मुनि अतिमुक्तक
कुमार अतिमुक्तक पौलासपुर के महाराज विजय का पुत्र था। उसकी उम्र लगभग आठ वर्ष की होगी, वह एक दिन अपने मित्रों के साथ खेल रहा था। खेलते-खेलते अचानक उसकी दृष्टि एक मुनि पर पड़ी। मुनि को देखते ही जैसे उसके पूर्व जन्म के संस्कार जागृत हो गए। वह खेल छोड़ उन्हें देखने लगा। उसके बाल मानस में अनेक जिज्ञासाएं उभरीं—ये कौन हैं? कहां से आए हैं? क्या करते हैं? कहां रहते हैं?
वह अपनी जिज्ञासाओं को रोक न सका। मुनि के निकट आया। सिर झुकाकर नमस्कार किया और एक साथ समस्त जिज्ञासाओं को खोलकर रख दिया। मुनि ने अपना परिचय देते हुए कहा—कुमार! मैं जैन साधु हूं। मेरा नाम इन्द्रभूति गौतम है। भगवान् महावीर मेरे गुरु हैं। हमारा कोई मठ मन्दिर नहीं है। हम जहां जाते हैं, जहां रहते हैं, वही हमारा घर बन जाता है। हम स्वयं आत्म कल्याण करते हैं और दूसरों को कल्याण का मार्ग बताते हैं।
तो आप घर-घर क्यों घूम रहे हैं? बालक ने सहजता से प्रश्न किया।
आज मेरे दो दिन की तपस्या का पारणा है। इसलिए मैं भिक्षा के लिए घर-घर घूम रहा हूं।
'क्या आप मेरे घर भी भिक्षा ले सकते हैं?' 'क्यों नहीं?'
कुमार अतिमुक्तक बहुत प्रसन्न हआ और गौतम स्वामी को अंगुली पकड़कर अपने घर ले गया।
गौतम स्वामी गोचरी कर ज्योंहि आने लगे, कुमार ने पूछा—आप कहां जा रहे हैं?
'मैं अपने गुरु के पास जा रहा हूं।'
मैं भी आपके साथ चलूंगा। यह कहते हुए वह गौतम स्वामी के साथ हो गया। महावीर के दर्शन किए। असीम आनन्द की अनुभूति की। महावीर ने प्रवचन किया। कुमार अतिमुक्तक प्रवचन सुन संसार से विरक्त हो गया। मुनित्व स्वीकार करने की तीव्र उत्कण्ठा जग गई। घर आकर माता-पिता के सामने अपनी भावना रखी।
माता-पिता ने समझाया-कुमार! तू अभी बालक है। दीक्षा के बारे में जानता भी क्या है? संयमी बनना कोई हंसी खेल नहीं है। तलवार की धार पर चलना है। लोहे के चने चबाना है।
माता-पिता! मैं और कुछ जानता हूं कि नहीं पर इतना अवश्य जानता हूं कि यह संसार जन्म-मरण का चक्र है। जन्म-मरण महान् दु:ख का हेतु है। मैं इस दु:ख से मुक्त होना चाहता हूं। और इस दु:ख मुक्ति का एक मात्र उपाय है—संयम।
माता-पिता के बहुत समझाने पर भी वह अपने निश्चय पर अडिग रहा और भगवान् महावीर की शरण स्वीकार कर ली।
एक दिन मुनि अतिमुक्तक स्थविर मुनियों के साथ शौचार्थ गया। वर्षा ऋतु का समय था। स्थान-स्थान पर पानी के गड्ढे भरे थे। बाल मुनि 'मैं साधु हूं' इस बात को भूल गया। बाल सुलभ चपलता से उसने पानी के चारों ओर मिट्टी की पाली बनाई। पात्र को पानी के बीच रखा और उसके बीच अंगुली रख, 'मैं तरता हूं मेरी पात्री तरती है' इस प्रकार गीत गाने लगा। इधर स्थविर मुनि उसे खोजते हुए आए। उन्होंने दूर से बाल मुनि को जलक्रीड़ा करते देखा। उच्चस्वर से उसे आवाज दी। पर।बाल मुनि उस क्रीड़ा में इतना तल्लीन था कि स्थविरों की आवाज को वह सुन न सका।
स्थविर मुनियों के मन में अतिमुक्तक की साधना के प्रति सन्देह उभर आया। वे चलकर सीधे महावीर के पास पहुंचे और व्यंग्य भाषा में बोले—भन्ते! आपका वह छोटा शिष्य अतिमुक्तक कब मोक्ष पायेगा? आपने उसको छोटी उम्र में साधु बना दिया है। वह जानता ही नहीं कि साधुता क्या होती है।
महावीर ज्ञानी थे। उनके सामने सारी घटना चित्रपट की तरह घूम रही थी। वे बोले—स्थविरो! बाल मुनि अतिमुक्तक की अवहेलना मत करो। वह चरम शरीरी है, इसी जन्म में मोक्ष जाने वाला है। यह छद्मस्थता की लहर है। वह अपने आप संभल जाएगा। तुम बाल मुनि की सेवा करो।
भगवान् के मुखारविंद से ऐसा सुन स्थविर मुनि बहुत लज्जित हुए। अपनी भूल का उन्हें अहसास हुआ और वे पुन: बाल मुनि को लेने गए।
इधर मुनि अतिमुक्तक का मन मुड़ा। उसे साधुता की स्मृति हुई। वह तत्काल उठा। सामने स्थविरो को खड़े देखा। उन्हें सविनय वंदन किया और अपनी भूल का पश्चात्ताप करने लगा।
मुनि अतिमुक्तक भगवान् के चरणों में उपस्थित हुआ। अपनी भूल का प्रायश्चित्त स्वीकार कर वह संयम पथ पर बढ़ता रहा और अन्त में केवलज्ञान को प्राप्त कर सिद्ध बुद्ध और मुक्त हो गया।