गीतिका संग्रह — पृष्ठ 32
2856 में से 1861–1920
- भूल रहा मानव न्याय धर्म को भूल रहा,
- भूला रे परदेशी!
- भूलो मन भमरा कांई भम्यो
- भेट भवि चरण ले
- भेदभाव की बात भुलाए।
- भैक्षव शासन है जयकारी, इण री महिमा न्यारी है।
- भैक्षवगण नंदनवन में, तुलसी युग वरदाई हो
- भैक्षवशासन नन्दनवन की सुषमा शिखर चढ़ाएं हम।
- भोग में क्यूं राच्यो प्राणी,
- भोजन संयम दिवस
- भोर समै भजूं भिक्षुगणी,
- भोर-भोर उठ कर प्रभू नै सुमरलै
- भ्रष्टाचार
- भ्रांति मिटा क्रांति कर
- भ्रान्ति
- मंगल कैसे आज मनाऊं?
- मंगल गावो रे।
- मंगल गीत
- मंगल ज्योति
- मंगल भावना
- मंगल भावना
- मंगल मर्यादा का पर्व, सबको होता सात्त्विक गर्व,
- मंगल वीतराग भावना
- मंगल स्तुति – ॐ मंगलं ओंकार मंगलं
- मंगल है आज तेरे शासन में मंगल मंगल।
- मंगल है गुरु नाम, गुरु की जय बोलो,
- मंगल-माल है
- मंगल, ओ बने हर पल,
- मंगलमय आज का दिन, मंगलमय कल होगा,
- मंगलमय नव वर्ष, सभी में हर्ष, आज है छा रहा,
- *मंगलमय भावों को जीवन में अपनायें हम,
- मंगलीक सरणां च्यार
- मंजिल को पाना है मुझे, बस रहे सदा यह चाह,
- मंजिल तेरी दूर नहीं पांव उठा प्यारे,
- मंत्रों का सरदार
- मघवा अघ-वारण नै ईं धरती पर आया,
- मघवा गादीधर म्हारा
- मघवा स्तुति
- मत कर तूं विश्वास सांस रो कद चलतो ओ रुक ज्यावै,
- मत कर रे मना तूं इतणो रोष,
- मत करना दर्जन की संगत।
- मत खेलो हिंसा की होली
- मत मदिरापान करो
- मत रोको इसको बहने दो
- मत समझो मैं हार रही हूँ
- मतलबी ये नाते, भरमाते, जन दुःख पाते हैं,
- मतिमन्त मुणी
- मद्यपान पापों का पनघट।
- मधुर संगीत
- मन
- मन इत उत तूं
- मन करता है
- मन का बन्धन ही बन्धन है
- मन की कचोट
- मन की चंचलताओं और तन की लोलुपताओं में,
- मन के खुले किंवार
- मन को धोलो, गांठें खोलो, बन जाओ गुणवान्,
- मन को भाए प्रभु तव शरण
- मन को शान्त बनाएं हम
- मन क्यों रोता है