नमि राजर्षि
मिथिला नगरी में नमि राजा राज्य करता था। एक बार उनके शरीर में दाह ज्वर उत्पन्न हुआ। पूरे शरीर में दाह का तीव्र प्रभाव था। चिकित्सा के लिए वैद्यो को बुलाया गया। उन्होंने जी-तोड़ श्रम किया पर ज्वर शान्त नहीं हुआ। शरीर का ताप जिस मात्रा में बढ़ रहा था, मन भी उतना ही संतप्त हो रहा था।
वैद्यों ने परामर्श दिया—शरीर पर चन्दन का लेप कर दिया जाए। रानियों ने अपने हाथों से चन्दन घिसना शुरू किया। चन्दन घिसने से हाथों की चूड़ियां खनक उठीं। चूड़ियों के शब्द राजा के लिए असह्य हो उठे। राजा की वेदना का पता लगते ही रानियों ने एक-एक चूड़ी हाथ में रखकर शेष सभी चूड़ियां उतार दीं। शब्द बन्द हो गए। राजा ने पूछा—चन्दन घिक्षमा बन्द कर दिया है? परिचारकों ने कहा—चन्दन घिसा जा रहा है। पर अब रानियों के हाथों में एक-एक चूड़ी है। अत: शब्द नहीं होता।
राजा का चिंतन इस रहस्य में उलझ गया। वह सोचने लगा—जहां अनेक हैं, वहां द्वन्द है। संघर्ष का मूल है राग और द्वेष। शरीर और आत्मा दो हैं, इसीलिए वहां वेदना है। शरीर छूट जाए तो वेदना को अवकाश ही नहीं है। चिन्तन की एकाग्रता बढ़ी। रोग का उपशमन हुआ। नमि राजा अपने राज्य, वैभव, अन्त:पुर सबको छोड़ मुनि बन गए और एकत्व भावना से भावित हो आत्मलीन हो गए। राजर्षि की परीक्षा करने के लिए इन्द्र ब्राह्मण का वेश बनाकर आया। उसने अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा मिथिला जलती हुई दिखायी और राजर्षि को संबोधित कर बोला—मुने! तुम्हारी आंखों के सामने मिथिला जल रही है। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं गिर रही हैं। अन्त:पुर में रानियां क्रंदन कर रही हैं। तुम एक बार आंखें उठाकर देखो तो सही। तुम्हारी आंखों में अमृत है। एक बार देखने मात्र से यह धधकती ज्वाला शान्त हो जाएगी। तुम एक बार आंख उठाकर देख तो लो।
राजर्षि ने उत्तर दिया—प्रियवर! मैं अपने आप में हूं। मिथिला के जलने से मेरा कुछ नहीं जलेगा। मेरा इस संसार में कोई नहीं है। मेरे आत्मगुणों को जलाने वाला कोई नहीं है। फिर मैं मिथिला की चिंता क्यों करू? राजर्षि के इस स्पष्ट उत्तर ने इन्द्र को प्रभावित किया। वह अपने मूल रूप में प्रकट हुआ। राजर्षि की प्रशंसा की और उसके जन्म को सफल मान वहां से अदृश्य हो गया।