सदानन्दस्पन्दः प्रवहति मनोहारिवदने, प्रशस्तं वात्सल्यं स्फुरति सुखदं नेत्रयुगले । विकासे विन्यस्ता विमलविपुला दॄष्टिरनिशं, जगद्वन्द्यः स्वामी विशदचरितो नाम तुलसीः ।।
जिनके मनोहारी मुख पर सदा आनन्द का स्पन्दन प्रवाहित रहता था, जिनके दोनों नेत्रों में सुखद और प्रशस्त वात्सल्य स्फुरित होता था, जिनकी विमल और विशाल दॄष्टि निरंतर विकास कार्यों में लगी रहती थी, ऐसे विशद चरित्र वाले गुरुवर्य तुलसी स्वामी जगद्वन्द्य हैं ।