गीतिका संग्रह — पृष्ठ 22
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- तोड़ो घेरा
- तोल कर बोलो निरंतर, मधुर-सी वाणी।
- तोले मन को मन से
- त्याग
- त्याग-अहंकार
- त्रिभुवन तारणहार, त्रिभुवन तारणहार,
- त्रिशला के दुलारे तुम, मेरी श्रद्धा स्वीकार लो,
- त्रिशला दुलारा प्रभुवर
- त्रिशला रो जायोड़ो इण दुनिया में जादू करग्यो
- त्रिशलानंदन महावीर के
- त्रिशलानन्दन प्रभु महावीर, तुम हो जन-जन की तकदीर,
- थांरो जीवन है दिन च्यार रो रे,
- थारो मन सूं ही भरमायो,
- थारो सुधरैला जद व्यवहार, सारो संसार सुधर ज्यासी।
- थूहर
- थे ठायो अनशन, वाह! वाह! ओ काम कर्यो है सांतरो।
- दरश बिन व्याकुल हैं ये प्राण,
- दरस दिरावो हरख बधावो
- दरस दो भगवान्
- दरसण द्यो गुरुराज! आज मन प्राण बुलावै रे
- दर्द हृदय को क्यों छू जाते
- दर्पण की अजब कहानी!
- दर्शन पाए हैं
- दर्शन पाये
- दल दी बाड़ी
- दश प्रत्याख्यान
- दसवां आचारज म्हारै घणा मन भावणां,
- दसवां गणीवर ओपै।
- दादा-दादी सुणो सुगुरु री सीख,
- दायित्व
- दिखा दो अब तो छवि नाथ! मुझे तुम,
- दिल का दुख
- दिल दुखाने से बड़ा जुल्म नहीं दुनिया में,
- दिल रो दर्पण यदि साफ नहीं,
- दिल साफ करो
- दिल से शासन में रमें गुरु का हमें वरदान है।
- दिवलै ज्यूं संसार म्हानै नश्वर लागे जी,
- दिवाना बना क्यों तूं धन में, विचार
- दिव्य ज्योति को नमस्कार
- दीन्हीं हीरकणी प्रभु संघ नै
- दीप जो तुमने जलाया
- दीप मैं कैसे जलाऊँ ?
- दीप! जलते ही रहो तुम!
- दीप! धुंआ क्यों उगलते?
- दीपक की दस्तक
- दीपा-नन्दन! ल्यो शत बन्दन, नाव करो भव-पार,
- दीपां के लाल दुलारे!
- दीपां रा दुलारा और प्यारा प्रभू आपां रा रे
- दीपांजी रा जाया! म्हारा रोम-रोम विकसावै,
- दीपांसुत भिक्षु का नाम ध्यायें सदा,
- दीपानंद भीखण जी पधारो
- दीपावली
- दीये से दीया जलता है
- ७४, दीवाना
- दीवाळी आई रै, प्रभु वर्धमान गुण गावो।
- दु:ख क्या है सुख का आदि रूप
- दु:ख मुक्ति का मार्ग
- दुःख में तूं धीरज धर रे
- दुखी जग सारा, कर्म का मारा,
- दुनिया सारी देख तूं ये, धर्मशाला है।