अहो प्रभु ! तुम ही दायक शिवपंथ नां । अहो प्रभु ! अजित जिनेश्वर आपरो, ध्याऊं ध्यान हमेश हो । अहो प्रभु ! अशरण शरण तू ही सही, मेटण सकल कलेश हो ।। १ ।।
प्रभो ! अर्हत् अजित ! मैं प्रतिदिन तुम्हारा ध्यान करता हूं । तुम्हीं अशरण के शरण हो और तुम्हीं हो सब संक्लशों को दूर करने वाले ।