मुनि संजय
संजय नाम का राजा था। उसका आचरण नाम से सर्वथा विपरीत असंयत था। शिकार का वह बड़ा शौकीन था। शिकार किए बिना उसे चैन ही नहीं मिलता था। वह प्राय: हिरणों और खरगोशों का शिकार किया करता था। एक दिन वह नगर से दूर जंगल में शिकार खेलने गया। हिरणों को निशाना बनाकर उसने तीर चलाया। तीर लगने से एक मृग उछला और निकट ही ध्यान में खड़े मुनि के चरणों में जाकर गिर गया। राजा अपने शिकार को पाने के लिए वहां पहुंचा और मुनि के चरणों में उसे देखकर भयभीत हो गया। व्यक्ति धार्मिक हो या अधार्मिक, साधु-संतों के शाप का भय सबको बना रहता है।
राजा संजय कभी जैन मुनियों से मिला नहीं था। तापसों और संन्यासियों के सम्बन्ध में उसे थोड़ी-बहुत जानकारी अवश्य थी। इस दृष्टि से उसने सोचा—यह मृग इन मुनिजी का है। अब पता नहीं ये मेरा क्या कर देंगे? इस भय से सहमता हुआ वह हाथ जोड़कर बोला—मुने! मैं आपका अपराधी हूं। आपके मृग का हत्यारा हूं। मुझे ज्ञात नहीं था कि यह आपका शरणागत है। थोड़ा भी पता होता तो मैं ऐसा काम कभी नहीं करता। अब तो जो हो गया, सो हो गया। आप करुणा कर मुझे माफ कर दें।
मुनि ध्यान में खड़े थे। राजा की करुण पुकार सुनकर उन्होंने नयन खोले तो देखा राजा सामने खड़ा थर-थर कांप रहा है। मुनि ने उसकी मन:स्थिति का अध्ययन कर एक पद्य कहा—
अभओ पत्थिवा! तुब्मं अभयदाया भवाहि य।
अणिच्चे जीवलोगम्मि किं हिंसाए पसज्जसि?
राजन्! डरो मत। मैं तुझे अभयदान देता हूं। पर इसके साथ यह अपेक्षा भी करता हूं कि तुम भी अभयदाता बनो। अपनी ओर से किसी प्राणी की हत्या मत करो। राजन्! यह संसार अनित्य है। कितना जीना है तुझे इस संसार में, फिर तुम हिंसा में आसक्त क्यों हो रहे हो?
मुनि के उपदेश से राजा प्रतिबुद्ध हुआ। उसे अपने कृत्य पर अनुताप हुआ। उसका मन बदला और उसने जीवन भर निरपराध प्राणियों का वध करने का परित्याग कर दिया। न जाने सत्संग का कौन-सा क्षण ऐसा हो जाता है, जो व्यक्ति के जीवन को बदल देता है।