गीतिका संग्रह — पृष्ठ 4
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- अन्तस्-चक्र घुमाओ
- अन्तिम बाजी
- अन्याय सहो मत
- अपणे घर में
- अपना करो सुधार
- अपना मन अपने को छलता।
- अपना-अपना स्थान
- अपनी आत्मा में स्थित होकर जिनवर के गुण गाएं।
- अपनी करणी पार उतरणी, करना जग में भलाई,
- अपने को पहचान रे,
- अपने को बदलें
- अपने घर में
- अपने जीवन का अपने से बढ़कर नहीं कोई रखवाला
- अपने जीवन को ऊंचा उठाये जा,
- अपने जीवन को संभाल पल-पल सफल बना ले रै,
- अपने जीवन को संभाल,
- अपने भीतर झांक
- अपने में जरा निहारो तो
- अपने सद् आचरणों से हम अन्तर को चमकायेगें
- अपने सारे काम करने
- अपने से अपना कल्याण
- अपेक्षा महावीर की
- अब जाग सयाने निद्रा तज, अवसर तेरे घर आया है
- अब जागो वीर सपूतों! युग तुमको खड़ा पुकारे
- अब तो जाग
- अब तो पधारो भगवन्!
- अब तो संभल रे, ओ मेरे मन,
- अब दोनों हाथ उठे हैं, मंजिल पर चरण बढ़े हैं।
- अब नर भव सफल बनाना है।
- अब मांयली थे आंख नै उघाड़ल्यो कनी
- अब म्हारै समकित दीप
- अभिनंदन नाथ तुम्हारा
- अभिनंदन में ले पूजा थाली, आई भोर रुपाली।
- अभिनंदन शतशत वंदन, लो श्रद्धा भरा समर्पण
- अभिनन्दन
- अभिनन्दन
- अभिनन्दन बार हजार
- अभिनन्दन में
- अभिनन्दन है आज तुम्हारा
- अभिनन्दन है, अभिनन्दन है
- अभिमान
- अभिषेक दिन आयो, मन में उमंग ल्याओ
- अभी था जगाया, अभी फिर तू सोया,
- अभेद
- अमर आस्था
- अमर गीत
- अमर न कोई रह पायेगा
- अमर बनकर यहां कोई कभी रहने नहीं पाता,
- अमर स्पन्दन
- अमृत महोत्सव अभिवन्दना
- अमृत महोत्सव का अभिनव अवसर आया।
- अमृत वाणी
- अमृतपुरुष हैं अवढ़रदानी
- अयि नेम कुवर
- अरणक मुनि
- अरिहत देव को वंदन
- अरे धार्मिको
- अरे मन, अपने को संभाल,
- अरे मन! दृढ़ता धारी रै,
- अर्ह वन्दना