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‹ आगम कथाएं
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मुनि हरिकेशी

हरिकेशी का जन्म चाण्डाल कुल में हुआ। वह जितना कुरूप था, उतना ही कटुभाषी था। उसके समवयस्क उसके साथ खेलते नहीं थे। पारिवारिक जन उसे स्‍नेह नहीं देते थे। एक दिन उसकी बिरादरी में जातिभोज था। सब लोग मिलकर आमोद-प्रमोद मना रहे थे। हरिकेशी वहां पहुंचा तो उसे भोज में सम्मिलित नहीं किया गया। वह दु:खी मन से एक ओर खड़ा होकर सुबकने लगा। इसी समय उसने देखा—एक विषेला सर्प उधर आ गया। बच्चे और युवक उस पर टूट पड़े। देखते-देखते उसे मार दिया गया। थोड़ी देर बाद निर्विष दुमुंहा जीव निकला। चांडालों ने उसे एक ओर हटाकर रास्ता दे दिया। किसी बच्चे ने उस पर पत्थर नहीं मारा।

यह घटना हरिकेशबल के दिल को भीतर तक छू गई। उसने सोचा-सांप को मारा गया, दुमुंहे को बचाया गया, इसका एक मात्र कारण जहर है। मेरी बिरादरी के सब लोग प्रीतिभोज कर रहे हैं और मुझे उससे वञ्चित कर दिया गया है। इसका कारण भी मेरी वाणी का जहर है। यदि मेरी जबान का कड़वापन मिट जाए तो मैं भी इन सबके बीच बैठ सकता हूं। सोचते-सोचते उसे जीवन की नयी दिशा मिल गई। संसार से विरक्त हो वह मुनि बना और घोर तप करने लगा। उसके तप से प्रभावित हो एक यक्ष उसकी सेवा करने लगा।

मुनि हरिकेशी एक दिन भिक्षा के लिए घूम रहा था। रास्ते में एक यज्ञ मण्डप में ब्राह्मण भोजन कर रहे थे। मुनि वहां पहुंचा। ब्राह्मणकुमारों ने मुनि की भर्त्सना कर उसे यज्ञमण्डप से बाहर निकालना चाहा। यह स्थिति देख यक्ष मुनि के शरीर में प्रविष्ट हुआ और उसने वाद-विवाद कर ब्राह्मणों को निरुत्तर कर दिया। ऐसा होने पर भी मुनि को भिक्षा नहीं मिली। अपितु मुनि की मारपीट होने लगी। यक्ष यह सहन नहीं कर सका। उसने ब्राह्मण कुमारों को औंधे मुंह गिरा दिया। उनके मुंह से रक्त बहने लगा। स्थिति की भयंकरता को समझ ब्राह्मण दौड़कर आए। वे मुनि के चरणों में गिर पड़े और क्षमा-याचना करने लगे। मुनि बोला—मेरे मन में किसी के प्रति रोष नहीं है। मैंने कुछ नहीं किया। जो कुछ हुआ है, मेरे अनुकम्पक यक्ष द्वारा हुआ है। ब्राह्मण द्वारा निश्छलता के साथ क्षमा मांगने पर यक्ष ने अपनी सारी माया समेट ली। उन लोगों पर मुनि की साधना का गहरा प्रभाव पड़ा।