मुख्य सामग्री पर जाएँ
‹ आगम कथाएं
3 / 21

मुनि अनाथी

कौशाम्बी नगरी में एक श्रेष्ठीपुत्र था—कुमार अनाथी। वह जितना रूप-सम्पन्न था, उतना ही वैभव-सम्पन्न था। पर धार्मिक आस्था की दृष्टि से वह पूरा अकिंचन था। वह न धर्म-कर्म को स्वीकार करता था, न पुण्य-पाप की बात उसकी समझ में आती थी और न स्वर्ग-नरक में उसका विश्‍वास था। वह अपने साथियों के सामने धर्म की व्यर्थता प्रमाणित करता रहता।

एक दिन कुमार अपने मित्रों के साथ खेल रहा था। अचानक उसकी आंख में भयंकर पीड़ा हुई। चिकित्सक आये पर उनके उपचार से कोई लाभ नहीं हुआ। ज्यों-ज्यों चिकित्सा की गई बीमारी बढ़ती गई। माता-पिता ने शहर के बड़े-बड़े प्रसिद्ध वैद्यों को बुलाया। उनका उपचार भी कारगर सिद्ध नहीं हुआ। उसके भाई-बहिन, परिजन सब आस-पास खड़े थे। पर सब निरुपाय। उसकी पली ने देवों की बहुत मनौतियां कीं, पर कोई लाभ नहीं हुआ। कुमार की पीड़ा बढ़ती जा रही थी। बढ़ती हुई पीड़ा ने उसके मन को उद्देलित कर दिया। उसने सोचा—लोग धर्म की बात करते हैं, उसकी महिमा गाते हैं। क्यों नहीं मैं भी धर्म की शक्ति का प्रयोग करूं?

आज से मैं धर्म की शरण स्वीकार करता हूं। यदि मुझे इस बीमारी से छुटकारा मिला तो मैं अपना अशेष जीवन धर्म के लिए समर्पित कर दूंगा। इस संकल्प के साथ वह निश्‍चिन्त होकर सो गया। थोड़ी ही देर बाद उसकी आंखों की वेदना कुछ हल्की हुई। इससे उसे बल मिला और उसका संकल्प घनीभूत हो गया। देखते-देखते वह पूरी तरह से पीड़ामुक्त हो गया।

रात्रि का शेष समय उसने अच्छी नींद में बिताया। प्रात:काल कुमार को स्वस्थ देखकर परिवार के अनेक लोगों ने दावा किया कि कुमार उनके उपचार या मनौतियों से स्वस्थ हुआ है।

कुमार बोला—किसी का उपचार और किसी की मनौती काम नहीं आई है। मेरी मनौती ही सफल हुई है।

पास खड़े लोगों ने पूछा—तुमने भी मनौती की थी क्या? उसने सकारात्मक उत्तर देते हुए कहा—मैंने कल पहली बार धर्म की शरण स्वीकार की। जिस क्षण मैं धर्म के प्रति समर्पित हुआ, मेरी वेदना समाप्त होने लगी और अब मैं अपने आपको पूर्ण स्वस्थ अनुभव कर रहा हूं। मैंने संकल्प किया है कि मैं अब घर में नहीं रहूंगा। अपना पूरा जीवन धर्म की साधना में बिताऊंगा। अपने इस संकल्प के अनुसार कुमार मुनि बन गया।

देवकुमार-सा सुन्दर युवक अनाथी मुनि-जीवन स्वीकार कर उपवन में जा ध्यान मुद्रा में खड़ा हो गया। उस समय मगध सम्राट्‌ श्रेणिक घूमता-घूमता उसी उपवन में आ गया। श्रेणिक जैनधर्म के प्रति आस्थाशील नहीं था। उसने मुनि को देखकर कहा—तुम कौन हो? किसके द्वारा ठगे गये हो? इस अवस्था में यह कठोर चर्या क्यों स्वीकार की?

अनाथी ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया—'राजन्‌! मैं अनाथ हूं। संसार में कोई त्राता नहीं मिला। इसलिए मैं मुनि बन गया! श्रेणिक ने मुनि की बात में रस लिया। उसने अपने अन्त:करण की समग्र करुणा उंडेलते हुए कहा—'तुम मेरे पास आ जाओ। मैं तुम्हारा नाथ बन जाऊंगा। तुम्हें किसी प्रकार का अभाव नहीं होने दूंगा।'

मुनि अनाथी मुस्कराकर बोला—तुम मेरे नाथ बन जाओगे? है तुममें ऐसी क्षमता?

'मैं सम्राट हूं और लाखों का नाथ हूं' सम्राट ने गर्व के साथ कहा। अनाथी मुनि ने उसे कुरेदते हुए कहा—राजन्‌! एक बात पूछूं। अगर तुम बीमार हो गए तो बीमारी से स्वयं को बचा सकोगे? बुढ़ापे का मुकाबला कर सकोगे? मौत को परास्त कर सकोगे?

श्रेणिक ने नि:श्‍वास छोड़ते हुए कहा—यह सब तो बहुत कठिन है।

मुनि अनाथी—इनके सामने तुम निरीह हो तो अपने नाथ कैसे बनोगे? और अपने नाथ ही नहीं तो दूसरों के नाथ बनने का प्रश्‍न ही कैसे होगा। बहुत कठिन है नाथ होना। नाथ वह होता है—जो किसी भी मुसीबत में दूसरों का मुंह न ताके। जो स्वयं अपने लिए त्राण बन सके और दूसरों को त्राण दे सके। तुम क्या जानो मेरे जीवन की कहानी? में भी अपन मात़ा-पिता का लाडला पुत्र था। भरा-पूरा परिवार था। धन-वैभव की भी कोई कमी नहीं थी। पर इसके बावजूद कोई मेरा त्राण नहीं बन सका। इसलिए मैं मुनि बना। इस प्रकार उसने अपने जीवन की पूरी कहानी सुना दी।

सम्राट श्रेणिक ने सनाथता और अनाथता का पूरा विवेचन सुना और किसी के आगे नहीं झुकने वाला राजा मुनि के चरणों में श्रद्धा से नत हो गया।