गीतिका संग्रह — पृष्ठ 33
2856 में से 1921–1980
- मन दर्पण को स्वच्छ बनाओ।
- मन निर्मलता को प्राप्त करो आनंद तुम्हें मिल जाएगा।
- मन नै साध्यां स्यूं ही साधना में रंग आवैला,
- मन नै साफ राखीजे
- मन प्रभु-दर्शन का प्यासा,
- मन भर-भर आए
- मन मंदिर के देवते!
- मन मंदिर में प्रभु आओ तुम, जीवन उपवन सरसाओ तुम,
- मन मन्दिर में आ जाओ प्रभु!
- मन मन्दिर में आ जाओ रे स्वामी,
- मन मन्दिर में शोभै बालूजी रा लाल,
- मन में गर्व कभी मत लाओ।
- मन में जागी भक्ति
- मन में बसा है, एक नाम तेरा,
- मन में भरो उजाला, अंधकार दूर होगा।
- मन में सौ सी गांठां और मुंह में सी सी गालियां,
- मन में हो जिसके प्रेम अपार,
- मन मोरे सुन जरा,
- मन म्हारो महकायो,
- मन रटन लगाये महावीर,
- मन री वीणा रा तार शासण परवरदिगार
- मन रे, तू क्यों न विचार करे?
- मन से
- मन से
- मन हर पल रटे, गुण गाये,
- मन है सच्चा प्रभु का मन्दिर।
- मन! क्षमा-धर्म अपनाओ,
- मन! सुमर सुमर नित भिक्षु नाम,
- मनमोहक लगता है मोर।
- मनमोहक वर्षा ऋतु आई
- मनवा नांय विचारी रे
- मनसि निधीयतां रे!
- मनहारी, बाबै री मूरत प्यारी,
- मनावां हिलमिल सारा आज म्हें तो तपस्या रो त्यौहार
- मनुज अवतार पा तूंने, कमाया क्या अरे सोचो,
- मनुज को भगवान् की तब याद आती है,
- मनुज रूप में था वह ईश्वर
- मनुज, तूं क्यूं भरमायो रे,
- मनुहारों से भरा हुआ है
- मर्यादा को वन्दना
- मर्यादा गण-नन्दनवन मन्दार है।
- मर्यादा गणनन्दनवन-मन्दार है।
- मर्यादा गीत
- मर्यादा धरणी, मर्यादा अम्बर है
- मर्यादा पुरुषोत्तम स्वामी भीखण जी सिंवरां म्हें
- मर्यादा मोछब
- मर्यादा रा गीत – धरती अम्बर समन्दर गावै
- मर्यादा री ज्योति
- मर्यादा री महिमा
- मर्यादा शुद्ध निभाना,जो लिया सन्त का बाना रे।
- मर्यादा सुख की शाला है।
- मर्यादा ही जीवन
- मर्यादाओ का गहना
- मर्यादामय जीवन यह हमने पाया है
- मर्यादामय सुखमय सरस सुप्यार जो।
- मर्यादावां रो मोछव म्हैं आज मनावा रे,
- मर्यादित इस गण को पाकर पुलकित है तन मन,
- मर्यादित इस धर्म-संघ पर नाज सभी को है मन में,
- मर्यादोत्सव
- मर्यादोत्सव की आभा अभिराम है।