गीतिका संग्रह — पृष्ठ 24
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- धरती के उजारे मनहारे, गुरु महाश्रमण को वन्दन है,
- धरती के बन गए देवता, क्या गुण गरिमा गाएँ
- धरती रो अलबेलो
- धरम री जोत हियै में तूं जगाले।।
- धरमाचारज! मुझ तारो
- धरा के गौरव ज्ञान
- धरा पर उतरा स्वर्ग विमान रे,
- धरा पर उतर्यो रे, स्वर्ण ज्यूं निखर्यो रे,
- धरा पर गूंज उठा यह स्वर
- धरित्री के हे अमर सपूत
- धरूं मैं प्रभु तुलसी का ध्यान
- धरूं मैं प्रभु तुलसी का ध्यान।
- धरें हम महाप्रज्ञ का ध्यान
- धर्म
- धर्म करे कल्याण
- धर्म की रेस दी झीणी।
- धर्म की लौ जलाएं हम।
- धर्म की शुभ साधना में हम निरत प्रतिपल रहें।
- धर्म क्रांति का रूप
- धर्म गीत
- धर्म ध्यान में लग जीवन उत्थान करो
- धर्म नाम पर बांट दिया
- धर्म निज अध्यात्म जागृति, फलित फलित, बुरों भलो।
- धर्म बगीचा
- धर्म बगीचो है गुलजार
- धर्म संघ की जय हो जय हो,
- धर्म संघ शासन शेखर को वन्दन कर हर्षाएं
- धर्म सच्चा सखा
- धर्म साया बाकी माया
- धर्म ही है जीवन का त्राण।
- धर्म ही है महान
- धर्म ही है सच्चा आधार,
- धर्म है जीवन का साथी
- धर्मं हमारा, सारे जग का सहारा,
- धर्मचक्री! दी तुमने भैक्षव गण को अमित ऊंचाई।
- धर्मरुचि अणगार
- धर्मा धर्म विवेक
- धार्मिकता की भव्यभीत्ति पर जीवन ज्योति जलाना है,
- धीरज का धागा मत तोड़ो।
- धीरे धीरे बीते उमर, तय करना है लम्बा सफर,
- धुएं-भरी खाइयां पाटो
- धूम्रपान आदत न लगाना।
- *ध्याऊँ मैं निज शिव स्वरूप को ध्याऊँ,
- ध्यान दिवस
- ध्यान धरूं, गुण गान करूं मैं,
- ध्यान लगावो, ध्यान लगावो,
- ध्यान सदा सुखदाई
- ध्यान साधना
- ध्वंश और निर्माण
- न तारणहार, प्रभु करुणा के अवतार,
- नई पौध कैसे पनपेगी।
- नई प्रेरणा
- नई भोर
- नए क्षितिज की खोज
- नए वर्ष में प्रवेश हो सुखकारी।
- नए सृजन के लिए
- नखरालो ओ मनड़ो मुश्किल स्यूं वश में आवै,
- नगर के लोक तो
- नगर-नगर ओ द्वारे-द्वारे मन्दिर, मस्जिद, धाम
- नटखट बच्चा जो होता है।