अनेकान्तः कान्तः सकलसरितां संगम इव, प्रवादे स्याद्वादः सकलवचसामुद्गम इव । न सत्यं सत्यांशैर्वियुतमिह दृष्टं बुधजनैः, महावीरो धीरः स्फुरतु मम चित्ते प्रतिपलम् ।।
भगवान ने सत्य की उपलब्धि के लिए अभिलषणीय ‘अनेकान्त’ का दर्शन दिया, जो समस्त विचारों की सरिताओं के संगम—स्थल की तरह है । अनेकान्त की अभिव्यक्ति के लिए स्याद्वाद की शैली प्रस्तुत की, जो समस्त वचनों के उद्गम की भांति है । उस ज्ञानी पुरुष ने देखा—जाना कि सत्य सत्यांशों से विकल नहीं होता । वह धीर महावीर प्रतिपल मेरे चित्त में स्फुरित होता रहे ।