर्शी जिन भगवान् हैं। तुम उनकी उपासना करना। शकडालपुत्र ने सोचा—महामाहन जिन भगवान् तो मेरे धर्माचार्य गोशालक ही हैं। लगता है, वे कल यहां आएंगे।
दूसरे दिन उसे संवाद मिला-नगर के सहस्राम्र वन में भगवान् महावीर पधारे हैं। यह सुन शकडालपुत्र ने सोचा—यह क्या हुआ? मुझे तो गोशालक के आने की सूचना मिली थी। देववाणी असत्य तो नहीं होती। खैर! भगवान् महावीर के पास मुझे चलना चाहिए।
वह भगवान् के दर्शन के लिए गया। देशना के बाद भगवान ने पूछा—शकडालपुत्र! कल देव ने तुमको संकेत दिया था। तुमने उसका अर्थ गोशालक समझा था।
शकडालपुत्र ने कहा—भगवन्! आप जो कह रहे हैं, वह सही है। अब मेरी प्रार्थना है कि आप मेरी कुम्भकारशाला में पधारें। प्रार्थना स्वीकार कर भगवान वहां पधारे।
गोशालक का अनुयायी होने के कारण शकडालपुत्र का नियतिवाद में विश्वास था। भगवान् ने उसको समझाने के लिए कहा—शकडालपुत्र! ये मिट्टी के बर्तन कैसे बने हैं?
उसने कहा—ये तो बनने थे, बन गए।
भगवान् ने फिर प्रश्न किया—यदि कोई इन बर्तनों को फोड़ दे, चुरा ले या तुम्हारी पत्नी अग्निमित्रा के साथ कोई बलात्कार करे, तो उस समय तुम क्या करोगे?
शकडाल—उस समय मैं कठोर दण्ड दूंगा।
भगवान्-क्यों? ऐसा क्यों करोगे? जो होना है, वह तो होता रहेगा। यह तुम्हारा सिद्धान्त है।
शकडालपुत्र मौन हो गया। नियतिवाद की एकान्त मान्यता की अनुपयोगिता स्पष्ट समझ में आ गई। उसने भगवान् से सही तत्त्व को समझकर श्रावक के बारह व्रत स्वीकार किए।
जब गोशालक को इस बात का पता लगा तो वह चिन्तित हो उठा। शकडालपुत्र को समझाने के लिए वह पोलासपुर आया। शकडालपुत्र धर्म-ध्यान में लीन था। गोशालक ने भेदनीति अपनाते हुए मुक्त कण्ठ से भगवान् महावीर का गुणानुवाद किया।
गोशालक के मुख से गुणानुवाद सुनकर शकडालपुत्र ने गोशालक को भगवान् के साथ शास्त्रार्थ करने को कहा। गोशालक ने इसके लिए अपने को असमर्थ बताया।
शकडालपुत्र ने कहा—आप मेरे धर्माचार्य, धर्मगुरु, भगवान् महावीर का गुणानुवाद करते हैं। इसलिए मैं कुंभकारापण में शय्या संस्तारक के लिए आपको आमंत्रित करता हूं, अन्य कोई प्रयोजन नहीं है।
शकडालपुत्र श्रावकधर्म में विशेष लीन रहने लगा। एक दिन वह पौषधशाला में बैठा था। उस समय रौद्ररूप धारण कर एक देव उसे चलित करने आया। वह बोला—'शकडालपुत्र! तू यदि धर्म नहीं छोड़ता है तो मैं तेरे बड़े लड़के के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा। तैल से तेरा शरीर सींचूंगा। तू उस असह्म पीड़ा से प्राण छोड़ देगा।'
देवता ने वैसा ही किया। उसके दूसरे, तीसरे पुत्र को भी मार डाला। शकडालपुत्र फिर भी अविचल रहा। अन्त में उसकी पत्नी अग्निमित्रा को मारने दौड़ा। यह देख शकडालपुत्र का मन विचलित हो गया। वह अपनी पत्नी की सुरक्षा के लिए दौड़ा। उस समय एक खम्भे से टकरा गया। उसकी चिल्लाहट सुन अग्निमित्रा अन्दर से आई। अपने पति से सारी बात सुनकर बोली—'लगता है कोई देव आपकी परीक्षा करने आया था। आप चिन्ता न करें। सब कुशल हैं। आप अपने व्रत में दृढ़ता रखें। जो अतिचार लगा है, उसकी आलोचना करें।
शकड़ालपुत्र पुन: धर्म में दृढ़ बना। पत्नी के प्रति जो अनुरक्ति थी, उसे भी मिटाने का प्रयत्न करने लगा। श्रावक की ग्यारह प्रतिमाए धारण कीं। अन्त में समाधिपूर्वक मृत्यु को प्राप्त कर सौधर्म देवलोक में देव बना।