गीतिका संग्रह — पृष्ठ 23
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- दुरंगी चाल
- दुर्लभ चिन्तामणि सम पायो प्राणी! ओ मानव-अवतार
- दुर्लभ मौका
- दुर्लभ सूर्य-युगल के दर्शन
- दृढ़ समकित धर थोड़ला
- दृष्टि
- देख आंसुड़ा री धार,
- देखकर जमाने रो रंग, जियो चकरावै है,
- देखकर जमाने रो रंग, जियो चकरावै है,
- देखता हालत दुनिया की तो मन सोचता है,
- देखो गण गुलशन महकाए।
- देखो जीभड़ली रो जबरो खेल तमाशो रे
- देखो मर्यादा की महिमा, कैसी गण की सुषमा छाई
- देग्या जन जन नै प्रतिबोध
- देरी ना करो, ना करो, ओ भगवान्,
- देव! चढ़ाएं श्रीचवणों में क्या ऐसा उपहार हो।
- देव! तुम्हारे श्रीचरणों में श्रद्धा का उपहार करें।
- देवकुमार जैसा दिव्य रूप तेरा
- देवते! बतलाओ
- देवां विदाई थाने छाती भर आवै,
- देवो देवोजी डगर
- देवों के देव गुरुवर! स्वीकारो तुम,
- दो अक्षर का नाम भिक्षु
- दो अब तो छवि नाथ! मुझे तुम,
- दो दिन का
- दो दिन का मेहमान
- दो नयन क्या फिरे
- दोनूं हाथ जोड़कर करूं
- दोष महा विकराल
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा
- दोहा : पल भर री नहीं है खबर, कद रुक ज्यावै ओ सांस,
- दौड़ रहा है आज आदमी
- दौड़ा-दौड़ लगा रहा,
- द्वन्द्व मिटाऊं मैं
- द्वारे तुम्हारे प्रभु ! कब से मैं खडा़,
- द्वैत-अद्वैत
- धक्कम धक्का करो कभी मत।
- धन से प्यार
- धनजी-शालीभद्र
- धन्य गजसुकुमाल
- धन्य जीवन, धन्य अनशन, धन्य भाव है।
- धन्य दिवस
- धन्य महावीर भगवान्, अभिग्रह गजब कर्यो,
- धम्मो मंगलमुक्किट्ठं
- धरती अम्बर में जय गूंजे
- धरती के उजारे की