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‹ आगम कथाएं
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मेघकुमार

मेघकुमार राजा श्रेणिक का पुत्र था। उसकी माता का नाम धारणी था। माता को गर्भकाल में अकाल मेघ की इच्छा हुई, अत: पुत्र का नाम मेध रखा गया। एक दिन राजगृह में भगवान्‌ महावीर का आगमन हुआ। सब लोग भगवान्‌ को वन्दना करने जा रहे थे। मेघ भी गया। भगवान्‌ की वाणी सुनी। उसका मन उस वाणी से प्रतिबुद्ध हो गया। वह भगवान्‌ के निकट आकर बोला—'भंते! मैंने आपका प्रवचन सुना है। मैं उसमें श्रद्धा करता हूं'। उसमें प्रतीति करता हूं और आपके पास प्रव्रजित होना चाहता हूं भगवान्‌ ने दीक्षा की स्वीकृति दे दी। मेघकुमार घर आया और माता-पिता के समक्ष अपनी भावना रखी। माता का सहज ममत्व उभर आया। वह बोली—'वत्स! तू मेरी आशा का केन्द्र है। तेरे बिना मेरी क्या दशा होगी। वत्स! मैं तुझे जीते जी आज्ञा नहीं दे सकती। जब तक हम जीवित हैं तू सांसारिक सुखों का भोग कर। हमारे कालधर्म को प्राप्त हो जाने के बाद तुम दीक्षित हो जाना।'

मेघ ने कहा—'मां! मौत का क्या पता, कौन पहले चला जाए। संसार दु:खों का घर है'।

इस प्रकार माता-पिता को समझाकर वह दीक्षा के लिए भगवान्‌ महावीर के चरणों में उपस्थित हो गया। मेघ भगवान्‌ के पास मुनि बन गया। भगवान्‌ ने कहा—'मेघ! अब तुम्हें सारा कार्य संयमपूर्वक करना है। चलना, बैठना, सोना, खड़ा होना, भोजन करना, बोलना—सभी कार्य यतनापूर्वक करने हैं।

मुनि जीवन का प्रथम सुखद दिन बीता। रात्रि का आगमन हुआ। सभी मुनि अपने-अपने स्थान पर चले गये। मेघ का शयन-स्थान द्वार के बीच में था। रात को साधुओं का गमनागमन होता रहा जिससे उसे एक क्षण भी नींद नहीं आयी। मन में नाना प्रकार की कल्पनाएं उभरने लगीं। उतार-चढ़ाव आने लगे। उसने मन में सोचा—तब ये मुनि मेरे साथ प्रेमपूर्वक कितनी ज्ञान-चर्चा करते थे, जब मैं गृहस्थ में था। किन्तु आज ये कोई मुझे सम्मान नहीं देते हैं। कितने स्वार्थी हैं? मुझे इनके साथ नहीं रहना है। मैं प्रात:काल भगवान्‌ के पास जाकर अपनी बात स्पष्ट कर दूंगा।

प्रात: होते ही वह भगवान्‌ के सम्मुख उपस्थित हो गया। भगवान्‌ उसकी मन:स्थिति को जान गये थे। उन्होंने अपने नवदीक्षित शिष्य को सम्बोधित कर कहा—'मेघ! इतनी छोटी बात में यह कायरता! क्या तुझे अपना पिछला जन्म याद नहीं है? मेरुप्रभ हाथी के भव में तूने जंगल की दावाग्‍नि से वचने के लिए एक योजन लम्बे-चौड़े क्षेत्र को घास-फूस से रहित बनाया था। जंगल में आग लगी। हवा के झोंकों से आग आगे बढ़ी। जंगल के पशु बचाव के लिए उस क्षेत्र में इकट्ठे होते जा रहे थे। वह लम्बा-चौड़ा मैदान इस प्रकार भर गया था कि एक पांव रखने के लिए भी स्थान खाली नहीं रहा। तुमने खुजलाने के लिए पैर ऊपर उठाया, त्यों ही एक खरगोश वहां आकर बैठ गया।

तुमने पैर नीचे रखना चाहा, पर खरगोश को देखकर सोचा—'जमीन पर पांव रखूंगा तो यह खरगोश कुचलकर मर जाएगा। इससे मेरी आत्मा पाप से भारी हो जाएगी! अहिंसा की विशुद्ध प्रेरणा से तुम तीन पैरों के बल खड़े रहे। आग शान्त हुई, पशु जंगल में गये। स्थान खाली देखकर तुमने पैर नीचे रखना चाहा, पर रख नहीं सके। ढाई दिन तक अधर में रहने के कारण पांव इतना अकड़ गया था कि तुम नीचे गिर पड़े और तुम्हारा प्राणान्त हो गया। मेघ! तुम्हारी वह कष्ट-सहिष्णुता आज कहां चली गयी?

भगवान्‌ कहते जा रहे थे। मेघकुमार सुनता जा रहा था। सुनते-सुनते वह इतना एकाग्र हुआ कि उसे जाति-स्मृति ज्ञान हो गया। ज्ञान के आलोक में उसका पूरा पिछला जन्म चित्रपट की भांति सामने आ गया। पशु के जीवन में उपस्थित कष्ट में उसने जिस दृढ़ता का परिचय दिया और मनुष्य जीवन में आए थोड़े से कष्ट में वह कितना अधीर बन गया यह बात याद आते ही उसकी आंखें संकोच से झुक गई। मन ग्लानि से भर गया। एक क्षण के लिए उसने सोचा—प्रभु को कैसे मुख दिखाऊ! पर दूसरे ही क्षण उसने साहस बटोरा और भगवान्‌ के चरण पकड़ कर बोला—भन्ते! मैंने बहुत बड़ी भूल की। मैं भटक गया। मुझे आप पुन: शरण में लें। मेरा कल्याण करें। अब मैं हर मुसीबत को प्रसन्नता से सहन करूंगा। मुझे और कुछ नहीं चाहिए, आप की शरण चाहिए। भगवान्‌ महावीर ने उस बदली हुई मन:स्थित में पुन: दीक्षित कर मुनि मेघ को अपनी शरण में ले लिया।