राजा मोहजीत
इन्द्र देव सभा में बैठा था। मानवीय गुणों की चर्चा चल रही थी। इस बीच इन्द्र ने कहा—मनुष्य लोक में मोहजीत नाम का राजा है। वह सचमुच मोहजीत है। वही नहीं, उसके समूचे परिवार ने मोह को जीत लिया है। प्रिय से प्रिय व्यक्ति का वियोग हो जाने पर भी वह किसी प्रकार का विलाप नहीं करता। मोह विजय का ऐसा अनुपम उदाहरण अन्यत्र नहीं मिलता।
इन्द्र द्वारा प्रशंसा सुनकर एक देव के मन में राजा की परीक्षा लेने की बात उठी। उसने दैविक शक्ति से राजा के इकलौते राजकुमार को कहीं छिपा दिया और स्वयं योगी का वेश बनाकर घूमने लगा।
राजकुमार को खोजती हुई एक दासी योगी के निकट से गुजरी। उसने योगी से पूछा—इस ओर राजकुमार को देखा है आपने?
योगी यह प्रश्न सुन उदास हो गया। वह रोता हुआ बोला—हाय! वह राजकुमार ही था, जिसको अभी-अभी मेरे आश्रम के सामने एक सिंह ने मार डाला।
दासी योगी की दयनीय अवस्था देखकर कहने लगी—राजकुमार के लिए तुम इतने विह्वल हो रहे हो, यह उचित नहीं है। तुम योगी हो, संन्यासी हो, जन्म और मृत्यु की नियामकता को जानते हो, फिर यह आर्त्तध्यान क्यों?
देव ने सोचा—यह दासी है। दासी के मन में ममता क्यों होगी? राजा के पास पहुंचकर यह घटना सुनाऊं तब उसके मोहजीत होने का पता लगेगा। योगी वेश में देव राजभवन में पहुंचा और राजा को राजकुमार पर सिंह के आक्रमण का संवाद सुनाया। राजा शांत भाव से बोला—'योगीराज! संयोग और वियोग सृष्टि का निश्चित क्रम है। इसमें हर्ष और विषाद क्यों किया जाए?
राजा से निपटकर योगी रानी के पास गया और करुण विलाप के स्वरों में राजकुमार की मृत्यु की सूचना दी। रानी ने सुना। दो क्षण आंख मूंदकर वह बोली—जो मेरा है उसे मुझसे कोई छीन नहीं सकेगा। जो मेरा नहीं है, उसकी मैं कितनी ही सुरक्षा करूं, टिक नहीं सकेगा। आप व्यर्थ ही क्यों संतप्त हो रहे हैं?
देव मन ही मन राजा और रानी की अनासक्त चेतना से अभिभूत होता हुआ राजकुमार की पत्नी के पास पहुंचा। उदास चेहरा, गद्गद वाणी, आंखों में पानी और विक्षिप्त-सी मनोदशा में उसने युवराज्ञी के सामने राजकुमार की मृत्यु का द्रावक चित्र उपस्थित किया और स्वयं मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। युवराज्ञी योगी को संबोधित कर बोली—योगीराज! योग साधना के साथ मोह और अधीरता का कोई सबंध नहीं है। तुमने घर छोड़ा है पर घर की वासना तुमसे नहीं छूटी है। तुम मेरी चिंता मत करो। मेरा पति मेरे भीतर है। वह मुझे छोड़कर कहीं नहीं जा सकता।
देव हतप्रभ हो गया। योगी का रूप छोड़कर वह अपने मूल रूप में प्रकट हुआ। छिपाए हुए राजकुमार को राज-परिवार के मध्य उपस्थित कर बोला—'इन्द्र ने आपके बारे में जो कहा, वह शत-प्रतिशत सही है। वास्तव में आपने मोह पर विजय प्राप्त कर ली है।'